Sunday, 27 December 2015

मैं परिंदा हूँ मेरा ईमान न पूछो : गजल

मैं परिंदा हूँ ..... ... मिरा ईमान न पूछो
क्या हूँ, हिन्दू या कि मुस्सलमान न पूछो।

चर्च, मंदर, मस्जिदें ....सब एक बराबर
रहता किसमे है मिरा भगवान न पूछो.

मजहबी उन्माद में जो मर गया वो था
एक जिंदा आदमी , पहचान न पूछो ।

पीठ में घोपा हुआ है नफरती खंजर
रोता क्यों है अपना हिंदुस्तान न पूछो ।

आलमे बेचैनियाँ हर सिम्त है फैली
हर गली हरसू क्यों है वीरान न पूछो ।

खूब काटी है फसल अहले सियासत ने
खाद बन, किसने गँवाईं जान न पूछो ।

भाई मारा जाता है जब, भाई के हाथों
होती कितनी ये जमीं हैरान न पूछो ।
...... नीरज कुमार नीर .............
#neeraj_kumar_neer
#gazal  #hindu #hindustan #bhagwan 

Saturday, 19 December 2015

क्या आपका बच्चा पढ़ता नहीं है ...... ?????

क्या आपका बच्चा पढ़ता नहीं है ...... ?????
निराश न हों ...
....
......
....
उसे बलात्कारी बनाइये ,
खूंखार बलात्कारी ...........
स्त्री के योनि में सरिया घुसा कर
फाड़ देने वाला बलात्कारी ..............
स्तनों को काट लेने वाला बलात्कारी ........
बलात्कार की घटना के बाद..............
हजारों की संख्या में दीये और कैंडल जले ,
ऐसा बलात्कारी ,
वीभत्स बलात्कार ......
सुनने वाले की रूह काँप जाये ,
ऐसा बलात्कारी ......
फिर तीन वर्षों के सुधार कार्यक्रम के बाद
उसे सरकार देगी एक लाख रुपए और
दर्जी की दुकान .....
सरकार , न्याय व्यवस्था, सामाजिक संस्थाएं सब उसी के लिए तो है .....
तो निराश न हों
.... नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer 

Saturday, 12 December 2015

दिसंबर की धूप

दिसंबर की ठंढ
समा जाती है नसों के भीतर...
और बहती है लहू के साथ साथ......
पूरे शरीर को भर लेती है
अपने आगोश में .....
जम जाते हैं वक्त के साये भी
बेहिस हो जाती है हर शय
हरसू गूँजती है
ठंडी हवा की साँय साँय ....
ऐसे में तुम याद आती हो
बारहा .......
आ जाओ न तुम
लेकर अपने आगोश में
अधरों से छूकर
भर दो  उष्णीयता से
रोम रोम खिल जाए
पीले सरसो के फूल की तरह
आँखों में उतर आई ओस की बूंदे
हो जाए उड़नछू
सच , फिर कहीं रह न जाये बाकी
नामो निशां ढंढ की
आ जाओ न तुम
दिसंबर की धूप की तरह
............ neeraj kumar neer
#neeraj_kumar_neer 

Tuesday, 8 December 2015

डाकू बैठे गली मुहल्ले

जंगलों और पर्वतों के
गीत गाना चाहता हूँ ।

गाछ, लता, हरियाये , पात
महुआ, सखुआ, नीम, पलाश
ये है मेरी धड़कनों में
तुम्हें सुनाना चाहता हूँ।

जंगलों और पर्वतों के
गीत गाना चाहता हूँ

ताल-तलैया घाट गहरे
किन्तु खुशियों पर पहरे
डाकू बैठे गली मुहल्ले
तुम्हें बताना चाहता हूँ।

जंगलों और पर्वतों के
गीत गाना चाहता हूँ

लूट रहे हैं मुझको सब
मौका मिलता जिनको जब
झारखंड हूँ मैं अपने
घाव दिखाना चाहता हूँ ।

जंगलों और पर्वतों के
गीत गाना चाहता हूँ।

दर्द जो मैं भोगता हूँ
भाव वही मैं रोपता हूँ
हृदय में जो भरा हुआ
तुम्हें दिखाना चाहता हूँ

