Thursday, 25 December 2014

माँ का प्यार

सितारों से सजे 
बड़े बड़े होटलों में,
नरम नरम गद्दियों वाली कुर्सियां,
करीने से सजी मेजें,
मद्धिम प्रकाश,
अदब से खड़े वेटर,
खूबसूरत मेन्यू पर दर्ज,
तरह तरह के नामों वाले व्यंजन,
खाते हुए फिर भी
स्वाद में 
कुछ कमी सी रहती है.
याद आता है
 माँ  के हाथों  का खाना
खाने के साथ 
माँ परोसती थी 
प्यार..
....नीरज कुमार ‘नीर’
neeraj kumar neer 

Saturday, 20 December 2014

कसैली निंबौरिया


मुझे अच्छी लगती है 
निंबौरियां और 
उसका कसैलापन
पीली निबौरियों  की कड़वाहट
जब घुलती है 
गौण कर देती हैं  
अंतर के आत्यंतिक कड़वाहट को भी।  
तुमने जो भर रखी है 
मुट्ठी में  निंबौरिया 
क्या एक दोगी मुझे?
मैं आत्म विस्मृत होना चाहता हूँ
कुछ पल के लिए। 
मैं लौटा दूँगा तुम्हें 
तुम्हारे हाथों की मिठास और
नीम की घनी छांव
   
...... नीरज कुमार नीर........
neeraj kumar neer 

Thursday, 18 December 2014

कौआ बोला कांव कांव : एक बाल कविता


कौआ बोला कांव कांव
बिल्ली बोली म्याऊँ म्याऊँ
मे मे करके बकरी भागी
शेर बोला किसको खाऊँ ॥

भों भों करता कुत्ता आया
आसमान में चील चिल्लाया
चीं चीं करता चूहा बोला
कहाँ जाऊँ मैं कहाँ जाऊँ

सूढ़ उठा हाथी चिंघाड़ा
हिनहिना कर दौड़ा घोड़ा
कछुआ ने खरगोश से बोला
ठहर जरा तो मैं भी आऊँ

मुर्गे ने दी ज़ोर की बांग
ऊँट की लंबी लंबी टांग
बारिश हुई मेढक टर्राया
अब तो पानी मे मैं जाऊँ ॥
……. Neeraj kumar neer
21/10/2014

Thursday, 4 December 2014

माँ है मेरी वो


चलती अहर्निश
रूकती नहीं है
माँ है मेरी वो
थकती नहीं है

निष्काम  निरंतर 
लेती है मेरी हर 
  कष्ट हर
किसी से कुछ भी
कहती नहीं है

चाँद डूबने से पहले
चाँद चढ़ जाने तक
खग के  उठने से पहले
सबके सो जाने तक
रहती दौड़ती
ठहरती नहीं है 

खाना पीना  राशन वासन
कपड़े लत्ते दीये दवाई
शिक्षा दीक्षा नाते रिश्ते
पूजा पंडित सर सफाई
निभाती है सभी
ऊबती नहीं है

चलती अहर्निश
रूकती नहीं है
माँ है मेरी वो
थकती नहीं है...
.........
नीरज कुमार नीर .........
neeraj kumar neer 

चाँद का डूबना यानि सुबह होना .... 
चाँद का चढ़ना यानि देर रात हो जाना। 


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