Thursday, 25 December 2014

माँ का प्यार

सितारों से सजे 
बड़े बड़े होटलों में,
नरम नरम गद्दियों वाली कुर्सियां,
करीने से सजी मेजें,
मद्धिम प्रकाश,
अदब से खड़े वेटर,
खूबसूरत मेन्यू पर दर्ज,
तरह तरह के नामों वाले व्यंजन,
खाते हुए फिर भी
स्वाद में 
कुछ कमी सी रहती है.
याद आता है
 माँ  के हाथों  का खाना
खाने के साथ 
माँ परोसती थी 
प्यार..
....नीरज कुमार ‘नीर’
neeraj kumar neer 

Saturday, 20 December 2014

कसैली निंबौरिया


मुझे अच्छी लगती है 
निंबौरियां और 
उसका कसैलापन
पीली निबौरियों  की कड़वाहट
जब घुलती है 
गौण कर देती हैं  
अंतर के आत्यंतिक कड़वाहट को भी।  
तुमने जो भर रखी है 
मुट्ठी में  निंबौरिया 
क्या एक दोगी मुझे?
मैं आत्म विस्मृत होना चाहता हूँ
कुछ पल के लिए। 
मैं लौटा दूँगा तुम्हें 
तुम्हारे हाथों की मिठास और
नीम की घनी छांव
   
...... नीरज कुमार नीर........
neeraj kumar neer 

Thursday, 18 December 2014

कौआ बोला कांव कांव : एक बाल कविता


कौआ बोला कांव कांव
बिल्ली बोली म्याऊँ म्याऊँ
मे मे करके बकरी भागी
शेर बोला किसको खाऊँ ॥

भों भों करता कुत्ता आया
आसमान में चील चिल्लाया
चीं चीं करता चूहा बोला
कहाँ जाऊँ मैं कहाँ जाऊँ

सूढ़ उठा हाथी चिंघाड़ा
हिनहिना कर दौड़ा घोड़ा
कछुआ ने खरगोश से बोला
ठहर जरा तो मैं भी आऊँ

मुर्गे ने दी ज़ोर की बांग
ऊँट की लंबी लंबी टांग
बारिश हुई मेढक टर्राया
अब तो पानी मे मैं जाऊँ ॥
……. Neeraj kumar neer
21/10/2014

Thursday, 4 December 2014

माँ है मेरी वो


चलती अहर्निश
रूकती नहीं है
माँ है मेरी वो
थकती नहीं है

निष्काम  निरंतर 
लेती है मेरी हर 
  कष्ट हर
किसी से कुछ भी
कहती नहीं है

चाँद डूबने से पहले
चाँद चढ़ जाने तक
खग के  उठने से पहले
सबके सो जाने तक
रहती दौड़ती
ठहरती नहीं है 

खाना पीना  राशन वासन
कपड़े लत्ते दीये दवाई
शिक्षा दीक्षा नाते रिश्ते
पूजा पंडित सर सफाई
निभाती है सभी
ऊबती नहीं है

चलती अहर्निश
रूकती नहीं है
माँ है मेरी वो
थकती नहीं है...
.........
नीरज कुमार नीर .........
neeraj kumar neer 

चाँद का डूबना यानि सुबह होना .... 
चाँद का चढ़ना यानि देर रात हो जाना। 


Saturday, 29 November 2014

लीक पकड़ मैं चला नहीं


लीक पकड़
 मैं चला नहीं 
मुझे पथ बनाना आता है 
अँधियारों से 
डरा नहीं  
 मुझे दीप जलाना आता है ॥ 

हुआ जब दिग्भ्रांत 
लगा ध्यान देखा 
ध्रुव ही की ओर 
रवि का क्या 
वह तो  
सुख भर साथ निभाता है ॥ 

अग्नि वीणा के तारों को 
छूकर के 
झंकार दिया 
नफरत पथ के पथिक को 
निश्छल होकर 
प्यार दिया 
पत्थर पर
थाप लगाकर 
मृदंग बजाना आता है ।
लीक पकड़ मैं 
चला नहीं 
मुझे  पथ बनाना आता है 

सौंदर्य नहीं कुसुमाकर का 
शूल हूँ 
सुमन का रखवाला 
अपनी वज्र हथेलियों पर  
नव कुसुम 
खिलाना आता है । 

भाव में हरिवास  
कण कण घट घट
तत्व एहसास 
पाषाणों मे भरकर प्राण
 उन्हें 
भगवान बनाना आता है ।  
लीक पकड़ मैं 
चला नहीं 
मुझे 
पथ बनाना आता है । 
....... 
#नीरज कुमार नीर 
#Neeraj kumar neer  
#motivational_poem #motivation #प्रेरक_कविता 

