Tuesday, 23 April 2013

संग राह भी चलती रही

मैं चलता रहा, संग राह भी चलती रही.
यूँ मंजिल ना मिली तमाम उम्र भर.

तीरगी और रौशनी में यूँ तो जंग मुसलसल है.
जलाता रहा चराग मैं तमाम उम्र भर .

नेकी की  जहां भी,  सिला ही मिला ,
होता रहा यूँ ही मैं बदनाम उम्र भर.

तस्वीरे जिंदगी कभी रंगीन ना हुई,
भरता रहा रंग इनमे नाकाम उम्र भर.

मैं खोया रहा गुमनामियों में अकेले ही.
वो सुर्ख़ियों में रहे पढ़कर मेरा कलाम उम्र भर.
................... नीरज कुमार ‘नीर’ 

तीरगी : अँधेरा
मुसलसल: लगातार 

Sunday, 14 April 2013

‘बाल कविता’


प्रस्तुत कविता मैने अपनी बेटी के लिए लिखी है, जो क्लास २ में पढ़ती है, उसे स्कूल में हिंदी कविता पाठ के लिए कविता चाहिए थी, उसने मुझसे कहा कि कविता पाठ के लिए मैं उसे कोई अच्छी सी कविता ढूंढ कर दूँ . मैने उससे कहा कि क्या मैं लिख दूँ , उसने कहा नहीं मुझे तो ढूंढ कर ही दीजिए. मैने पूछा क्यों मैं लिख दूँ तो क्या हर्ज है? उसने कहा आप तो सीरिअस टाइप की कविता लिखते है, मुझे तो फन्नी कविता चाहिए. मैने उसे समझाया कि मैं फन्नी भी लिख सकता हूँ , जिसपर वह राजी हो गयी. मैने उसके लिए यह कविता लिखी जो उसे बहुत बहुत पसंद आयी, उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी .


सुबह सुबह हाथी भाई ,
मेरे घर पर आये ,
सूढ़ उठाकर, पूँछ हिलाकर,
दो-दो दांत दिखाए.

क्या चाहिए हाथी भाई,
खुलकर मुझे बताओ,
क्या हैं आपके हाल चाल,
मुझे भी जरा सुनाओ.

भूखा हूँ आज सुबह से,
हाथी ने फ़रमाया,
ब्रश तो कर लिया है,
कुछ नहीं पर खाया .

जाओ जल्दी से जाकर
खाने को कुछ लाओ,
हाथी भाई आये हैं,
मम्मी को बतलाओ.

मम्मी ने पूछा हाथी से
खाने में क्या लोगे,
यहीं खड़े  खाओगे या
कुर्सी पर बैठोगे.

खाने में मैं लेता हूँ
नब्बे दर्जन केले
चार टब दूध पीता हूँ
खड़े खड़े अकेले .

सुनकर हाथी की बातें
मम्मी का सर चकराया
सुबह सुबह हाथी का बच्चा
मेरे घर क्यों आया .

देखकर मम्मी की हैरानी
हाथी ने हल सुझाया ,
लेकर आओ नोट दस के
बोला और मुस्काया .

लेकर नोट दस का फिर
हाथी ने सूढ़ उठाया
खुश रहने का आशीष दिया
फिर आगे कदम बढ़ाया .
.......... नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer

Tuesday, 9 April 2013

मैं सोया रहा खुली आँखों से रात भर


मैं सोया रहा खुली आँखों से रात भर
तुम मुझमे ही जागते रहे भोर तलक .

कब से थी ख्वाहिश तेरे पहलु में बैठूं ,
मैं तुम्हे देखूं, देखते मेरी ओर अपलक.

कुछ नहीं है तेरे मेरे दरम्याँ फिर भी
मुठ्ठी  भर ख़ामोशी  है और  फलक.

तुम जितनी दूर रहती हो मुझसे
मिलन की बढती  है और ललक.

गालों  पर जो लुढका  पानी खारा
 स्वाद फैल गया दिल के छोर तलक .

…………….. नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer 

Friday, 5 April 2013

सपने और रोटियां


सपने  अक्सर झूठे होते हैं.
मैने झूठ बेचकर सच ख़रीदा है.
सच अपने बूढ़े माँ बाप के लिए,
सच अपने बीवी बच्चों के लिए,
मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां.
सपने सहेजे नहीं जा सकते,
मैं सहेज कर रखता हूँ रोटियाँ,
पेट भरा हो तो नींद गहरी आती है.
गहरी नींद में सपने नहीं आते
मैं नींद में गहरे सोता हूँ.
क्योंकि मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां.
.............  नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer



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