जंगलों और पर्वतों के
गीत गाना चाहता हूँ
.........नीरज कुमार नीर /
#jharkhand #jungle #geet #neeraj
#neeraj_kumar_neer 

Wednesday, 2 December 2015

मुर्दों में असहिष्णुता नहीं होती

मैं जिंदगी बांटता  हूँ
पर इसके तलबगार
मुर्दे नहीं हो सकते
लहलहाते हरियाये
हँसते खिलखिलाते पौधे
जिनमे फल की उम्मीद है
जल उन्हीं में डालूँगा
सूख चुके /सड़ चुके  पौधों में
जल व्यर्थ ही जाएगा
मैं ढूँढता हू
आनंद और ऊर्जा की खोज में रत
स्वाभिमानी
स्थायी जड़ता से ऊबे
परिवर्तन की चाह वाले
युवा सिपाही।
हजार वर्ष की परतंत्रता ने
जिनके लहू  को
कर दिया है नीला
खराब हो चुंका है जिनका जीन
उन्हें जाना होगा
पीछे नेपथ्य में
जहां अकूत शांति है
उनकी जगह वहीं हैं
मुर्दों में असहिष्णुता नहीं होती
धर्म, राष्ट्र, न्याय से हीन
ये वैसे प्रेत हैं
जो कभी कभी
धर लेते हैं कमजोर मस्तिष्क युवाओं को
............ नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer 

Saturday, 28 November 2015

धर्मनिरपेक्षता : एक लघु कथा

धर्म अफीम की तरह है, धर्म मानवता के विकास में बाधक है, धर्म शोषण का सबसे बड़ा हथियार है । सिंह साहब धाराप्रवाह सभा को संबोधित कर रहे थे। सामने बीस पच्चीस लेखकों, कवियों की जमात बैठी थी, जो उनके हर कहे की सहमति में अपना सर हिला रही थी। सिंह साहब जाने माने कवि थे एवं कई पुरस्कारों से नवाजे  जा चुके थे, अतः सभी के लिए स्पृह्य थे। सब उनकी नजर में आना चाहते थे। सिंह साहब पूरे जोशो खरोश के साथ अपना भाषण  जारी रखे हुए थे, जिसमे वे बता रहे थे कि हिन्दू धर्म कैसे बुराइयों की खान है। हमे कैसे धर्म से जुड़े सभी स्तंभों एवं मानकों का विरोध करना चाहिए ....... पूरे हौल में में उनकी आवाज गूंज रही थी, सभी सम्मान भाव से उन्हें सुन रहे थे। अचानक बोलते बोलते सिंह साहब रुक गए। सभा में उपस्थित सभी लोग सकते में आ गए कि आखिर हुआ क्या .... सिंह साहब चुप क्यों हो गए, कहीं उनकी तबीयत तो खराब नहीं हो गयी ? थोड़ी देर बाद सिंह साहब ने स्वयं ही चुप्पी थोड़ी और कहा “ अभी अजान हो रहा है , अजान के वक्त हम लोग शांति से बैठेंगे और अजान खतम हो जाने के बाद मैं अपनी बात आगे कहूँगा “ बगल के मस्जिद से अजान की आवाज सभा स्थल पर गूंज रही थी अल्लाह हू अकबर अल्लाह ........ सभा में उपस्थित सभी लोग शांत भाव से बैठे रहे ।
..... नीरज कुमार नीर..........
#धर्मनिरपेक्षता, #भारत, #बुद्धिजीवि, #अजान, #हिन्दू, #धर्म 

