Saturday, 14 January 2012

गुजरा ज़माना


यह कविता सरिता के जून २०१२ द्वितीयार्द्ध में प्रकाशित हुई थी 

साँवली सुन्दर सलोनी सी लड़की 


नीम दरख़्त के पीछे की खिड़की

आम की शाखें और बरगद की डाली

नीम के पत्ते और मिटटी की प्याली 

बहुत याद आता है गुजरा ज़माना

उसकी गली के चक्कर लगाना 

सीने से पुस्तक लगाके वो चलना 

गली के मोड़ पे जा के पलटना 

देख के मुझको तेरा मुस्काना 

दातों से अपने होठों को दबाना

दुपट्टे के छोर में अंगुली फिराना

चुपके से मेरे ख्यालों में आना 

बहुत याद आता है गुजरा ज़माना

उसकी गली के चक्कर लगाना 

भरी दुपहरी में छत पे वो आना

भिंगोकर बालों को फिर से सुखाना

बाल बनाने को खिड़की पे आना 

करूँ जो इशारे तो मुंह का बनाना 

बहुत याद आता है गुजरा ज़माना

उसकी गली के चक्कर लगाना 

चाँदनी रात में बागों में जाना 

छुप छुप के तेरा मिलने को आना

पूनम की रात में तारों का गिनना 

बंद करके ऑंखें तेरी बातें सुनना 

बहुत याद आता है गुजरा ज़माना

उसकी गली के चक्कर लगाना
... नीरज कुमार 'नीर'

2 comments:

  1. अच्छी रचना है सर

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  2. बहुत ही खूबसूरत शब्द नीरज जी !

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