Friday, 21 November 2014

जालिम कैसे निबाहता है रस्म ए इश्क़


जालिम कैसे निबाहता है रस्म ए इश्क़
पहले याद करता है फिर भुला देता है

आता है कभी करीब फिर दूर जाता है
देता है गम ए दिल और  रूला देता है

रहती है जब उम्मीद तो आता ही नहीं 
आता है रातों को और जगा देता है

रोशनी फैले भी तो कैसे हयात में 
जलाता है इक दीया फिर बुझा देता है

उनके अंदाजे बरहमी के क्या कहिए   
जाने को कहता है फिर सदा देता है॥ 
#नीरज कुमार नीर ...... 
#neeraj kumar neer 
#गजल #gazal #love #shayari #इश्क़ 

Friday, 14 November 2014

अपना भारत देश महान : बाल कविता

26 जनवरी 2015 को दैनिक जागरण में प्रकाशित 

उत्तर में हिमालय इसके 
है पश्चिम मे पाकिस्तान । 
हिन्द महासागर दक्षिण में,  
अपना भारत देश महान ।

पूरब में बंगाल की खाड़ी 
पश्चिम सागर अरब विशाल 
गर्व हमे अपने देश पर 
लोकतन्त्र की यह मिसाल ॥

सैकड़ों किस्म के धर्म, जाति 
अनेक प्रकार की  वाणी। 
गंगा नदी सबसे बड़ी , 
दिल्ली इसकी राजधानी  । 

दक्षिण में  केरल, तमिलनाडू 
है , कर्नाटक, आंध्र प्रदेश। 
जनसंख्या के गणित से तो  
सबसे बड़ा उत्तर प्रदेश ॥

राजस्थान में रेगिस्तान 
आगरा मे है ताजमहल 
मुंबई मे सिनेमा की 
रहती सदा ही चहल पहल। 

भारत भूमि प्यारी हमको 
करते सदा इसको नमन 
देश की रक्षा के हेतू 
तन, मन, धन कर दें अर्पण।  
.............
 नीरज कुमार नीर / 15/09/2014 


Wednesday, 12 November 2014

सदा शादी से बचना तुम : एक हास्य कविता

सिर्फ हँसने के लिए , अमल करना सख्त मना है :)  :)


अगर मेरा कहा मानो 
सदा शादी से बचना तुम ॥ 

पंख होंगे मगर फिर भी 
कभी तुम उड़  ना पाओगे 
मुंह के बल गिरोगे और 
सदा धरती पे आओगे
सुनहरा जाल है शादी 
कभी इसमे ना फंसना तुम ।

कभी शॉपिंग, कभी मूवी,
रेस्टोरेन्ट रोजाना 
कभी सर्दी, कभी खांसी 
कभी हेडेक का बहाना 
बड़े होते इनके नखरे
इनसे बच के रहना तुम॥  

कभी चौका , कभी बर्तन,
कभी कपड़े भी धोओगे 
पकड़कर हाथ से माथा 
बार बार रोओगे 
मुसीबत चीज है बीबी 
कभी घर न लाना तुम॥  

किसी नाजनीना से 
निगाहें चार कर लोगे
भूले से किसी हसीं से 
बातें दो चार कर लोगे 
होगी ऐसी खिचाई कि 
हँसना भूल जाओगे 
मुहब्बत चीज क्या है, तुम
ये कहना भूल जाओगे 
आजादी बड़ी नेमत है 
इसको न खोना तुम।    

अगर मेरा कहा मानो 
सदा शादी से बचना तुम 

 (c)  ...... #नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer

#शादी #shadi #biwi #मुहब्बत #love #hasyakavita  #हास्य_कविता  

Saturday, 1 November 2014

जब तुम नहीं थे तुम्हारी यादों की खुशबू आई


जब तुम नहीं थे,  तुम्हारी
यादों की खुशबू आई

हर गली,  हर घड़ी
मोड़ जो भी मुड़ा
बस्ती, जंगल,
भीड़ या कि तन्हाई
संग  संग मेरे रही
सदा तुम्हारी परछाई ।

जब तुम नहीं थे तुम्हारी
यादों की खुशबू आई

घने धूप का डेरा
या अँधियारे ने घेरा
बादे शबा थी या कि
डूबते सूरज की लालाई
काल सागर पर
स्मृति लहरें
लेती रही अंगड़ाई ।

जब तुम नहीं थे तुम्हारी
यादों की खुशबू आई

जिंदगी बरहम रही
आँधियाँ लौ बुझा आई
मन के आँगन मे
 रही,  बहती
आँचल की पूरबाई

जब तुम नहीं थे तुम्हारी
यादों की खुशबू आई
(c) neeraj kumar neer 

Thursday, 30 October 2014

फेनिल जल


कोमल फेन
हाथ आते ही बन जाता जल 
भीतर रहता 
हिल्लोल लेता 
महासागर अतल 
यह फेनिल जल 
जाकर छू आता 
अंतर्तल 
फिर आता सवार होकर 
लहरों पर 
स्वप्न टूटता और 
साहिल का माया जाल भी 
बच जाता महा सागर 
अनंत अतल।  
Neeraj neer / 25/10/2014

Wednesday, 22 October 2014

आस का दीप जलाए रखना

आप सभी मित्रों एवं पाठकों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें। 
इस अवसर पर प्रस्तुत है एक कविता :


