Tuesday, 12 March 2013

अषाढ़ का कर्ज


कुछ लिखा है, कुछ लिखना बाकी है,
मेरे इमान का अभी बिकना बाकी है.

फूल तो खिल के मुरझा चुके
अब कांटो का खिलना बाकी है.

कहते हैं आज़ादी परिवर्तन लाती है,
अभी मुल्क में परिवर्तन आना बाकी है.

लिए तो जो कर्ज पिछले अषाढ़ में,
इस बार भी अकाल है, चुकाना बाकी है.

हरिया के बच्चे शहर चले गए,
अभी हरिया का जाना बाकी है,

उसके बाप की भूख से मौत हो गयी
अभी उसकी लाश का जलाना बाकी है.
#neeraj_kumar_neer

.................... नीरज ‘नीर’ 

16 comments:

  1. सुन्दर लिखा है..

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  2. prabhavshali aur atyant marmik rachna.................... sahi kaha aapne abhi to bahut kuchh baki h

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  3. मार्मिक रचना नीरज ...भूख से मौत इस बार भी सूखा और लाश का अब तक न जलना बहुत भावमयी प्रस्तुति ..
    मेरी नई कविता Os ki boond: झांकते लोग...

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  4. बहुत खूब ... तीसरा शेर तो कमाल है ... आज़ादी आ चुकी है परिवर्तन आना बाकी है ...
    लाजवाब गज़ल ...

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  5. बहुत ही उम्दा और दिल को छू जाने वाली रचना है

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  6. हर शेर एक पर एक हैं. बिलकुल यथार्थ बयान करती.

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  7. वाह !!!बहुत उम्दा प्रभावी सुंदर गजल,,,लाजबाब शेर,,,

    Recent post: होरी नही सुहाय,

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  8. फूल तो खिल के मुरझा चुके
    अब काँटों का खिलना बाकी है
    बहुत सुन्दर ....
    जिन्हें काँटों से हो प्यार
    उनके बेडा हो जाते पार
    काँटों को खोने का
    खौफ नहीं होता ....

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  9. बहुत ही मार्मिक ,आभार

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  10. "कहते हैं आज़ादी परिवर्तन लाती है
    अभी मुल्क में परिवर्तन आना बाकी है "......बहुत बढिया कटाक्ष है मौजूदा परिस्थितियों पर

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  11. सुन्दर प्रस्तुति...

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  12. बहुत उम्दा ,दिल तक पहुँचती ग़ज़ल ....

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  13. बेबाकी से कर रहे, बाकी काम तमाम |
    चालाकी से नहीं हो, करते सब कुछ राम ||

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  14. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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