Friday, 28 February 2014

जिंदगी ने रोज गम इतने दिए


2122       2122       212 
फाइलातुन   फाइलातुन   फाइलुन
(बहरे रमल मुसद्दस महजूफ)
..............................
फूल सी जब हर  कली होने लगी
बागबाँ को तब खुशी  होने लगी

जाम साकी ने पिलाया हुस्न का
हर किसी को तिश्नगी होने लगी

जब मिले तुम जिंदगी की राह  में
जिंदगी अब जिंदगी होने लगी

देख मीठापन नदी के आब का ,
सागरों में खलबली होने लगी .

आसमां में उगता सूरज देखकर
चाँदनी भी अनमनी होने लगी .

चुभ रहे थे शूल बन कर आँख में ,
अब उसी की बंदगी  होने लगी.

जिंदगी ने रोज गम इतने दिए
गम से ही अब दिल्लगी होने लगी .

... #Neeraj_ Kumar_ Neer

#नीरज कुमार नीर 

Sunday, 23 February 2014

वसंत नहीं आता


शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी भी वसंत नहीं आता. 

नलों  की लंबी लाइनों  में 
बजबजाती  सड़ी नालियों में, 
सर टकराते छप्परों में 
औरतों की नित गालियों में, 
रोज रोज की हुज्जतों का 
कभी भी अंत नहीं आता. 

झूठ पाखण्ड अंधविश्वास 
की खूब महफ़िल सजती है. 
पंडितों और मौलाना की 
मन मर्जी खूब चलती है. 
असमय होती मौतों का पर
कभी भी अंत नहीं आता .
शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी भी  वसंत नहीं आता.

कुत्तिया के पिल्लों के संग 
सुगिया की बच्ची पलती है. 
भूख की आग में न जाने 
कितनी उम्मीदें जलती है. 
अपूर्ण रहे उम्मीदों का 
कभी भी अंत नहीं आता.
शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी  वसंत नहीं आता.

शिशुओं के नाजुक कन्धों  पर 
बस्ते की जगह में भार है. 
उसकी कमाई से चलता 
उसका बीमार  परिवार है. 
दुःख है उनकी जीवन नियति 
दुःख का अंत नहीं आता.
शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी  भी वसंत नहीं आता.
…………. नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer 

Sunday, 16 February 2014

मैं भारत का प्रहरी बनूँगा : बाल कविता



पापा मुझे बन्दूक दिला  दो 
मैं सैनिक एक बन जाऊँगा.    
जाकर मैं देश की सरहद पर 
दुश्मन के छक्के छुड़ाऊँगा ..

मैं भारत  का प्रहरी बनूँगा 
तुम सब मिल  फिर चैन से रहना.
मेरा बेटा एक सैनिक  है 
गर्व से तुम भी  सबको  कहना. 

युद्ध  क्षेत्र में खूब लडूंगा 
पीठ नहीं मैं   दिखलाऊंगा. 
सीने पर गोली खाउंगा,
मरकर शहीद कहलाऊंगा. 

स्वयं  मरने से पहले लेकिन 
सौ सौ को पहले मारूंगा. 
जब तक कि अंतिम सांस चलेगी, 
हार नहीं कदापि  मानूंगा.

..... नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer 

Monday, 10 February 2014

क्या तुम्हें उपहार दूँ

वसंत का आगमन हो चुका एवं valentine's day  आने वाला है तो इस अवसर के लिए विशेष प्रस्तुति :


क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

तुम वसंत हो, अनुगामी
जिसका पर्णपात नहीं.
सुमन सुगंध सी संगिनी, 
राग द्वेष की बात नहीं. 

शब्द अपूर्ण वर्णन को
ईश्वर के वरदान का.

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

विकट ताप में अम्बुद री,
प्रशांत शीतल छांव सी, 
तप्त मरू में दिख जाए, 
हरियाली इक गाँव की.

कहो कैसे बखान करूँ 
पूर्ण हुए अरमान का.

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.


मैं पतंग तुम डोर प्रिय,
तुम बिन गगन अछूता है.
तुमसे बंधकर  जीवन 
व्योम उत्कर्ष छूता है.

तुम ही कथाकार हो, इस 
जीवन के आख्यान का. 

