Friday, 27 June 2014

कांच की दीवार

तुम्हारे और मेरे बीच है
कांच की एक मोटी दीवार.
जो कभी कभी अदृश्य प्रतीत होती है
और पैदा करती है विभ्रम
तुम्हारे मेरे पास होने का.

मैं कह जाता हूँ अपनी बात
तुम्हें सुनाने की उम्मीद में.
तुम्हारे शब्दों का खुद से ही
कुछ अर्थ लगा लेता हूँ.

क्या तुम समझ पाती होगी
मैं जो कहता हूँ ?
क्या मैं सही अर्थ लगाता हूँ
जो तुम कहती हो?

कांच की इस दीवार पर
डाल दिए हैं कुछ रंगीन छीटें.
ताकि विभ्रम की स्थिति में
मुझे सत्य बता सकें .

कांच के उस पार से
तुम्हे देखना अच्छा लगता है.
अच्छा लगता है तुम्हारी
अनसुनी बातों का
खुद के हिसाब से अर्थ लगाना ..

#नीरज कुमार नीर
#neeraj
#love #pyar #pyar #प्रेम #हिन्दी #hindikavita 

Tuesday, 24 June 2014

बेटा हमारा बड़ा नाम करेगा


वह जब लिखता है कविता या
बनाता है कोई चित्र..
चढ़ जाती हैं त्यौरियां,
तन जाती हैं भवें,
उठते हैं कई सवाल,
फुसफुसाहट का शोर
गूंजता है मन के
भीतर तक ,
भेदता है अस्तित्व को गहरे ,
हो जाती हैं गहरी
पापा के माथे की लकीरें,
होने लगती है चर्चा,
यूँ ही करेगा व्यर्थ जीवन
या कोई काम करेगा .
होती है फिर कोशिश
गढ़ने की
जिंदगी के नए आयाम
तराशी जाती है एक
बिना आत्मा की अनगढ़ मूरत.
बनने की होती है तैयारी
एक इंजीनियर , डॉक्टर , मैनेजर
या ऐसा ही कुछ .
और तन जाती है गर्दन
पापा की,
फूल जाता है सीना,
होकर आत्माभिमानी
उठते हैं गुनगुना
बेटा हमारा बड़ा नाम करेगा .....

... नीरज कुमार नीर ... 

चित्र गूगल  से साभार

Saturday, 21 June 2014

अलविदा


संध्या निश्चित है ,
सूर्य अस्ताचल की ओर
है अग्रसर ..

मुझे संदेह नहीं
अपनी भिज्ञता पर
तुम्हारी विस्मरणशीलता के प्रति
फिर भी अपनी बात सुनाता हूँ.
आओ बैठो मेरे पास
जीवन गीत सुनाता हूँ.
डूबेगा वह  सूरज भी
जो प्रबलता से अभी
है प्रखर .

तुम भूला दोगे मुझे, कल
जैसे मैं था ही नहीं कोई.
सुख के उन्माद में मानो
आने वाली व्यथा ही नहीं कोई.
सत्य का स्वाद तीखा है,
असत्य क्षणिक है,
मैं सत्य सुनाता हूँ
भ्रम का अस्तित्व भी
सत्य की ओट लेकर
है निर्भर ..

खोकर बूंद भर पानी
सरिता कब रूकती है
जल राशि में गौण है बूंद
सरिता आगे बढ़ती है.
कुछ भी अपरिहार्य नहीं.
सत्य पर सब मौन है
मैं वही बताता हूँ
काल का चक्र कब रुका
चलता रहता
है निरंतर ..

संध्या निश्चित है ,
सूर्य अस्ताचल की ओर
है अग्रसर..
.. #नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#hindi_poem


Monday, 16 June 2014

कैलाश पर अशांति


कैलाश पर शिव लोक में 
था सर्वत्र आनंद.
चारो ओर खुशहाली थी 
सब प्यार में निमग्न.
खाना पीना था प्रचुर 
वसन वासन सब भरपूर. 
जंगल था, लताएँ थी
खूब होती थी बरसात,
स्वच्छ वायुमंडल , 
खुली हुई रात.
धीरे धीरे नागरिकों ने 
काट डाले जंगल 
बांध कर नदियों को 
किया खूब अमंगल.
एक बार पड़ गया 
बहुत घनघोर अकाल.
चारो ओर मचा
विभत्स हाहाकार.
नाच उठा दिन सबेरे 
विकराल काल कराल. 
तिलमिलाने लगे सब भूख से 
नोच खाने को तैयार. 
चंद्रचूड़ का नाग झपटा 
गणपति के मूषक पर, 
कार्तिकेय का सारंग 
टूट पड़ा नाग पर. 
सब भीड़ गए एक दुसरे से गण.
फ़ैल गयी अराजकता सर्वत्र 
बेचैन हुआ उमा का मन. 
जाकर बोली शिव से 
प्रभो! शम्भु  , दीनानाथ. 
ऑंखें खोलिए ,
तोड़िए समाधि , देखिये 
फैली हुई है कैलाश में 
यह कैसी व्याधि.
कोई लोक लाज नहीं 
नहीं बचा संस्कार..
एक टुकड़ा रोटी हेतू 
रहे एक दूजे को मार .
आप ही कुछ कीजिये 
इसका समाधान. 
मुस्काये शिव जी 
आँखें खोली, कहा,
देवी क्यों हो परेशान.
भूख प्रकृति का 
अटल सत्य है.
भूख मिटाना प्राणी का 
प्रथम कृत्य है ..
भूख से ही चल रहा 
जगत व्यापार.. 
खाने की जुगत
है प्राणी का स्वाभाविक व्यवहार. 
जहाँ हो भूख
वहां शांति नहीं होती.
जठराग्नि की दाह 
होती है बड़ी प्रबल. 
बदल देती है सभ्यताएं. 
हिला देती है 
सत्ता की चूलें 
सबल हो जाता है वह भी 
जो होता है निर्बल .. 
…..  #नीरज कूमार नीर 
चित्र गूगल से साभार 
#kaiash #neeraj_kumar_neer  #bhookh #भूख #समाधि 

