Thursday, 28 February 2013

जमी हुई नदी


ज्यादा ठण्ड में नदी जम जाती है,
मैं भी जमा रह बरसों
तुमसे मिलकर मैं पिघलने लगा,
तुम्हारी बांहों में आकर
उड़ गया वाष्प बनकर,
कर्पूर की तरह
अस्तित्वहीन हो गया
आनंद की अस्सीमता में
दर्द अक्सर खो जाता है,

फिर फूल मुरझाएंगे
वृक्ष पत्रहीन हो जायेंगे
नदी जम जायेगी
वसंत हमेशा तो नहीं रहता, 


...... नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer

Sunday, 24 February 2013

बम की जात


अभी हैदराबाद में बम विस्फोट हुए, कई निरपराध मारे गए , जिसमे हिंदू थे , मुसलमान भी. बम ने फटने के बाद कोई भेद नहीं किया मारने में हिंदू और मुस्लमान में, उसे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि बम चलाने वाले का मजहब क्या है. इसी बात से प्रेरित है मेरी प्रस्तुत कविता :

बम ना जाने जात कुजात ,
बम जाने ना मजहब  की बात.
बम ना जाने धर्म इमान,
बम देखे ना हिंदू, मुसलमान.
बम का बस है एक ही काम
बम लेता इंसानो  की जान .

बम ना पढता कलमा , आयत ,
ना उसे बाइबिल , गीता का ज्ञान.
बम का एक ही धर्म जहाँ में
बम लेता इंसानो  की जान.

जब तक बम हाथो में है,
तब तक ही बम का है नाम.
हाथों से जो छूट गया फिर
बम का तो अपना ही काम
बम तो केवल बम है, उसके लिए
क्या हिंदू , क्या मुसलमान .
बम का बस है एक ही काम
बम लेता इंसानों  की जान

आतंकी का मजहब होता है,
बम का मजहब  नहीं होता,
बम जब फटता है तो
नाम किसी का नहीं पूछता.

सुनो आतंकवादियों सुनो:
बम फोड़ना इससे पहले
ऐसा कुछ इजाद कर लाओ
मजहब के नाम पर क़त्ल करे
ऐसा बम बनाकर लाओ.
............ नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer

Saturday, 23 February 2013

खट्टे सवाल मीठे जवाब

दोस्तों प्यार से प्यारा कोई एहसास नहीं होता और जब प्यार में दोस्ती भी हो तो क्या कहने फिर हर चीज आसान हो जाती है प्रेमी प्रेमिका एक दुसरे से जो चाहे कहते हैं जो चाहे पूछते हैं. ऐसी ही एक प्रेमिका अपने प्रेमी से कुछ खट्टे सवाल पूछती है और कहती है की जैसे जिस सुर में मै सवाल पूछु उसी सुर में मुझे जवाब चाहिए नहीं तो मै रूठ जाउंगी अब वो क्या पूछती है और क्या जवाब मिलते हैं वो आप खुद ही पढ़ लीजिये

                                         
               

                                     
क्यों चाँद मुझे भाता है,
क्यों वो रोज नहीं आता है ??

ये गजब की बात है चाँद को चाँद ही भाता है,
जब चाँद छुप के तुम्हे देखता है, तब नज़र नहीं आता है  




क्यों सागर नीला होता है
क्यों बादल इतना रोता है?

नीली आँखों से निकला सो सागर नीला होता है.
जब प्यार पे लगता है पहरा, तो बादल इतना रोता है.




क्यों सपने मुझे लुभाते हैं
क्यों फूल इतना शर्माते हैं
??

बिछुडे प्रेमी सपने में मिलते है, सो सपने बहुत लुभाते हैं
देखके फूलों सा कोमल चेहरा , फूल भी शरमाते हैं.




क्यों झरना इतना चंचल है
क्यों कल कल कल कल बहता है??

झरना तेरा दीवाना है सो वो भी चंचल होता है.
देख के तुझको झरना भी कल कल आहें भरता है.





क्यों सूरज अकड दिखता है
क्यों तारो को दूर भगाता है 
??

दिलजला प्रेमी है सूरज सो अकड़ा अकड़ा रहता है
धरती से मिलने आता है सो तारो को दूर भगाता है





सबकुछ मन को भाता है
अनायास क्या हो जाता है
क्यूँ मन उदास हो जाता है
क्यूँ आँखे झर झर बहती है
 ??


जब याद किसी की आती है
ऐसा अक्सर हो जाता है
हँसते हँसते आँखों से यादो का झरना बहता है
जब दिल किसी का रोता है तब आंखें झर झर बहती हैं...

---------------------------------पारुल'पंखुरी'
-----------
नीरज कुमार

ये रचना मेरी  और मेरी  कवयित्री  मित्र पारुल'पंखुरीकी कुछ अनोखा करने की लगन में की गई एक छोटी सी कोशिश है ..आशा है आप सबको यह पसंद आएगी .. अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दे।।। मेरी मित्र का भी एक ब्लॉग है उस पर भी एक बार अवश्य पधारें ..लिंक यहाँ दे रहा  हूँ ...




Wednesday, 20 February 2013

सूखे फूल



सूखे फूलों को कोई उठाने नहीं आता कब से
मैं रूठा हूँ, कोई मनाने नहीं आता कब से

बहार, रंग , नूर, सब फ़ना हो गए
मैं तन्हा बाग में बैठा रहा कब से .

दिल की आरजू की भी उमर होती होगी
मेरे दिल में कोई आरजू नहीं अब, कब से .

अब फूल खिलें भी तो क्या नीरज
फूलों की कोई  चाह्त नहीं रही कब से .


 ....... नीरज कुमार 'नीर' 
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