Friday, 21 September 2012

आदिवासी व्यथा

मेरी प्रस्तुत कविता आदिवासियों के विस्थापन, उनके जल, जंगल, जमीन को  उनसे छीने जाने एवं उसके पश्चात उनके द्वारा भोगे जाने वाली यंत्रणा से जुडी है, उम्मीद है, आपके भावों को जगा सके.


गोबर से लीपा आंगन ,
मिटटी की चिकनी दीवार ,
दीवारों पर चित्रकारी.
पत्थर का कुआँ.
कुँए का ठंडा पानी ,
बरगद के नीचे चौपाल
उधम मचाते छौने,
वातावरण में महुआ की गंध
मांदर की थाप
निश्छल मुस्कराहट
एक सुदूर आदिवासी गांव ...
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एक फैक्ट्री का शिलान्यास,
या एक डैम का
या एक खदान का.
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जमीन के बदले पैसे,
पैसे से खरीदी जाती शराब,
जब तक फैक्ट्री बनी
या डैम बना या
खदान तैयार हुई,
शराब बहती रही,
गांव की गलियों में,
जवानी घुलती रही
बोतल के अंदर.
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बाहर से आये लोग,
फैक्ट्री या डैम या खदान
हो गयी तैयार,
पैसे खत्म हो गए इधर,
जमीन भी खत्म हो गयी.
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फैक्ट्री से निकलता है
धुआं, काला धुआं,
गांव के लोगों के भविष्य की तरह
काला, अँधेरा घुप्प.
अब कुँए का पानी,
पीने के लायक नहीं,
दीवारों पर चित्रकारी नहीं,
नारे लिखे है, नक्सली नारे .
कुछ नेतानुमा लोग
भडकाते हैं उनको.
कंपनी से पाएंगे कूछ माल,
छोड़ जायेंगे फिर उन्हें
घुटने के लिए,
घुट घुट के मरने के लिए.
---
अब मांदर चुपचाप है,
दीवार पे टंगा, खूंटी के सहारे
करता है चीत्कार,
अपने मालिक की असामयिक मौत पर.
--------
यह गांव है बस्तर में,
छत्तीसगढ़ में या झारखण्ड में,
क्या फर्क पड़ता है?
हर जगह एक सी कथा है,
आदिवासियों की एक सी व्यथा है.

... नीरज कुमार नीर

Thursday, 20 September 2012

खोलो खिड़कियाँ सूरज को आने दो

खोलो खिड़कियाँ सूरज को आने दो,
अँधेरा अब भी बहुत है ज़माने में.

परदे हटाओ कि ताज़ी हवा आए,
हर्ज क्या एक तरीका आजमाने में.

मुस्कुराओ सब  तुम्हे देख मुस्काएं 
कोई दाम तो नहीं मुस्कुराने में.

रिश्ता जोड़ना तो है आसान बहुत ,
मुश्किल बहुत है रिश्ता निभाने में.

अपने नुक्स को पहले देख तो नीरज,
लगे हो क्यों सब की कमियां गिनाने में.

……………. नीरज नीर 

Monday, 17 September 2012

“मृगनयन सी अंखिया तेरी”


मृगनयन सी अंखिया तेरी,
सूरत तेरी प्यारी.
कारी बदरिया केश तुम्हारे,
धानी चुनर की साड़ी
संमरमर सी देह तुम्हारी
लचके कमरिया दुधारी.

चन्दन जैसी खुशबू तेरी
मिसरी से मीठी बोली,
छम छम बाजे जब पायलिया
नीरज की नीयत तब डोली.

हाथ में कंगना,   नाक नथुनिया
कानो में सोहे कनवाली
सुन ले प्रियतम प्रणय  निवेदन,
चाल है तेरी मतवाली .

मृगनयन सी अंखिया तेरी,
सूरत तेरी प्यारी.
कारी बदरिया केश तुम्हारे,
धानी चुनर की साड़ी
………………नीरज कुमार

Sunday, 16 September 2012

ऐसा आदमी या तो योगी या कवि होता है

हर्ष का अतिरेक जब हद से गुजर जाये,
आनंद से ही आदमी जब मर जाये.

