Tuesday, 2 September 2014

प्यार और बेड़ियाँ


एक पुरुष करता है 
अपनी स्त्री  से बहुत प्यार. 
वह उसे खोना नहीं चाहता है ,
उसपर चाहता है एकाधिकार । 
उसने डाल दी है 
उसके पांवों में बेड़ियाँ. 
स्त्री भी करती है
उससे बेपनाह मुहब्बत. 
वह भी उसे खोना नहीं चाहती. 
पर वह नहीं डाल पाती है 
उसके पैरों में बेड़ियाँ. 
बेड़ियाँ मिलती हैं बाजार में 
खरीदी जाती हैं पैसों के बल पर.

नीरज कुमार नीर ..
                                                                  Neeraj Kumar Neer 

14 comments:

  1. लेकिन ये प्यार की बेड़ियां ही तो हैं जो एक दूसरे को बांधे रखती हैं

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    1. हाँ प्यार की बेड़ियाँ जरूरी है पर अगर यह बेड़ियाँ इकतरफा हो तो स्थिति शोचनीय होती है । आभार आपका ।

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  2. अरे भाई कुछ डाल भी लेती हैं लगता है तुमने अभी तक नहीं देखी हैं । :)
    फिर भी रचना सुंदर है ।

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  3. नीरज जी कई बार अच्छा पैसा कमाने वाली महिलाएं भी बेड़ियों में बंधी रह जाती हैं...
    अच्छा लिखा है आपने

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    1. अनुषा जी आपका हार्दिक धन्यवाद। आपके कहे से मैं असहमत नहीं हूँ , लेकिन ज़्यादातर ऐसा होता है कि आर्थिक रूप से परनिर्भर स्त्रियाँ ऐसी स्थिति की ज्यादा शिकार होती हैं। :)

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  4. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 04/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  5. पुरुष समाज जो है ... अपनी मर्जी की करना चाहता है ... पर प्रेम की बेड़ियाँ तो खुद ही पड़ जाती हैं ....

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    1. जी बिलकुल सही । पर प्रेम की बेड़ियाँ तो दुतरफा होती है , अगर बेड़ियाँ एकतरफा हो तो बात गंभीर है ॥

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  6. स्त्री पीड़ा को सिद्दत से परिचय कराती कविता.

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  7. सच जब बाजार से किसी चीज की तरह प्यार खरीदा जाता है फिर वह प्यार कहाँ रहता है सौदा है एक समझोता है वेबसी का ...
    बहुत बढ़िया

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  8. अधिकांशतः यह प्रेम की बेड़ियाँ दुतरफा ही होती हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर...

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  9. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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