हो अंधेरा कितना जग में 
आस का दीप जलाए रखना 
सत्य की जय सदा होती है 
यह विश्वास बनाए रखना।।  

जीवन पथ  में चलते चलते 
मिल जाये बनवास अगर भी 
चुपके से आकर दुःस्वप्न में 
ढल जाये मधुमास अगर भी 
अच्छे दिन फिर फिर आएंगे 
हृदय उम्मीद जगाए रखना॥ 

सीता की रक्षा करने को  
रावण से लड़ना पड़ जाये 
पाने अपने अधिकारों को 
कंसो से भिड़ना पड़ जाये
तुम राम कृष्ण के वंशज हो 
मन पराक्रम बनाए रखना ॥

नन्हें दीये की लौ से भी 
सौ सौ दीया जल सकता है 
साहस  भरा हो अंतस मे 
तो हर विघ्न टल सकता है 
विजय वीर को ही वरती है 
धीरज ध्वज उठाए चलना

हो अंधेरा कितना जग में 
आस का दीप जलाए रखना 
सत्य की जय सदा होती है 
यह विश्वास बनाए रखना 
……
(c) #नीरज_कुमार_नीर 
#Neeraj_kumar_neer 
21/10/2014
(क्या आपको यह कविता अच्छी लगी ?)
#motivational #Hindi_poem #प्रेरक #हिन्दी_कविता #ram #sita #ravan 

Friday, 17 October 2014

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ


पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ,
नापना गगन वितान चाहता हूँ । 

फुनगियों पर अँधेरा है 
आसमान में पहरा है। 
जवाब है जिसको देना
वो हाकिम ही बहरा है।  
तमस मिटे नव विहान चाहता हूँ। 

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ ,
नापना गगन वितान चाहता हूँ। 

अंबर भरा है कीचड़ से , 
और धरा  पर  सूखा है। 
दल्लों के घर दूध मलाई, 
मेहनत कश पर भूखा है।
पेट भरे ससम्मान चाहता हूँ। 

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ ,
नापना गगन वितान चाहता हूँ। 

शिक्षा और रोटी के बदले,
धर्म ही लेकिन लेते छीन .  
स्वयं ही को श्रेष्ठ बताते 
बाकी सबको कहते हीन। 
धर्म का ध्येय  निर्वाण चाहता हूँ। 

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ ,
 नापना गगन वितान चाहता हूँ। 

घूमते धर्म की पट्टी बांध   
संवेदना से कितने दूर 
बात अमन की करते लेकिन   
कृत्य करते वीभत्स क्रूर 
सबको समझे इंसान चाहता हूँ।

पंख नहीं है उड़ान चाहता हूँ ,
नापना गगन वितान चाहता हूँ । 
….
नीरज  कुमार नीर 
#neerajkumarneer
(आपको कैसी लगी बताइएगा जरूर )
                               

Monday, 13 October 2014

तुम हँसती होगी बजते होंगे जलतरंग


तुम अब भी हँसती होगी बजते होंगे जलतरंग
अब  भी तेरे  आने  से गुल बदलते होंगे रंग। 

एक हम नहीं तो क्या साहेब पूरी महफिल तो है
अब भी तेरी  मुस्कान  पे सब  होते होंगे दंग । 

नदी वही, सब पर्वत, सागर, शजर,  आवो हवा वही
वही  संदल  की खुश्बू  तुम्हें  लगाते  होंगे अंग । 

चातक के मिट जाने से चाँद कहाँ मिट जाता  है
चाँद  चाँदनी  पूनम  रातें  रहते  होंगे  संग । 

अब भी तुम गाती होगी  अब भी झरते होंगे फूल
बेरंग ख़िज़ाँ के मौसम मे भर जाते होंगे रंग । 
-------
 (c) नीरज नीर 
#neeraj neer 

Thursday, 9 October 2014

तेरी याद का बादल आँखों से बरसता है


तेरी याद का बादल आँखों से बरसता है 
वस्ले  यार को दीवाना दिल  तरसता है॥ 

हो जायेगा फ़ना जुदाई की आंच में तपकर 
मोम का एक पुतला है गरमी में पिघलता है ॥ 

इश्क  की दुनियां का कायदा ना पूछिए   
दीवाना सूरज यहाँ पच्छिम से निकलता है ॥ 

मुहब्बत में रोना बहुत होता  है  नीरज 
इश्क का दरिया  समन्दर से निकलता है  ॥ 

अंधेरे की आदत है शिकायत नहीं कुछ भी 
जुगनू की फितरत है अंधेरे मे चमकता है॥

#नीरज_कुमार_नीर 
#neeraj_kumar_neer
#gazal दीवाना #deewana #जुदाई 

Friday, 19 September 2014

पानी को तलवार से काटते क्यों हो ?


पानी को तलवार से काटते क्यों हो ?
हिन्दी हैं हम सब, हमे बांटते क्यों हो ?

चरखे पे मजहब  की पूनी चढ़ा कर के ,
सूत  नफरत की यहाँ कातते क्यों हो  ?

हो सभी को आईना फिरते दिखाते ,
आईने से खुद मगर भागते क्यों हो ?