नीरवता में भी जहाँ हर्ष का शंखनाद हो,
रंध्र-रंध्र में गुम्फित अमर प्रकाश हो.

अम्बर भी जिसके अवसान पर रोता है,
ऐसा आदमी या तो योगी या कवि होता है.

खोलता नित्य द्वार मन के, ….. मिलता ,
भर बांहों में खेलता, …संग पिया
चढता नित्य सोपान परितोष के
जन जन में फूकता है, प्राण नया .

पहनाकर तुफानो को घुँघरू,
नचाता है इशारों पर,
दिल में जो आये लुट जाये
बहारों पर, नजारों पर.

परिवर्तन हेतू, क्रांति का संवाहक होता है,
संस्कृति को छोड़कर पीछे, जब
बढ़ जाती है पीढियां आगे, तब,
संस्कृति को अपने कन्धों पर ढोता है.
ऐसा आदमी या तो योगी या कवि होता है.

............................नीरज कुमार नीर  
                  neeraj kumar neer

Sunday, 9 September 2012

नया विहान



विहग निलय से  निकल चुके,
नया विहान आया है,
उषा ने छेड़ी तान नयी,
पिक ने राग सुनाया है.
.
रश्मि रथ पर बैठ रवि,
नया सवेरा लाया है.
पौधों पर नव कुसुम खिले,
पात पात  मुस्काया है.
.
देवालय का शीर्ष कलश
आभामय ज्यूँ कंचन
हरित तृण पर ओस कण
जगमग दीप्ति उपवन .
.
सर के जल में रवि,
छवि निहारे,
मुकुलित हुआ शतदल नवल.
पुलकित धरा, धवल वसन.
शोभित अवनि के कुंतल,
द्रुमदल.

अब तिमिर लेश नहीं
रजनी अब शेष नहीं
चतुर्दिक छाया नव स्पंदन,
तन्द्रालस मिटा, निस्तन्द्र हुआ चितवन.
............................   “नीरज कुमार 'नीर'
             
कुछ शब्दार्थ :
विहग : पक्षी 
निलय : घोंसला 
पिक : कोयल 
तृण : घास 
सर के जल : सरोवर का जल 
मुकुलित : फूल का खिलना 
शतदल : कमल
नवल : नया 
धवल : सफ़ेद 
वसन : वस्त्र 
अवनि : पृथ्वी
कुंतल : केश 
द्रुम : वृक्ष 
चित्र गूगल से साभार 


पापा तुने क्या किया


पापा! मै भी राजकुमारी होती,
सबकी घर में प्यारी होती.
थक कर जब तुम घर आते,
मेरी एक मुस्कान,
हर लेती हर थकान.
जिसे भैया बिखरा देता,
तुम्हारी चीजों को,
सहेजती, करीने से सजाती .
जब तुम्हारा सर दर्द से फट रहा होता
और भैया व्यस्त होता क्रिकेट मैच में,
बाम लगाते हुए तुम्हारे सर पर
मेरा ही हाथ होता.
बुखार में तपती हुई  मम्मी
जब रसोई में काम करती और
थाली पटक रहे होते तुम और भैया
मैं ही होती जो मम्मी का हाथ बटाती,
उसे नसीब होता एक कतरा आराम .
मैं भी पढ़ती लिखती, बड़ा नाम करती,
पिता के नाम में तेरा ही तो  नाम लिखती
पति के घर जाकर,  स्वर्ग से करती सुन्दर,
जनकर संतति सृष्टी क्रम बढ़ाती
लेकिन पापा तुने क्या किया
तुम्हारी नन्ही राजकुमारी को
नोच रहे हैं कुत्ते, काट रही है चीटियाँ,
मंडरा रहे है गिद्ध,
क्यों डाल दिया मुझे कूड़े दान में?
   “नीरज कुमार”
www.facebook.com/neeraj.dilse 