Saturday, 21 November 2015

लोकतन्त्र के कुछ दोहे

पढ़िये, लोकतन्त्र के कुछ दोहे :
अच्छा लगे तो लोकतन्त्र की जय बोलिए 

लोकतन्त्र में देखिये , नित्य नवीन नजीर। 
पढे लिखे सो अर्दली, अनपढ़ बने वजीर॥ 1 
... 
लोकतन्त्र की दुर्दशा, …. भारत माता रोय । 
अयोध्या में देखिए, रावण पूजित होय ॥  2 
...
लोकतंत्र को है लगा, कैसा कहिए रोग । 
झूठ, कुटिल, पाखंड को, सुंदर खूब सुयोग॥ 3    
......
भीड़, भेड़ अंतर नहीं, कुछ भी कहा न जाय। 
लोकतन्त्र में बागुला,   हंस सम मान पाय ॥ 4 
 ............ 
स्वयं भए कुपात्र जो, औरन तिलक लगाय ।
नैतिकता के सूरमा, हेरत नैन  झुकाय ॥ 5 
........ 
कर जोड़ के खड़ा रहे, लाज शर्म को खोय। 
बात करे ईमान की, डूब मरे सब कोय॥ 6 
----------------- नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer 

Saturday, 14 November 2015

सुशासन बाबू

 कुर्सी के फेर में क्या क्या करैं सुशासन बाबू  
कल के दुःशासन से गले मिलैं सुशासन बाबू

कैसी विडम्बना है  
राजनीति के व्यापार में
जिनके विरुद्ध खड़े हुए  
भेजा कारागार में
अब उन्हीं की आरती
उतारैं सुशासन बाबू  
कुर्सी के फेर में क्या क्या करैं सुशासन बाबू

सत और असत में अब
भेद कोई बचा नहीं है
उनके अपराधों  की  
कोई अब चर्चा नहीं है  
तम सम आचरण को
पावन कहैं सुशासन बाबू
कुर्सी के फेर में क्या क्या करैं सुशासन बाबू

सज्जन के मन खौफजदा
अपराधी आबाद है
जय कहिए कि बिहार में
आया समाजवाद है
लालटेन की रौशनी
जंगल फिरैं सुशासन बाबू
कुर्सी के फेर में क्या क्या करैं सुशासन बाबू

गली गली भुजंग दिखै
और फिरैं गड़ावत  दाँत  
मानसरोवर में बागुला
नाला हंस की पांत
गाल बजावैं खुद को
चंदन कहैं  सुशासन बाबू
कुर्सी के फेर में क्या क्या करैं सुशासन बाबू
............ नीरज कुमार नीर 

Sunday, 8 November 2015

धुआँ और बादल

एक दिन मैं बन गया धुआँ
उठने लगा ऊपर हवा में
ऊपर और ऊपर
बादलों के पास
और बादलों से कहा
मैं भी बादल हूँ
बादल हंसने लगा
कहा
मुझमें पानी है
मैं देता हूँ जीवन
तुम खोखले हो
नफरत की आग से उठे हुए
तुम फैलाओगे
अंधेरा
केवल अंधेरा
मैने आश्चर्य से भरकर
अपने प्यारे देश की ओर देखा
जहां रखी जा रही थी
विकास की बुनियाद
फैलाकर
नफरत की आग
दलितों को सवर्णों के खिलाफ
अगड़ों को पिछड़ों के खिलाफ
मुसलमानो को हिन्दुओ के खिलाफ
क्या उनके विश्वास का सपना
हो जाएगा धुआं?
......... नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#politics #nafrat #dalit #musalman 

Sunday, 1 November 2015

चमड़े की नाव

पकड़कर उसकी पूंछ
करते थे
जिनके पुरखे
पार
कर्म फल की वैतरणी
उसी के चमड़े की
बना के नाव
पार करना चाहते हैं उनके बच्चे
चुनाव की वैतरणी
ताकि पहुँच सकें
सत्ता, शक्ति और सुख के
पंचवर्षीय लोक में ।
... नीरज कुमार नीर

Monday, 26 October 2015

अब आँखों से ही बरसेंगे

मित्रों इस वर्ष भारत के कई हिस्सों में भयानक सूखा पड़ा है ... खरीफ की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गयी है  । भारत में किसान वैसे ही बदहाल है ऐसे में अकाल उनके लिए कोढ़ में खाज जैसी  स्थिति उत्पन्न कर देता है । बड़े शहरों में बैठकर गाँव के किसानों की स्थिति का अंदाजा लगाना जरा मुश्किल काम है पर यकीन मानिए उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय है । किसानो के इसी दर्द को मैंने अपनी इस कविता में समेटने का प्रयत्न किया है । देखिये अगर मैं उनके दर्द के कुछ हिस्से को भी अगर आप तक पहुंचा पाऊँ तो लिखना सार्थक होगा । तो प्रस्तुत है यह कविता :
===============

