Sunday, 30 June 2013

अदा तुम्हारी अच्छी है

   
वस्ल हो कि जुदाई , हर अदा तुम्हारी अच्छी है.
मुहब्बत में जान लेने की अदा तुम्हारी अच्छी है.


औरों से खुलकर मिलना, मुझसे हिजाब में,
आशिक को तड़पाने की अदा तुम्हारी अच्छी है.


टपके रुखसार पे जो मोती पत्थर मोम हो जाए,
शेर को शायर बनाने की अदा तुम्हारी अच्छी है.


तुम आये चमन में बेरंग फूल सारे हो गए
फूलों से रंग चुराने की अदा तुम्हारी अच्छी है.


बैठे रहे राह में नजरे बिछाए रात भर
नजरें चुराकर जाने की अदा तुम्हारी अच्छी है.

................. नीरज कुमार ‘नीर’      

Monday, 24 June 2013

हिमालय तुम क्यों रोये

हे भागीरथी !
हमें पुरखों से भान था तुम्हारी प्रचंडता का.
परन्तु विश्वास था,
भागीरथ को प्राप्त वर पर,
चंद्रशेखर की सुशोभित जटाओं पर

मानव कल्याण के विहित मार्ग से
जनान्तक क्यों हुई /
भागीरथ प्रयास विफल हुआ /
गंगाधर की जटाओं में तुम ना समाओ/
यह तो परे है प्रज्ञा की सीमा से/
असीम दिगंत की इच्छा मात्र से ही तो तुम भी हो .
******
हे केदार नाथ !
आप अपने दिए वर से विचलित हो,
यह तो परे है, बुद्धि की सीमा से/
यह कार्य कारणवाद भी तो नहीं/
तर्क और विवेक की सीमा है/
सम्यकता की भी सीमा है.
हृदय विह्वल है,
मेरी विह्वलता यद्यपि अर्थहीन है.
****
हे हिमालय!
तुम क्यों रोये ?
तुम रक्षक थे भारती के ,
उनके पुत्रों की रक्षा भी दायित्व था तुम्हारा .
अपने अधिपति के भक्तों को मृत्यु मुख में डाला .
कई होंगे तुम्हारे अपराधी,
तुम्हें नंगा करने वाले,
प्रदूषित करने वाले,
पर इसकी इतनी वृहद सजा
बगैर, भेद के.
हिमालय सा धैर्य
हिमालय सी सहिष्णुता
अर्थ खो चुकी है .

...... नीरज कुमार ‘नीर’
    

Thursday, 20 June 2013

नदी पागल हो गयी है

       
       जब सम्मान के साथ होता है खिलवाड़,
आबरू होती है बार बार
तार तार.
बचाव की नहीं होती
कोई उम्मीद,
सीमा की जाती है
अतिक्रमित लगातार.
मर्यादा का किया जाता है,
खुला उल्लंघन.
जब संकट होता है अस्तित्व का,
निस्सहाय, बेबस, निरावलंब
स्त्री हो जाती है पागल.
मिटा देना चाहती है
आतातायियों के जुल्म को,
कर देना चाहती है उसका समूल नाश.
नदी स्त्री है,
नदी पागल हो गयी है..

........नीरज कुमार ‘नीर’

(चित्र गूगल से साभार)

Saturday, 8 June 2013

मजा कुछ और है



दिन रात मुहब्बत में रहने का मजा कुछ और है,
तेरी  जुदाई  में  जलने  का मजा  कुछ  और   है.

यादों   के  मौसम  में  आंखे  बंद  करके  रखता  हूँ ,
तस्सवुर में महबूब से मिलने का मजा कुछ और है.

यूँ तो रौशनी  बहुत  जरूरी है,  जिन्दगी के लिए,
कुछ पल अंधेरों से गुजरने का मजा कुछ और है.

मंजिल तो पा जाते हैं सभी सीधी राह चलके,
राहों में  कभी भटकने  का मजा कुछ और है.

बंद हो दरवाजे चाहे  दरीचे सभी जानां  के घर के,
महबूब की गली से गुजरने का मजा कुछ और है.

यूँ तो मसर्रत बहुत है फूलों सा खिलने में ‘नीरज’,
किसी की खातिर बिखरने का  मजा कुछ और है.

हक की  राह  में  मौत  भी  आ  जाये  तो  क्या,
सच्चाई की खातिर मरने का मजा कुछ और है.

................. नीरज कुमार ‘नीर’    
#neeraj_kumar_neer 


Sunday, 2 June 2013

अवतार अब जरूरी है.

जब जीना मरने से मुश्किल लगे
अवनत स्वाभिमान प्रतिपल लगे
जब आगे बढ़ने की कोई चाह नहीं
व्यूह से बाहर की कोई राह नहीं

जब कोई बोले मीठे बोल नहीं
शोणित का जब कोई मोल नहीं
जब लहू का स्वाद मीठा लगे
अपनों का विश्वास झूठा लगे .

विजय पताका वाले हाथों में
जब भीख का कटोरा हो
राजमहल के कंगूरों पर
चढ़कर जब कोई रोता हो .

जब काबिल के घर फाका हो
जब मेधा पर पड़ता डाका हो
जब शांति हो नगर में
श्मशानों में हो कोलाहल
सीधे साधे प्रश्नों का
जब मुश्किल होता हो हल .

ऐसे ही अवसानो में
जब तूती बजती नक्कारखानों में
थाम काल का चक्र घुमाता है
आता है जग को नयी दिशा दिखाता है.
ढोता है कन्धों पर परिवर्तन का जुआ
ऐसा ही युग पुरुष अवतार कहलाता है

अवतार होते नहीं अवतरित
अवतरित होते है उनमे गुण
गुण जो होते है महामानवीय
जो प्राप्य है त्याग और तपस्या के बल पर.
गुण जो बनाते है किसी को
राम और कृष्ण , देते है नाम
किसी को बुद्ध का.
मेरे मन में है एक यक्ष प्रश्न
क्या वक्त नहीं आया
एक अवतार का ??




 ........... नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer 
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