Friday, 19 September 2014

पानी को तलवार से काटते क्यों हो ?


पानी को तलवार से काटते क्यों हो ?
हिन्दी हैं हम सब, हमे बांटते क्यों हो ?

चरखे पे मजहब  की पूनी चढ़ा कर के ,
सूत  नफरत की यहाँ कातते क्यों हो  ?

हो सभी को आईना फिरते दिखाते ,
आईने से खुद मगर भागते क्यों हो ?

गर करोगे प्यार , बदले वही पाओगे, 
वास्ता मजहब का देके मांगते क्यों हो ?

भर लिया है खूब तुमने तिजोरी तो ,
चैन से सो, रातों को जागते क्यों हो ?

दाम कौड़ियों के हो बेचते सच को 
रोच परचम झूठ का छापते क्यों हो ?

धर्म और ईमान के गर मुहाफ़िज़ हो 
मज़लूमों को फिर भला मारते क्यों हो ? 
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(c)   नीरज  नीर 

अगर बात अच्छी लगे तो अपनी टिप्पणी अवश्य दें । 

Thursday, 11 September 2014

की दवा जितनी मरज़ बढ़ता गया

की दवा जितनी मरज़ बढ़ता गया, 
दोपहर के धूप सा चढ़ता गया।

खूं बहाने की वहीं तैयारियां,
अम्न का मरकज जिसे समझा गया।

साँप हैं पाले हुए आस्तीनों में, 
दूध पीया और ही बढ़ता गया ।

है उसी की ही वजह से आसमां,
राह में जो भी मिला कहता गया।

बढ़ गयी कुछ और ही उसकी चमक, 
सोना ज्यों ज्यों आंच में तपता गया ।
....... 
#नीरज कुमार नीर 
#Neeraj_kumar_neer
#gazal 


Tuesday, 2 September 2014

प्यार और बेड़ियाँ


एक पुरुष करता है 
अपनी स्त्री  से बहुत प्यार. 
वह उसे खोना नहीं चाहता है ,
उसपर चाहता है एकाधिकार । 
उसने डाल दी है 
उसके पांवों में बेड़ियाँ. 
स्त्री भी करती है
उससे बेपनाह मुहब्बत. 
वह भी उसे खोना नहीं चाहती. 
पर वह नहीं डाल पाती है 
उसके पैरों में बेड़ियाँ. 
बेड़ियाँ मिलती हैं बाजार में 
खरीदी जाती हैं पैसों के बल पर.

नीरज कुमार नीर ..
                                                                  Neeraj Kumar Neer 
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