गर करोगे प्यार , बदले वही पाओगे, 
वास्ता मजहब का देके मांगते क्यों हो ?

भर लिया है खूब तुमने तिजोरी तो ,
चैन से सो, रातों को जागते क्यों हो ?

दाम कौड़ियों के हो बेचते सच को 
रोच परचम झूठ का छापते क्यों हो ?

धर्म और ईमान के गर मुहाफ़िज़ हो 
मज़लूमों को फिर भला मारते क्यों हो ? 
-----------
(c)   नीरज  नीर 

अगर बात अच्छी लगे तो अपनी टिप्पणी अवश्य दें । 

Thursday, 11 September 2014

की दवा जितनी मरज़ बढ़ता गया

की दवा जितनी मरज़ बढ़ता गया, 
दोपहर के धूप सा चढ़ता गया।

खूं बहाने की वहीं तैयारियां,
अम्न का मरकज जिसे समझा गया।

साँप हैं पाले हुए आस्तीनों में, 
दूध पीया और ही बढ़ता गया ।

है उसी की ही वजह से आसमां,
राह में जो भी मिला कहता गया।

बढ़ गयी कुछ और ही उसकी चमक, 
सोना ज्यों ज्यों आंच में तपता गया ।
....... 
#नीरज कुमार नीर 
#Neeraj_kumar_neer
#gazal 


Tuesday, 2 September 2014

प्यार और बेड़ियाँ


एक पुरुष करता है 
अपनी स्त्री  से बहुत प्यार. 
वह उसे खोना नहीं चाहता है ,
उसपर चाहता है एकाधिकार । 
उसने डाल दी है 
उसके पांवों में बेड़ियाँ. 
स्त्री भी करती है
उससे बेपनाह मुहब्बत. 
वह भी उसे खोना नहीं चाहती. 
पर वह नहीं डाल पाती है 
उसके पैरों में बेड़ियाँ. 
बेड़ियाँ मिलती हैं बाजार में 
खरीदी जाती हैं पैसों के बल पर.

नीरज कुमार नीर ..
                                                                  Neeraj Kumar Neer 

Saturday, 23 August 2014

न जाने कब चाँद निकलेगा


जब सूरज चला जाता है 
अस्ताचल की ओट में 
और चाँद नहीं निकलता है.
दिखती है उफक पर 
पश्चिम दिशा की ओर 
लाल लकीरें.
पूरब में काली आँखों वाला राक्षस 
खोलता है मुंह 
लेता है जोर की साँसे 
चलती है तेज हवाएं. 
लाल लकीरें डूब जाती हैं,
फिर सब हो जाता है प्रशांत.
मैं पाता हूँ स्वयं को 
एक अंध विवर में 
हो जाता हूँ विलीन
तम से एकाकार .
खो जाता है मेरा वजूद.
न जाने कब चाँद निकलेगा.

 (C) ..  नीरज कुमार नीर  .
Neeraj Kumar Neer 
चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, 5 August 2014

दो हाथ की दुनियां :वागर्थ में प्रकाशित


लकीरें  गहरी हो गयी है ,
बुधुआ मांझी के माथे की .
स्याह तल पर उभर आये कई खारे झील .
सिमट गया  है आकाश का सारा विस्तार
उसके आस पास.
दुनियां हो गयी है दो हाथ की.

मिट्टी का घर, छोटे बच्चे, बैल, बकरियां और
खेत का छोटा सा टुकड़ा
इससे आगे है एक मोटी दीवार
बिना खेत और घर के कैसे जियेगा?
इससे जुदा क्या दुनियां हो सकती है ?

उनकी जमीन के नीचे ही क्यों निकलता है कोयला ?
पर  वह  किस पर करे क्रोध
अपने भाग्य पर , पूर्वजों पर , सिंग बोंगा पर ?
उसके आगे है घुप्प अँधेरा
वह धंसता जा रहा है जमीन के अन्दर
उसकी देह परिवर्तित हो रही काले पत्थर में

इस  कोयले में शामिल है उसके पूर्वजों की अस्थियाँ.
उनके पूर्वज भी उन्हीं की तरह काले थे.
क्या यूँ ही उजाड़े जाते लोग
अगर कोयला सफ़ेद होता?
उसकी आँखे दहक उठी है अंगारे की तरह
आग लग गयी है कोयले की खदान में..

..    #नीरज कुमार नीर ..    #neeraj kumar neer

 सिंग बोंगा : आदिवासियों के देवता
#tribals #adiwasi #koyla #environment #motivational #hindi_poem #हिन्दीकविता 

Saturday, 5 July 2014

कुत्ते का बच्चा


कुत्ते का बच्चा 
गया मर, 
एड़ियाँ रगड़,
किसे फिकर, 
काली चमकती सड़क,
चलती गाड़ियाँ बेधड़क, 
बैठा हाकिम अकड़, 
कलफ़ कड़क, 
सड़क पर किसका हक़?
क्यों रहा भड़क? 
किसके लिए बनी 
काली चमकती सड़क?
कुत्ता कितना कुत्ता है 
चला आता है, 
धुल भरी पगडंडियां 
गाँव की 
छोड़कर.
********
.. नीरज कुमार नीर
(नोट :कृपया कुत्ते शब्द से किसी जानवर का संदर्भ न लें )