Thursday, 12 June 2014

तुम बिन कैसे बीती रजनी


तुम बिन कैसे बीती रजनी, 
कैसे बीता वासर छिन छिन,

बुलबुल ख़ुशी के गाये  गीत, 
आया नहीं  मेरा मन मीत.
कोंपल कुसुम खिले वन उपवन 
बेकल रहा विरह में पर मन.
तुम बिन कितना विकल रहा मैं 
रातें काटी तारे गिन गिन .
तुम बिन कैसे बीती रजनी, 
कैसे बीता वासर छिन छिन.

बिना सुर ताल हुआ संगीत 
तुम बिन सजा ना कोई गीत.
काठ बांसुरी सा मेरा तन ,
गूंजे स्वर जो धरो अधरन.
तुम बिन सूने सांझ सबेरे 
तन्हा रैना गुमसुम हर दिन.
तुम बिन कैसे बीती रजनी, 
कैसे बीता वासर  छिन छिन.
वासर : दिवस, दिन 

नीरज कुमार नीर
आप इस गीत को निम्नलिखित लिंक पर सुन भी सकते हैं, तो उसे अवश्य सुने और अपने कमेंट भी अवश्य दें :    https://soundcloud.com/parul-gupta-2/tum-bin 

Saturday, 7 June 2014

बहेलिया और जंगल में आग

(#सार्थक #जनवरी 2016  अंक में #प्रकाशित)

जब जब जागी उम्मीदें ,
अरमानों ने पसारे पंख.
देखा बहेलियों का झुंड,  
आसपास ही मंडराते हुए, 
समेट  लिया खुद को 
झुरमुटों के पीछे. 
अँधेरा ही भाग्य बना रहा. 
हमारे ही लोग, 
हमारे जैसे शक्लों वाले, 
हमारे ही जैसे विश्वास वाले,
करते रहे बहेलियों का गुण गान.
उन्हें बताते रहे हमारी कमजोरियों के बारे में 
बहेलिये भी हराए जा सकते हैं.
कभी सोचा ही नहीं .
उनकी शक्ति प्रतीत होती थी अमोघ.
जंगल में लगी आग में देखा 
बहेलिये को भयाक्रांत 
जान बचाकर भागते हुए
बहेलिया भी डरता है,
वह हराया जा सकता है..  
उठा लिया एक लुआठी. 
सबने कहा यह गलत है.. 
बहेलिये को डराना है अनैतिक. 
हम हैं इतने ज्यादा , बहेलिये इतने कम
पर धीरे धीरे जमा होने लगे सभी 
बन गयी एक लम्बी श्रृंखला लुआठियों की 
भयमुक्त जीना 
अपनी संततियों के लिए सुखद भविष्य देखना 
अच्छा लगता है .   
अच्छे दिन आ गए.
#neeraj_kumar_neer
…. 
#नीरज कुमार नीर 

Sunday, 1 June 2014

गाँव , मसान और गुडगाँव


गाँव की फिजाओं में 
अब नहीं गूंजते
बैलों के घूँघरू , 
रहट की आवाज.
नहीं दिखते मक्के के खेत
और ऊँचे मचान .
उल्लास हीन गलियां
सूना दृश्य
मानो उजड़ा मसान. 
नहीं गूंजती  गांवों में 
ढोलक की थाप पर
चैता की तान
गाँव में नहीं रहते अब 
पहले से बांके जवान. 
गाँव के युवा गए सूरत, दिल्ली और
गुडगांव 
पीछे हैं पड़े
बच्चे , स्त्रियाँ, बेवा व बूढ़े .


गाँव के स्कूलों में शिक्षा की जगह 
बटती है खिचड़ी.
मास्टर साहब का ध्यान,
अब पढ़ाने में नहीं रहता. 
देखतें हैं, गिर ना जाये 
खाने में छिपकली. 
गाँव वाले कहते हैं, 
स्साला मास्टर चोर है. 
खाता है बच्चों का अनाज 
साहब से साला बने मास्टर जी 
सोचते हैं,
किस किस को दूँ अब खर्चे का हिसाब.
चढ़ावा ऊपर तक चढ़ता है तब जाकर कहीं 
स्कूल का मिलता है अनाज ..


इन स्कूलों में पढ़कर,
नहीं बनेगा कोई डॉक्टर और इंजीनियर
बच्चे बड़े होकर बनेगें मजदूर 
जायेंगे कमाने 
सूरत, दिल्ली , गुडगाँव 
या तलाशेंगे कोई और नया ठाँव.
...... नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 
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