अंबर से मेघ नहीं बरसे
अब आँखों से ही बरसेंगे

शोक है
मनी नहीं खुशियाँ
गाँव में इस बार
दशहरा पर
असमय गर्भ पात हुआ है
गिरा है गर्भ
धान्य का धरा पर
कृषक के समक्ष
संकट विशाल है
पड़ा फिर से  अकाल है
खाने के एक निवाले को
रमुआ  के बच्चे तरसेंगे।
अंबर से मेघ...........

तीन साल की पुरानी धोती
चार साल की फटी साड़ी
अब एक साल और
चलेगी
पर भूख का इलाज कहाँ है
भंडार में अनाज कहाँ है
छह साल की  मुनियाँ
अपने पेट पर रख कर हाथ
मलेगी
टीवी पर चीखने वाले
बिना मुद्दे के ही गरजेंगे।
अंबर से मेघ...............

व्यवस्था बहुत  बीमार है
अकाल सरकारी त्योहार है
कमाने का खूब है
अवसर
बटेगी राहत की रेवड़ी
खा जाएँगे  नेता,
अफसर
शहर के बड़े बंगलों में
कहकहे व्हिस्की में घुलेंगे।
अंबर से मेघ,,,,,,,,,,,,,,,,

रमेशर छोड़ेगा अब गाँव
जाएगा दिल्ली, सूरत, गुड़गांव
जिंदा मांस खाने वालों से
नोचवाएगा
तब जाकर
दो जून की रोटी पाएगा ।
पीछे गाँव में बीबी, बच्चे
मनी ऑर्डर की राह  तकेंगे
पोस्ट मैन भी कमीशन लेगा
तब जाकर
चूल्हा जलेगा
बाबा बादल की आशा में
आसमान को सतत तकेंगे।

अंबर से मेघ नहीं बरसे
अब आँखों से ही बरसेंगे
..... नीरज कुमार नीर
#NEERAJ_KUMAR_NEER 
#अकाल #akaal #TV #hindi_poem #neta 

Wednesday, 21 October 2015

एक प्रार्थना माँ से

आप सभी मित्रों को दुर्गापूजा की हार्दिक शुभकामनाएं । प्रस्तुत है इस अवसर पर एक प्रार्थना गीत ।
===+++++===
जो कुछ भी है मेरा वह
सब तुम्ही को है समर्पण
स्वीकार करो हे जननी
मेरा भक्ति भाव अर्पण

रूप, शक्ति, भौतिक काया
भ्रम, अज्ञान, असत छाया
क्षितिज पार जो विभास है
सर्व  उसमे हो विसर्जन
स्वीकार करो हे जननी
मेरा भक्ति भाव अर्पण

जले हृदय मेरे  रावण
प्रेम भाव मानस  पावन
रोम रोम में राम बसे
कैसा भी तर्जन गर्जन
स्वीकार करो हे जननी
मेरा भक्ति भाव अर्पण

ऐसे मम नाशो दुर्गति
बढ़े गति मंजिल हो मुक्ति
तेरा करूँ तुझे वापस
कटे उलझे सारे बंधन
स्वीकार करो हे जननी
मेरा भक्ति भाव अर्पण
-- नीरज कुमार नीर --
#neeraj_kumar_neer
#prarthana #maa #bhakti #प्रार्थना #माँ 

Saturday, 17 October 2015

सत्य का बोध

तेजी से घूम रहे चक्र पर
हम ठेल दिये गए हैं
किनारों की ओर
जहां
महसूस होती है सर्वाधिक
इसकी गति
ऊंची उठती है उर्मियाँ
जैसे जैसे हम बढ़ते हैं
केंद्र की ओर
सायास
स्थिरता बढ़ती जाती है
प्रशांत हो जाती है तरंगे
सत्य का बोध
अनावृत होने लगता है
अनुभव होता है एकात्म का ....
.............. नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#satya #hindi_poem
#एकात्म #अनुभव 