Tuesday, 1 July 2014

खारे पानी के जीव


जब सूरज डूब जायेगा,
सब कुछ समा जाएगा,
महासागर की अतल गहराइयों में.
पर्वत का तुंग शिखर भी
नहीं बचेगा तृण मात्र
हड्डियों तक का नहीं रहेगा अस्तित्व.
जीवित रहेंगे फिर भी
खारे पानी के जीव ..
...............
नीरज कुमार नीर 

Friday, 27 June 2014

कांच की दीवार

तुम्हारे और मेरे बीच है
कांच की एक मोटी दीवार.
जो कभी कभी अदृश्य प्रतीत होती है
और पैदा करती है विभ्रम
तुम्हारे मेरे पास होने का.

मैं कह जाता हूँ अपनी बात
तुम्हें सुनाने की उम्मीद में.
तुम्हारे शब्दों का खुद से ही
कुछ अर्थ लगा लेता हूँ.

क्या तुम समझ पाती होगी
मैं जो कहता हूँ ?
क्या मैं सही अर्थ लगाता हूँ
जो तुम कहती हो?

कांच की इस दीवार पर
डाल दिए हैं कुछ रंगीन छीटें.
ताकि विभ्रम की स्थिति में
मुझे सत्य बता सकें .

कांच के उस पार से
तुम्हे देखना अच्छा लगता है.
अच्छा लगता है तुम्हारी
अनसुनी बातों का
खुद के हिसाब से अर्थ लगाना ..

#नीरज कुमार नीर
#neeraj
#love #pyar #pyar #प्रेम #हिन्दी #hindikavita 

Tuesday, 24 June 2014

बेटा हमारा बड़ा नाम करेगा


वह जब लिखता है कविता या
बनाता है कोई चित्र..
चढ़ जाती हैं त्यौरियां,
तन जाती हैं भवें,
उठते हैं कई सवाल,
फुसफुसाहट का शोर
गूंजता है मन के
भीतर तक ,
भेदता है अस्तित्व को गहरे ,
हो जाती हैं गहरी
पापा के माथे की लकीरें,
होने लगती है चर्चा,
यूँ ही करेगा व्यर्थ जीवन
या कोई काम करेगा .
होती है फिर कोशिश
गढ़ने की
जिंदगी के नए आयाम
तराशी जाती है एक
बिना आत्मा की अनगढ़ मूरत.
बनने की होती है तैयारी
एक इंजीनियर , डॉक्टर , मैनेजर
या ऐसा ही कुछ .
और तन जाती है गर्दन
पापा की,
फूल जाता है सीना,
होकर आत्माभिमानी
उठते हैं गुनगुना
बेटा हमारा बड़ा नाम करेगा .....

... नीरज कुमार नीर ... 

चित्र गूगल  से साभार

Saturday, 21 June 2014

अलविदा


संध्या निश्चित है ,
सूर्य अस्ताचल की ओर
है अग्रसर ..

मुझे संदेह नहीं
अपनी भिज्ञता पर
तुम्हारी विस्मरणशीलता के प्रति
फिर भी अपनी बात सुनाता हूँ.
आओ बैठो मेरे पास
जीवन गीत सुनाता हूँ.
डूबेगा वह  सूरज भी
जो प्रबलता से अभी
है प्रखर .

तुम भूला दोगे मुझे, कल
जैसे मैं था ही नहीं कोई.
सुख के उन्माद में मानो
आने वाली व्यथा ही नहीं कोई.
सत्य का स्वाद तीखा है,
असत्य क्षणिक है,
मैं सत्य सुनाता हूँ
भ्रम का अस्तित्व भी
सत्य की ओट लेकर
है निर्भर ..

खोकर बूंद भर पानी
सरिता कब रूकती है
जल राशि में गौण है बूंद
सरिता आगे बढ़ती है.
कुछ भी अपरिहार्य नहीं.
सत्य पर सब मौन है
मैं वही बताता हूँ
काल का चक्र कब रुका
चलता रहता
है निरंतर ..

संध्या निश्चित है ,
सूर्य अस्ताचल की ओर
है अग्रसर..
.. #नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#hindi_poem