Saturday, 8 September 2012

शहर की आत्मा

कल रात, एक सुने सड़क पर
मेरे शहर की आत्मा,
मुझसे टकरा गई  .
कृश काया,  वक्र पीठ
कैसे हांफ रही  थी.
शशि किरण में मैंने देखा,
मुझको ताक रही  थी.
पकड़ कर मेरा हाथ
कहा,  सुनो मेरी बात.
मैं आत्मा हूँ, तुम्हारे शहर की ,
अपना हाल बताती  हूँ,
क्या बीती है मुझ पर,
तुम्हे सुनाती  हूँ .
मैंने कहा रुको! बताओ,
ऐसे क्यों हांफ  रही  हो,
कौन सा है भय तुम्हे,
क्यों काँप रही  हो ..
कहने लगी , सुनो मेरे प्रिय !
बात कटु है, मगर है सच्ची
नहीं समझोगे, पछताओगे,
समझ जाओ तो अच्छी .
तुम मनुजों ने काट दिया है
मेरे साँस नली को
इसलिए हांफ रही हूँ.
जरा मरण की सेज पर हूँ,
इस भय से कांप रही हूँ.
मैं पहले वृक्षादित थी .
नदियों में था स्वच्छ पानी
खुलकर साँसे लेती थी .
पीती थी  अमृत पानी.
तुमने वृक्षों को काट  दिया,
नदियों को भी पाट  दिया .
अब नदियाँ  नाला बन
ढोती है गंदा पानी,
इसलिए हुआ हूँ बुढी
रही नहीं जवानी.
मृण्मयी आंगन थे
खूब नहाया करता थी
बच्चे लोटते गोद में मेरी
उन्हें लगाकर मिट्टी ,
खुश हो जाया करती थी,
हवाओं में विष घुला है,
जल में घुला जहर है.
शीघ्र ही तुम सब
मुझ सा हाँफोगे,
इसका  भी मुझको डर है.
जो संसाधन तुम्हे दिया  है.
अंधाधुंध करते हो शोषण,
देकर मुझको कष्ट अपार
निज हित का करते हो  पोषण.
वो रुकी, उसकी नजरें
मेरी नजरों को बेध रही थी.
उसके मुख की करुणा,
मेरे ह्रदय को छेद  रही थी.
फिर बोली,
मेरा एक काम करोगे,
सबको मेरा सन्देश कहोगे
“हर व्यक्ति एक वृक्ष लगाओ ,
नदियों को मत गन्दा करो”
अब नहीं अगर रुके तो,
मैं ही रुक जाऊंगी.
मैं अगर नहीं रही  तो
तुम भी कहाँ रहोगे .
मेरे आँखों में अश्रु थे
ह्रदय दर्द से बोझल था,
कुछ ही पलों में,  वो
मेरी नजरों से ओझल था.
उसने जो सन्देश दिया
वही तुम्हे सुनाता हूँ,
ऊसने जो बात कही,
वही तुम्हे बताता हूँ.


....................“नीरज कुमार”


Wednesday, 5 September 2012

ना मिले मुझे चाँद


ना मिले मुझे चाँद तो कोई गम नहीं,
सूरत मेरे यार की चंदा से कम नहीं.
है, हसीन  दुनियां, जिसके जमाल से,
हर तरफ है रौशनी हुस्नो-आब से.
है, फूलों को भी रस्क, मेरे नसीब से,
खुशबू मेरे यार की फूलों से कम नहीं.
उनके कदम पड़े तो गुलशन भी हँस पड़े,
हुस्न मेरे यार का बहारों से कम नहीं..
वो होंगे और, जिन्हें खुदा की तलाश है,
मुहब्बत मेरे यार की खुदा से कम नहीं..
चाहे मुझे काफिर समझ ले ज़माना,
इश्क मेरे यार का इबादत से कम नहीं..  

            नीरज कुमार 
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