Monday, 14 September 2015

हिन्दी दिवस गीत

हिन्दी दिवस की आप सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं। इस अवसर पर आपके समक्ष प्रस्तुत है हिन्दी भाषा को समर्पित एक गीत :

#हिन्दी_दिवस #hindidiwas #हिन्दी_दिवस_गीत 

Tuesday, 25 August 2015

सोचता हूँ मैं कविता का केजरीवाल बन जाऊँ

प्रस्तुत है एक व्यंग्य "सोचता हूँ मैं कविता का केजरीवाल बन जाऊँ " 

#NEERAJ_KUMAR_NEER 
#kejriwal #hindi_poem 

Saturday, 15 August 2015

तिरंगा गीत

आप सभी को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें , प्रस्तुत है इस पुनीत अवसर पर एक #तिरंगा_गीत । #NEERAJ_KUMAR_NEER 
     #tiranga_geet #tiranga #independence_day #independence #15august #azadi 

Saturday, 1 August 2015

माँ शहीद की रोती है

जिस देश में शहीदों का कद्र नहीं हो उस देश का भविष्य सुरक्षित नहीं रहता। अभी हाल ही में पंजाब में आतंकवादी घटना हुई जिसमे वहाँ एक एस पी बलजीत सिंह शहीद हो गए। जिस दिन याक़ूब मेनन को फांसी दी गयी उसी दिन पाकिस्तान बोर्डर पर एक भारतीय सैनिक को टार्गेट कर के शहीद कर दिया गया । एक आतंकवादी , सैकड़ों मासूमों  , बेगुनाहों के हत्यारे  को जब फांसी दी गयी तो उसके पूर्व एवं पश्चात उसकी जितनी चर्चा इस देश के बुद्धिजीवियों एवं मीडिया ने की उसका एक प्रतिशत भी  इस देश के लिए शहीद होने वाले  उपरोक्त बहादुरों के बारे में नहीं किया... क्या इस देश का मीडिया एवं बुद्धिजीवि वर्ग भी यही सोचता है कि सिपाही तो भर्ती ही मरने के लिए होता है ? तो याद रखिए इन्हीं सिपाहियों के पास भाग जाने का  अवसर भी हमेशा ही होता और जब ये सिपाही भाग खड़े होंगे तो इन्हीं आतंकवादियों के हाथों  जिनके लिए ये बुद्धिजीवि आँसू बहाते हैं सब मारे जाएँगे  ....   शहीदों का सम्मान कीजिये , नमन कीजिये उन्हें जो हँसते हँसते देश के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर देते हैं ....... इन्हीं शहीदों को समर्पित है  यह कविता । 

माँ शहीद की रोती है 
....................... 
धरती का सीना फटता है 
जब माँ शहीद की  रोती है
सीने से लगा चित्र प्रिय की 
वीरों की विधवा सोती है ...  

पीघल जाता है लोहा भी 
टकराकर जिनकी छाती से 
धन दौलत से प्यार अधिक 
जिनको देश  की माटी  से 

उनके घर में छत  नहीं है 
बच्चों के आँख में मोती है 
धरती का सीना फटता है 
जब माँ शहीद की  रोती है

जिनके साहस के दम पर 
हम नींद चैन की सोते हैं 
अपने सबल कंधो पर जो 
भार देश का ढोते है 

उनके बच्चों के नींद पर 
दखल भूख की होती है
धरती का सीना फटता है 
जब माँ शहीद की  रोती है

जिनके पद की चापों से 
हिमालय में होता कंपन था 
हर हर महादेव की बोली से 
करता दुश्मन क्रंदन था

पेट भर रोटी के सपने 
उनकी विधवा सँजोती है
धरती का सीना फटता है 
जब माँ शहीद की  रोती है

देश हेतू हुए न्यौछावर 
देश की खातिर प्राण दिया 
माता पिता पत्नी से बढ़कर 
अपने देश  को मान दिया

इनके वृद्ध पिता के तन 
फटी हुई एक धोती है 
धरती का सीना फटता है 
जब माँ शहीद की  रोती है

............ #नीरज कुमार नीर / 24/01/2015
#NEERAJ_KUMAR_NEER 
#शहीद #माँ #deshbhakti #deshbhakti_geet #patriotism #independence #आज़ादी #shahid #martyr #sipahi #soldier 

Sunday, 5 July 2015

दीवानी निर्झर बहे

दीवानी निर्झर बहे
तटिनी तोड़े तटबंध
वर्षा  के अनुराग में
छिन्न भिन्न सब अनुबंध

पत्र पत्र मोती झरे
भूतल  सर्वत्र जलन्ध
हरीतिमा का सागर
अनुपमेय प्रकृति प्रबंध..