Monday, 16 June 2014

कैलाश पर अशांति


कैलाश पर शिव लोक में 
था सर्वत्र आनंद.
चारो ओर खुशहाली थी 
सब प्यार में निमग्न.
खाना पीना था प्रचुर 
वसन वासन सब भरपूर. 
जंगल था, लताएँ थी
खूब होती थी बरसात,
स्वच्छ वायुमंडल , 
खुली हुई रात.
धीरे धीरे नागरिकों ने 
काट डाले जंगल 
बांध कर नदियों को 
किया खूब अमंगल.
एक बार पड़ गया 
बहुत घनघोर अकाल.
चारो ओर मचा
विभत्स हाहाकार.
नाच उठा दिन सबेरे 
विकराल काल कराल. 
तिलमिलाने लगे सब भूख से 
नोच खाने को तैयार. 
चंद्रचूड़ का नाग झपटा 
गणपति के मूषक पर, 
कार्तिकेय का सारंग 
टूट पड़ा नाग पर. 
सब भीड़ गए एक दुसरे से गण.
फ़ैल गयी अराजकता सर्वत्र 
बेचैन हुआ उमा का मन. 
जाकर बोली शिव से 
प्रभो! शम्भु  , दीनानाथ. 
ऑंखें खोलिए ,
तोड़िए समाधि , देखिये 
फैली हुई है कैलाश में 
यह कैसी व्याधि.
कोई लोक लाज नहीं 
नहीं बचा संस्कार..
एक टुकड़ा रोटी हेतू 
रहे एक दूजे को मार .
आप ही कुछ कीजिये 
इसका समाधान. 
मुस्काये शिव जी 
आँखें खोली, कहा,
देवी क्यों हो परेशान.
भूख प्रकृति का 
अटल सत्य है.
भूख मिटाना प्राणी का 
प्रथम कृत्य है ..
भूख से ही चल रहा 
जगत व्यापार.. 
खाने की जुगत
है प्राणी का स्वाभाविक व्यवहार. 
जहाँ हो भूख
वहां शांति नहीं होती.
जठराग्नि की दाह 
होती है बड़ी प्रबल. 
बदल देती है सभ्यताएं. 
हिला देती है 
सत्ता की चूलें 
सबल हो जाता है वह भी 
जो होता है निर्बल .. 
…..  #नीरज कूमार नीर 
चित्र गूगल से साभार 
#kaiash #neeraj_kumar_neer  #bhookh #भूख #समाधि 

Thursday, 12 June 2014

तुम बिन कैसे बीती रजनी


तुम बिन कैसे बीती रजनी, 
कैसे बीता वासर छिन छिन,

बुलबुल ख़ुशी के गाये  गीत, 
आया नहीं  मेरा मन मीत.
कोंपल कुसुम खिले वन उपवन 
बेकल रहा विरह में पर मन.
तुम बिन कितना विकल रहा मैं 
रातें काटी तारे गिन गिन .
तुम बिन कैसे बीती रजनी, 
कैसे बीता वासर छिन छिन.

बिना सुर ताल हुआ संगीत 
तुम बिन सजा ना कोई गीत.
काठ बांसुरी सा मेरा तन ,
गूंजे स्वर जो धरो अधरन.
तुम बिन सूने सांझ सबेरे 
तन्हा रैना गुमसुम हर दिन.
तुम बिन कैसे बीती रजनी, 
कैसे बीता वासर  छिन छिन.
वासर : दिवस, दिन 

नीरज कुमार नीर
आप इस गीत को निम्नलिखित लिंक पर सुन भी सकते हैं, तो उसे अवश्य सुने और अपने कमेंट भी अवश्य दें :    https://soundcloud.com/parul-gupta-2/tum-bin 

Saturday, 7 June 2014

बहेलिया और जंगल में आग

(#सार्थक #जनवरी 2016  अंक में #प्रकाशित)

जब जब जागी उम्मीदें ,
अरमानों ने पसारे पंख.
देखा बहेलियों का झुंड,  
आसपास ही मंडराते हुए, 
समेट  लिया खुद को 
झुरमुटों के पीछे. 
अँधेरा ही भाग्य बना रहा. 
हमारे ही लोग, 
हमारे जैसे शक्लों वाले, 
हमारे ही जैसे विश्वास वाले,
करते रहे बहेलियों का गुण गान.
उन्हें बताते रहे हमारी कमजोरियों के बारे में 
बहेलिये भी हराए जा सकते हैं.
कभी सोचा ही नहीं .
उनकी शक्ति प्रतीत होती थी अमोघ.
जंगल में लगी आग में देखा 
बहेलिये को भयाक्रांत 
जान बचाकर भागते हुए
बहेलिया भी डरता है,
वह हराया जा सकता है..  
उठा लिया एक लुआठी. 
सबने कहा यह गलत है.. 
बहेलिये को डराना है अनैतिक. 
हम हैं इतने ज्यादा , बहेलिये इतने कम
पर धीरे धीरे जमा होने लगे सभी 
बन गयी एक लम्बी श्रृंखला लुआठियों की 
भयमुक्त जीना 
अपनी संततियों के लिए सुखद भविष्य देखना 
अच्छा लगता है .   
अच्छे दिन आ गए.
#neeraj_kumar_neer
…. 
#नीरज कुमार नीर 

Sunday, 1 June 2014

गाँव , मसान और गुडगाँव


गाँव की फिजाओं में 
अब नहीं गूंजते
बैलों के घूँघरू , 
रहट की आवाज.
नहीं दिखते मक्के के खेत
और ऊँचे मचान .
उल्लास हीन गलियां
सूना दृश्य
मानो उजड़ा मसान. 
नहीं गूंजती  गांवों में 
ढोलक की थाप पर
चैता की तान
गाँव में नहीं रहते अब 
पहले से बांके जवान. 
गाँव के युवा गए सूरत, दिल्ली और
गुडगांव 
पीछे हैं पड़े
बच्चे , स्त्रियाँ, बेवा व बूढ़े .


