Saturday, 31 August 2013

काठ की हांडी



काल के चूल्हे पर
काठ की हांडी
चढ़ाते हो बार बार .
हर बार नयी हांडी
पहचानते नहीं काल चिन्ह को
सीखते नहीं अतीत से .
दिवस के अवसान पर
खो जाते हो
तमस के आवरण के भीतर
रास रंग और श्रृंगार में .
आँखों पर चढ़ा लिया
झूठ और ढकोसले का चश्मा.
अपनी कायरता को प्रगतिशीलता का नाम देकर .
तुम्हे साफ़ दिखाई नहीं देता.
तुम सच देखना भी नहीं चाहते .
क्षणिक स्वार्थों ने तुम्हे अँधा कर दिया.
पर याद रखना
निरपेक्षता , निष्क्रियता से बड़ा अपराध है .
हिजड़ों का भी एक अपना पक्ष होता है ..

…………. नीरज  कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer 

Saturday, 24 August 2013

सुखद स्मृतियाँ


           

दुमहले के ऊँचे वातायन से
हलके पदचापों सहित  
चुपके से होती प्रविष्ट
मखमली अंगों में समेट
कर देती निहाल . 
स्वयं में समाकर एकाकार कर लेती,
घुल जाता मेरा अस्तित्व
पानी में रंग की तरह. 
अम्बर के अलगनी पर
टांग दिए हैं वक्त ने काले मेघ,
चन्द्रमा आवृत है , ज्योत्सना बाधित,
अस्निग्ध हाड़ जल रहा
सीली लकड़ियों की तरह.
स्मृति मञ्जूषा में तह कर रखी हुई हैं
सुखद स्मृतियाँ.....

........ नीरज कुमार ‘नीर’

Tuesday, 20 August 2013

कौन हो तुम जन गण मन के अधिनायक ?


कौन हो तुम ?
जन गण मन के अधिनायक.
कहाँ रहते हो ?
मैं तुम्हारी जय कहना चाहता हूँ.
बरसों से हूँ मैं तुम्हारी खोज में,
तुम शून्य हो या हो सर्वव्यापी,
ईश्वर की तरह .
कौन हो तुम ?
तुम भारत भूमि तो नहीं ,
भारत तो माता है,
माता कभी अधिनायक तो नहीं होती .
तुम हो भारत भाग्य विधाता .
फिर बदला क्यों नहीं भारत का भाग्य.
भारत के भाग्य का ऐसा क्यों लिखा विधान.
कैसे विधाता हो ?
तुम्हारा स्वरुप तुम्हारी प्रकृति कैसी है?
मैं तुम्हारी जय कहना चाहता हूँ
मन मथ रहा है ..

............... नीरज कुमार ‘नीर’

Saturday, 17 August 2013

सूरज के घोड़े


सूरज के घोड़े चलते हैं निरंतर,
इस कोने से उस कोने तक ताकि
प्रकाश फैले कोने कोने में.
लेकिन घोड़ों के घर ही में रहता है अँधेरा.
प्रकाश उनसे ही रहता है दूर.
लेकिन उन्हें बोलने की इजाजत नहीं  
मांगना उन्हें वर्जित है
घोड़े के मुंह में लगा होता है लगाम
उन्हें रूकने, हांफने और सुस्ताने की भी इजाजत नहीं
उन्हें बस चलते रहना है ताकि सूरज चल सके
निरंतर, निर्बाध.
डर है, रुके तो हिनहिना उठेंगे .
उनके आँखों पर लगी होती है पट्टी
ताकि वे देखें सीधा .
अगल बगल की सुन्दरता , रंग बिरंगी तितलियाँ,
उन्हें यह सब देखने की इजाजत नहीं है.
उनका तो काम है चलना, आगे सीधी राह में.
उन्हें चलना है सीधे , बगैर इधर उधर देखे.
बगैर ज्यादा की इच्छा के ताकि प्रकाश फैला रहे.
डर है कि इधर उधर देखा तो हिनहिना उठेंगे.
उनके मुंह पर लगी है जाबी
उन्हें बोलने की इजाजत नहीं है.
डर है  बोला तो हिनहिना उठेंगे ..
घोड़ों के हिनहिनाने से फ़ैल जायेया अँधेरा
उनके घरों में,  जो कभी नहीं बने घोड़े.
घोड़े होते हैं विभिन्न रंगों के
श्वेत, श्याम ,
छोटे घोड़े , बड़े  घोड़े  
दलित,  पिछड़े, आदिवासी और सवर्ण घोड़े ..

.......................... नीरज कुमार ‘नीर’ 
चित्र गूगल से साभार .

Thursday, 15 August 2013

भारत भूमि

आप सभी पढने वालों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें. उम्मीद और प्रार्थना कीजिये कि स्वतंत्रता सदा सर्वदा बनी रहे . जय हिन्द .
****
             

भारत भूमि  श्यामल आंचल
बहती सुर सरिता निर्झर कल कल.
श्वेत शिखर तुंग वृहत हिमालय
उर्जा नव ज्ञान बल संतृप्त शिवालय .
गुरुओं की धरा, सुख से भरा
निपुण हाथ, कब दुःख में डरा.
सुख बड़ा पर्वत से, अंतस का
रहा स्वामी सदैव निज मन का.
मद्धम ज्योति दीप तैल भरा  
स्वतंत्रता देवी रही मुस्कुरा.