धान्य गर्भ हीरक भरे
अभिसारित हर्ष सुगंध
प्रेम स्थापित  धरा करे
मातृ - पुत्रक   संबंध॥
                            ....................... नीरज कुमार नीर
#neeraj kumar neer

Thursday, 25 June 2015

एक बिना शीर्षक की कविता

जंगलों को काटते हुए ,
पहाड़ियों को खोदते हुए
क्या कभी महसूस किया तुमने
हवाओं में मौजूद संगीत को ।
पहाड़ियों पर से उतरती हुई हवा
क्या कहती है ?
जब पुरबइया चलती है तो
पेड़ कौन सा राग सुनाते हैं ?
पलाश के वृक्षों से गिरते हुए टेसू को
पलाश कौन सा गीत सुनाता है ?
क्या देखा है तुमने बैशाख में
जब महुआ जामुन को साँवली कहकर चिढ़ाता है
यह सब कभी अनुभव किया तुमने
नहीं न ?
तुम कर भी नहीं सकते
तुम्हारे लिए जंगल है इमारती लकड़ियाँ
पहाड़ हैं बौक्साइट और लौह अयस्क के भंडार
तुमने कभी इनमे जीवन महसूस नहीं किया ।
तुम्हारी संवेदना को दबा रखा है
तुम्हारी सभ्यता ने
जिसके मापदंड हैं
अच्छे कपड़े और बड़ी गाड़ियाँ ।
तुम देख नहीं पाते वृक्षों में बसे ईश्वर को
इन्हें देखने, महसूस करने के लिए
होना होगा निस्वार्थी, निश्छल
एक आदिवासी ...
नीरज कुमार नीर .................
(एक अच्छा सा शीर्षक आप बताइये )
#neeraj #adivasi
#neeraj_kumar_neer

Monday, 22 June 2015

रात रानी

रात रानी क्यों नहीं खिलती हो तुम
भरी दुपहरी में
जब किसान बोता है
मिट्टी में स्वेद बूंद और
धरा ठहरती है उम्मीद से
जब श्रमिक बोझ उठाये
एक होता है
ईट और गारों के साथ
शहर की अंधी गलियों में
जहां हवा भी भूल जाती है रास्ता ।
तुम्हारी ताजा महक
भर सकती है उनमें उमंग
मिटा सकती है उनकी थकान
दे सकती है उत्साह के कुछ पल
कड़ी धूप का अहसास कम हो सकता है ।
पर तुम महकते हो रात में
जब किसान और श्रमिक
अंधेरे की चादर ओढ़े
थकान से चूर चले जाते हैं
नींद के आगोश में ।
तुम महकते हो
जब ऊंचे प्राचीरों वाले बंगले में
दमदमाती है डिओड्रेण्ट और परफ़्यूम की महक
जहां गौण हो जाता है तुम्हारा होना
तुम्हारा अस्तित्व होता है निरर्थक ।
रात रानी क्यों नहीं खिलती हो तुम
भरी दुपहरी में ?
... #नीरज कुमार नीर
#neeraj #rat_rani #umang #shahar #kisan #perfume #deodrant 

Friday, 19 June 2015

साये से इक प्यार किया था

साये से इक प्यार किया था
खुशबू का व्यापार किया था

दिन जब ढला रौशनी गायब
सूरज पर एतबार किया था

मंजिल नहीं मिली कभी भी
पत्थर को हमराह किया था

जाने मेरे मन में आया क्या
आसमां में द्वार किया था

वो हाकिमे मकतल था जिसके
संग रहना स्वीकार किया था
............. नीरज कुमार नीर
#NEERAJ_KUMAR_NEER 
#gazal 