गाँव के स्कूलों में शिक्षा की जगह 
बटती है खिचड़ी.
मास्टर साहब का ध्यान,
अब पढ़ाने में नहीं रहता. 
देखतें हैं, गिर ना जाये 
खाने में छिपकली. 
गाँव वाले कहते हैं, 
स्साला मास्टर चोर है. 
खाता है बच्चों का अनाज 
साहब से साला बने मास्टर जी 
सोचते हैं,
किस किस को दूँ अब खर्चे का हिसाब.
चढ़ावा ऊपर तक चढ़ता है तब जाकर कहीं 
स्कूल का मिलता है अनाज ..


इन स्कूलों में पढ़कर,
नहीं बनेगा कोई डॉक्टर और इंजीनियर
बच्चे बड़े होकर बनेगें मजदूर 
जायेंगे कमाने 
सूरत, दिल्ली , गुडगाँव 
या तलाशेंगे कोई और नया ठाँव.
...... नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 

Wednesday, 21 May 2014

अपवर्तन का नियम

कहो प्रिय , कैसे सराहूँ 
मैं सौंदर्य तुम्हारा.
मैं चाहता हूँ.
तुम्हारे मुख को कहूँ माहताब 
अधरों को कहूँ लाल गुलाब 
महकती केश राशि को संज्ञा दूँ 
मेघ माल की 
लहराते आँचल को कहूँ 
मधु मालती 
पर, अपवर्तन का अपना नियम है 
मेरी दृष्टि गुजरती है,
तुम तक पहुचने से पहले 
संवेदना के तल से,
और हो जाती है अपवर्तित
सड़क किनारे डस्टबिन में 
खाना ढूंढते व्यक्ति पर, 
प्लेटफार्म पर भीख मांगते 
चिक्कट बालों वाली 
छोटी लड़की पर..
देश के भविष्य से खेलते 
झूठे वादे और बकवाद करते नेताओं पर.
मेरी संवेदना तुम्हें शायद 
अर्थ हीन लगे, पर 
यही है मेरा सत्य,  
मेरा तल.  
कहो प्रिय, कैसे सराहूँ 
मैं सौंदर्य तुम्हारा..

नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer
#hindi_poem #gulab  #प्लैटफ़ार्म #हिन्दी_कविता #अपवर्तन 

Sunday, 18 May 2014

सत्य की राह


सत्य की राह
होती है अलग,
अलग, अलग लोगों के लिए.
किसी का श्वेत ,
श्याम होता है किसी के लिए .
श्वेत श्याम के झगड़ें में
जो गुम  होता है
वह होता है सत्य,
सत्य सार्वभौमिक है,
पर सत्य नहीं हो सकता
सामूहिक .
सत्य निजता मांगता है ,
हरेक का सत्य
तय होता है
निज अनुभूति से.
......
... नीरज कुमार नीर 
चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, 13 May 2014

स्वप्न और सत्य


कभी कभी खो जाता हूँ ,
भ्रम में इतना कि 
एहसास ही नहीं रहता कि 
तुम एक परछाई हो..
पाता हूँ तुम्हें खुद से करीब 
हाथ बढ़ा कर छूना चाहता हूँ.
हाथ आती है महज शून्यता .
स्वप्न भंग होता है ..
 सत्य साबित होता है
क्षणभंगुर.
स्वप्न पुनः तारी होने लगता है.
पुनः आ खड़ी होती हो
नजरों के सामने .. 

नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 

Saturday, 10 May 2014

मेरी अगर माँ ना होती


मातृ दिवस के अवसर पर विश्व की समस्त माओं को समर्पित
......................................................
मेरी अगर माँ ना होती 
मैं कहाँ से होता,
किसकी अंगुली पकड़ के चलता 
किसका नाम लेकर रोता.

चलना फिरना हँसना गाना 
तेरी भांति माँ मुस्काना 
प्रेम के एक एक आखर 
पग पग संस्कार सिखलाना 
गोदी में सिर रखकर आखिर 
निर्भीक कहाँ मैं सोता .

दुनियांदारी के कथ्य अकथ्य
जीवन यात्रा के सत्य असत्य
रंगमंच के सारे पक्ष 
कुछ प्रत्यक्ष, कुछ नेपथ्य 
राजा रानी  के किस्सों संग 
मन माला में कौन पिरोता..

ये जो वायु, आती जाती है 
बल, रूप, यौवन सजाती है 
दुनियां भर के सारे सुख 
नित्य नवीन दिखलाती है 
ये तो ऋण तुम्हारा है माँ 
बस रहता हूँ मैं ढोता.

मेरी अगर माँ ना होती 
मैं कहाँ से होता.