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

दिवस लगे त्यौहार सा  
हर यामिनी मधुमास सी
प्रीति तुम्हारी,   उर में  
नित नित भरती आस सी

तुल्य नहीं जग में कोई 
अनुराग  के परिमाण का  

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

……. नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer

शब्दार्थ :
प्रतिदान : किसी चीज के बदले कुछ देना 
अनुगामी : जो पीछे आता है 
पर्णपात : पतझड़ 
अम्बुद : बादल
आख्यान : कथा , कहानी 
यामिनी : रात 
परिमाण : मात्रा ,  magnitude 

चित्र गूगल से साभार 





Thursday, 6 February 2014

नदी माँ है ..

OBO पर  महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना से पुरस्कृत 


पर्वत की तुंग 
शिराओं से 
बहती है टकराती, 
शूलों से शिलाओं से, 
तीव्र वेग से अवतरित होती,
मनुज मिलन की 
उत्कंठा से, 
ज्यों चला वाण 
धनुर्धर की 
तनी हुई प्रत्यंचा से.
आकर मैदानों में
शील करती धारण 
ज्यों व्याहता करती हो 
मर्यादा का पालन.
जीवन देने की चाह
अथाह.
प्यास बुझाती
बढती राह. 
शीतल, स्वच्छ , 
निर्मल जल
बढ़ती जाती 
करती कल कल
उतरती नदी 
भूतल समतल 
लेकर ध्येय जीवनदायी 
अमिय भरे
अपने ह्रदय में 
लगती कितनी सुखदायी. 
यहीं होता नदी का 
सामना,
मनुजों की 
कुत्सित अभिलाषा से 
चिर अतृप्त 
निज स्वार्थ पूरित 
अंतहीन, आसुरी पिपासा से 
नदी का अस्तित्व होता 
तार तार 
हर गांव, हर नगर 
हर बार, बार बार.
करके अमृत का हरण,
करते गरल वमन,
भर देते इसमें, असुर 
समुद्र मंथन से मिले 
सारे जहर 
कोई नीलकंठ नहीं,
कोई तारण हार नहीं,
रोती , तड़पती , 
कभी गुस्साती , फुफकारती 
नदी, 
अपने मृत्यु शैय्या पर लेटे लेटे 
मिलती अपने चिर प्रतीक्षित प्रेमी से, 
उसका करता स्वागत, सागर 
अपनी बाहें फैलाकर.
सागर एक सच्चा प्रेमी है,
शामिल कर लेता है उसका अस्तित्व 
स्वीकारता है उसे 
अपने भीतर, 
सम्पूर्णता में 
उसकी सभी सड़ांध के बाबजूद.
प्रेम में अभीष्ट है समपर्ण 
अपनी पूर्णता के साथ.
तिरोहित हो जाती नदी की सारी व्यथा.
सागर की विशालता में हो जाती गौण,
विस्मृत कर देती अपनी दु: कथा.
नदी के ह्रदय में पुनः उठती हुक 
जीवन देने की,
पुत्र मिलन की इच्छा 
हो जाती बलवती 
वह पुनः उठती 
बनकर मेघ
पर्वतों में बरसती 
पुनः बनती नदी 
नदी माँ है.
माता कुमाता नहीं होती.
... नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#nadee #maa #jeevan #prem #नदी #बादल #मेघ 

Monday, 3 February 2014

मैं भारत हूँ :


विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

संस्कार की पूंजी, संस्कृति अक्षय धन है 
शिव का वरदान है, कृष्ण का उपासक हूँ.
सांसो पर अधिकार है, मन का शासक हूँ.
दुःख हो या उल्लास, बराबर से जीता हूँ .

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

चाह नहीं विजय की, भय नहीं कुछ खोने का
शिराओं में प्रस्फुटित काल निनाद होता है,
सबल भुजाओं में, दीर्घ इतिहास सोता है.
उन्मुग्ध रहा विश्व, ज्ञान का अधिष्ठाता हूँ.

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

सभ्यता सिखाता रहा सदा आदि काल से,
डरा नहीं रक्तरंजित, देख दन्त कराल के.
विश्व विजय की, नहीं की कभी भी अभिलाषा,
नत हो कोई की नहीं, कभी ऐसी आशा .
निर्विकल्प रहा सदा, रागों से रीता हूँ,

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

पराजित हुआ रहा, पराधीन भी सदियों 
ठगा गया कई बार, छल के हाथों हारा.
उठा हर बार, स्वयं ही स्वयं को संवारा .
मैं अपने भाग्य का स्वयं ही निर्माता हूँ.

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

.... नीरज कुमार नीर ...
#neeraj_kumar_neer 
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