....... नीरज कुमार ‘नीर’

Friday, 9 August 2013

दिल्ली में फिर नादिर

अभी सीमा पर पांच भारतीय सैनिकों की हत्या पाकिस्तानी सेना के द्वारा कर दी गयी , मेरी कविता समर्पित है उन्हीं सैनिकों को. अच्छी लगे तो कमेन्ट जरूर दीजिये . 
*****

शरीफों में शराफत नहीं
सिंह बकरी सा मिमियाए.
देख के, भारत माता का
आंचल भी शर्माए.
**********
दुष्ट कब समझा है जग में
निश्छल प्रेम की परिभाषा.
अपनी ही लाशों पर लिखोगे
क्या देश की अभिलाषा.

लाल पत्थर की दीवारें भी
महफूज़ नहीं रख पाएंगी .
सीमा पर बही रक्त जब
दिल्ली तक तीर आएगी .

सत्ता सुख क्षणिक है
सदैव नहीं रह पायेगा.
दिल्ली की चौड़ी सड़कों पर
जब फिर से नादिर आएगा.

सत्ता के स्वार्थ में
इतिहास भुला कर बैठे हैं.
तत्क्षण रौशनी के लिए
घर को जला कर बैठे हैं.

वंचक है, खुद ही को ठग रहे
दीवाने हैं, ये सत्ता के मलंग है .
अपनी संतती को निगलने वाले
काले विषधर भुजंग हैं .

दह में उतरकर भीतर
व्याल बांधना होगा.
तोड़ दन्त विषधर  के
हथेलियों में फन थामना होगा .

कवि कर्म है मेरा
तुम्हें जगाता रहता हूँ.
आने वाले कल की
तस्वीर दिखाता रहता हूँ.

आँखें बंद कर लेने से
तस्वीर नहीं बदलती है .
दवा कडवी हो कितनी भी
फिर भी निगलनी पड़ती है .

          ..................नीरज कुमार ‘नीर’


कुछ शब्दार्थ /भावार्थ :
1.     शरीफ : प्रत्यक्ष में नवाज शरीफ, वैसे सभी लोग जो खुद को सभ्य दिखाते हैं परन्तु अन्दर से कुटिल होते हैं.
2.     सिंह : भारत में सबसे ज्यादा सिंह है, जंगल का राजा भी और आदमी भी जो सिंह का टाइटल रखते हैं, फिर भी भारत एक कमजोर राष्ट्र है .
3.     भारत माँ का आंचल: माँ आंचल में छुपाकर बच्चों को दूध पिलाती है , वैसे आजकल नहीं पिलाती ये अलग बात है, लेकिन भारत माँ की कल्पना वैसे माँ के रूप में है जो दूध पिलाती है ..

4.     लाल पत्थर की दीवारें : दिल्ली में संसद समेत कई भवन जो लाल पत्थर से बने है. 
5.     नादिर : नादिर शाह, कुख्यात विदेशी आक्रमण कारी जिसने दिल्ली को लूटा एवं लाखों लोगों को क़त्ल किया.  
6.     वंचक : ठग   
7.     दह : यमुना में वह जगह जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने कालिया दमन किया था .
8. व्याल : सर्प 


Sunday, 4 August 2013

दोस्त

       आज मित्रता दिवस पर विशेष , मेरे सभी मित्रों को समर्पित :     

  दोस्त जो होता है
होता है कुछ खास.
दोस्ती होती है एक
सुनहरा एहसास.
दोस्त स्वीकारता है
हमें, यूँ ही हमारे
गुण दोषों के साथ.
धुप में छांव में
वर्षा में घाम में
रहता है साथ साथ.
ख़ुशी में गम में
ज्यादा या कम में
रहता है हमेशा साथ .
देखते ही जिसे
नाचता है मन मयूर
खिल उठता है
जिसके आने से
अंतस उपवन में फूल
दोस्त बांटता है, चीजों को हमसे
हमारी चीजों को नहीं बांटता .
तूफानों में बनता है कश्ती,

अंधियारे में दीपक बन जलता. .
    
......... नीरज कुमार ‘नीर’

चित्र गूगल से साभार 

Saturday, 3 August 2013

कुछ ख्याल यूँ ही :


नन्हे अब्र को सूरज निगलते देखा है ,
हौसला हो अगर मुकद्दर बदलते देखा है,
जूनून हो पक्का तो मुश्किल कुछ भी नही ,
मैंने पानी में पर्वत पिघलते देखा है .
(अब्र : बादल)
******************
घावों पे लगाने को मरहम काम आता है
राह में भटके तो रहबर काम आता है
किस किस से छुपाऊँ राज –ए- दिल हमदम
मेरी हर सांस पर तुम्हारा नाम आता है .
*************
चाँद को देखा तो पाने को जी चाहा,
गुलों को देखा तो छूने को जी चाहा ,
चाहत पर काबू किसका चला है भला,
तेरी होठों से मय पीने को जी चाहा .
*************
कोई याद करता है आपको भला कैसे बताएगा,
आप मर जायेंगी , इल्जाम हिचकियों पे जाएगा.
भर देगा याद में अश्कों का समन्दर रो रो के,
पानी खारा होगा, इल्जाम सिसकियों पे जाएगा.
***********
तकदीर हो बिगड़ी तो तदबीर नहीं बनती
हर ख्वाब की एक सी ताबीर नहीं बनती .
दुआ दुआ में भी कुछ फर्क होता है,
हर दुआ की एक सी तासीर नहीं बनती.
**********
....................नीरज कुमार 'नीर' 
चित्र गूगल से साभार 

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