... नीरज कुमार नीर 
चित्र गूगल से साभार                                                                                 #neeraj_kumar_neer
#mothersday #matri-diwas #maa #माँ #मातृदिवस #जीवन #प्रेम 

Thursday, 1 May 2014

क्यों गाती हो कोयल


क्यों गाती हो कोयल 
होकर इतना विह्वल 

है पिया मिलन की आस
या बीत चुका मधुमास 
वियोग की है वेदना 
या पारगमन है पास 
मत जाओ न रह जाओ
यह छोड़ अम्बर  भूतल  

क्यों गाती हो कोयल 
होकर इतना विह्वल 

तू गाती तो आता 
यह वसंत मदमाता 
तू आती तो आता 
मलयानिल महकाता 
तू जाती तो  देता 
कर जेठ मुझे बेकल 

क्यों गाती हो कोयल 
होकर इतना विह्वल 


कलियों का यह देश
रह बदल कोई वेष
सुबह सबेरे आना
लेकर प्रेम सन्देश
गाना मेरी खिड़की
पर कोई गीत नवल

क्यों गाती हो कोयल 
होकर इतना विह्वल ..

नीरज कुमार नीर ........ #neeraj_kumar_neer 
इस गीत को मेरे एक मित्र ने अपनी खूबसूरत आवाज से संवारा हैं ... आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर इसे अवश्य सुने ..  https://soundcloud.com/parul-gupta-2/kyu-gati-ho

#कोयल #कोयल #गीत #prem_geet 

Wednesday, 23 April 2014

हम फिर से गुलाम हो जायेंगें


हमारे जीवन मूल्य
सरेआम नीलाम हो जायेंगें 
हम फिर से गुलाम हो जायेंगें ..

स्वतंत्रता का काल स्वर्णिम 
तेजी से है बीत रहा 
हासिल हुआ जो मुश्किल से 
तेजी से है रीत रहा. 
धरी रह जाएगी नैतिकता, 
आदर्श सभी बेकाम हो जाएँगे .
हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..

कहों ना !  जो सत्य है. 
सत्य कहने से घबराते हो 
सत्य अकाट्य है , अक्षत 
छूपता नहीं छद्मावरण से 
जो प्राचीन है , धुंधला, 
गर्व उसी पर करके बार बार दुहराते हो. 
टूटे हुए कलश, भंजित प्रतिमा 
ध्वस्त अभिमान, लूटी स्त्रियाँ 
नत  सर .
ये इतिहास हैं.
ये  सत्य हैं, अकाट्य , अक्षत, 
गर्व करो या स्वीकारो 
या उठा कर फ़ेंक आओ इन पन्नो को 
अरब सागर की अतल गहराइयों में.
पर सत्य नहीं बदलेगा 
सत्य नग्न होता है. 
सत्य पे झूठ के आवरण 
नाकाम हो जायेंगें. 
हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..

नैतिकता और कायरता में 
पुरुषार्थ भर का अंतर है 
कायरों की नैतिकता  
चलती नहीं अनंतर है. 
सूरज को हाथों से ढकने के यत्न 
नाकाम हो जायेंगे 
हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..
नीरज कुमार नीर 
………  #Neeraj_kumar_neer
#freedom #secularism #motivational #poem 

Thursday, 17 April 2014

मरे हुए आदमी की नैतिकता


एक रात 
मेरी मुलाकात 
हुई, एक मरे हुए आदमी से. 
आँखों पर चश्मा,
सड़क के बायीं ओर 
चल रहा था.
शक्ल , सूरत से पढ़ा लिखा 
बुद्धिजीवि  लग रहा था.
मैने उससे पूछा सवाल,
पिछली बार, 
तुम्हें कर दिया गया था बेघर, 
लूट कर घर बार, 
छोड़ना पड़ा था अपना देश 
फिरे थे मारे मारे 
छीन ली गयी थी बीवियां.
बेटियों का हुआ था बलात्कार. 
बिना किसी प्रतिरोध के तुमने 
किया था सब कुछ स्वीकार. 
परिस्थितियां ले रही 
पुनः इस बार 
वैसा ही आकार. 
इस बार क्या प्रतिरोध करोगे 
या झुकी आँखों से 
मान इसे नियती
सब चुपचाप ही सहोगे ? 
उसने कहा
बगैर नजर उठाये उन्मन से.   
मेरे जीवन के मूल्य 
महत्वपूर्ण है मेरे जीवन से. 
जिन्होंने मुझ पर किया था अत्याचार, 
दरअसल वे तो थे महज बेरोजगार.   
सारी  समस्या की जड़ बस अर्थ है.
मैने सोचा, यह आदमी है मरा हुआ,
इससे बात करना व्यर्थ है.
घरों की खिड़कियाँ जब 
बड़ी हो जाएँ घर से 
खिड़कियाँ खा जाती है ऐसे घर को. 
नैतिकता जब हावी हो व्यक्ति पर 
लड़ने के डर से,
नैतिकता खा जाती है 
व्यक्तित्व को.
जब तक जीवन है तभी तक 
जीवन मूल्य का अर्थ है 
मरे हुए आदमी की नैतिकता बे अर्थ है .
...........नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 
#neeraj_kumar_neer
#motivational #politics #बेरोजगार #hindi_poem #हिन्दी_कविता 
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