Tuesday, 24 June 2014

बेटा हमारा बड़ा नाम करेगा


वह जब लिखता है कविता या
बनाता है कोई चित्र..
चढ़ जाती हैं त्यौरियां,
तन जाती हैं भवें,
उठते हैं कई सवाल,
फुसफुसाहट का शोर
गूंजता है मन के
भीतर तक ,
भेदता है अस्तित्व को गहरे ,
हो जाती हैं गहरी
पापा के माथे की लकीरें,
होने लगती है चर्चा,
यूँ ही करेगा व्यर्थ जीवन
या कोई काम करेगा .
होती है फिर कोशिश
गढ़ने की
जिंदगी के नए आयाम
तराशी जाती है एक
बिना आत्मा की अनगढ़ मूरत.
बनने की होती है तैयारी
एक इंजीनियर , डॉक्टर , मैनेजर
या ऐसा ही कुछ .
और तन जाती है गर्दन
पापा की,
फूल जाता है सीना,
होकर आत्माभिमानी
उठते हैं गुनगुना
बेटा हमारा बड़ा नाम करेगा .....

... नीरज कुमार नीर ... 

चित्र गूगल  से साभार

10 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. आपकी पोस्ट को ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - पुण्यतिथि श्री श्रद्धाराम फिल्लौरी में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. बहुत सार्थक मुद्दा उठाया है ... दोहरी मानसिकता में पिसता बचपन यूँ ही एक दिन मार दिया जाता है ...... बहुत सच्ची रचना

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  4. विडम्बना ही है कि बच्चे अपने सपनों को जीने के स्थान पर माता-पिता की अपेक्षाओं और महत्वाकांक्षाओं को जीने के लिये विवश किये जाते हैं ! सार्थक सृजन !

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  5. माध्यम-वर्गीय परिवारों में ऐसा सपना देखना ही समय की हकीकत है ... पिता ने जो भोग है अपने बच्चों को वो सबे पहले उसी चीज़ से बचाना चाहता है ...

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  6. सुंदर प्रस्तुति

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  7. ​ लेकिन अब ये सोच बदल रही है नीरज जी !

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  8. बहुत अच्छी रचना
    समाज की सच्चाई को अपने खूबसूरत शब्दों में बयां किया है

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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