Tuesday, 2 June 2015

लाला जी की लाल लंगोट

   (एक बाल कविता )

लाला जी की लाल लंगोट में
खटमल था एक लाल 
काट काट कर लाला जी को 
उसने किया बेहाल
गोल मटोल लाला जी 
गुस्से से हो गए लाल पीला 
चिल्ला कर पत्नी को आवाज दी 
नाम था जिसका लीला 
कहा है कोने में जो रखा 
काला मेरा सन्दूक 
उसमे मेरे पिताजी की 
रखी हुई है बंदूक 
बंदूक में  वो गोली भरना 
दिखे तुम्हें जो पीला 
मगर मत छूना गोली  
जो बैंगनी  है और नीला 
और उसको तो कभी ना छूना 
जिसका रंग है हरा 
सावधानी से काम करो 
सुनो मेरा मशवरा 
बंदूक निकाल कर  लीला 
गोली भर कर लायी 
लगा खटमल को निशाना 
एक गोली चलायी 
धम्म से गिरे लाला जी 
और लगे चिल्लाने  
नौकर चाकर ताऊ बेटा 
सबको लगे बुलाने 
कौन रंग की गोली भरी 
तुमने प्यारी लीला 
रंग था उसका काला 
बैंगनी या पीला 
कहा जो लीला ने सुनकर 
उड गए लाला जी के होश 
आंखे उल्टी जीभ बाहर और 
हो गए वो बेहोश
सुना लीला ने हैरत से 
मन उसका घबराया  
उसने लाला को नहीं था 
अब तक यह बताया 
उसे नहीं था रंगो का 
थोड़ा सा भी ज्ञान 
कौन हरा कौन गुलाबी 
थी लाली अंजान 
पीली वाली गोली 
खटमल मार भगाती थी 
नीली वाली गोली 
छिपकलियों को डराती थी 
लाल रंग की गोली से 
चूहे मारे जाते थे 
बैंगनी और गुलाबी से 
कौकरोच भगाये जाते थे 
पर खतरे वाली गोली का 
रंग था गहरा हरा  
लीला ने डाली थी गोली 
जिसमे बारूद था भरा 
एक खटमल के फेर में 
गयी लाला की जान 
है रंगों की पहचान जरूरी 
बच्चों लो तुम जान । 
 नीरज कुमार नीर 
Neeraj Kumar Neer 

Tuesday, 26 May 2015

हिम सागर

जब मैं जन्मा तो था एक झरना
कल कल करता उछल कूद मचाता हुआ
अशांत पर निश्चिन्त ।
फिर हुआ एक चंचल, अधीर नदी
अनवरत आगे बढ़ने की प्रवृति, उतावलापन
मुझे नियंत्रित करती रही मजबूत धाराएँ ।
और अब सागर बनने की राह पर हूँ
ऊपर ऊपर धाराएँ अब भी
नियंत्रित करने का प्रयास करती हैं
पर भीतर भीतर शांत
बनना चाहता हूँ
धीरे धीरे मैं  हिम सागर
बिलकुल ठोस
जिसकी प्रकृति एक सी होगी
अंदर बाहर
सघन शांत ।
नीरज कुमार नीर ...
(c) #neeraj_kumar_neer

Thursday, 21 May 2015

आकाशवाणी के रांची केंद्र से नीरज कुमार नीर के काव्य पाठ के प्रसारण की रिकॉर्डिंग





19.05.2015 को आकाशवाणी के रांची केंद्र से मेरे काव्य पाठ का प्रसारण हुआ ..... उसी की रिकॉर्डिंग आपसे शेयर कर रहा हूँ .... नीचे दिये लिंक को क्लिक कर आप इसे सुन सकते हैं :

                                         सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें 
#neeraj_kumar_neer

Saturday, 16 May 2015

पास तेरे रहूँ वक्त ठहर जाता है

पास  तेरे रहूँ   वक्त  ठहर  जाता   है
दुख दर्द गम जाने सब किधर जाता है ।

घड़ी खो देती मुसल्सल अपने मायने
कब रात  होती  है दिन उतर जाता है ।

बिगड़ी तो कब क्या बनेगी खुदा जाने
इक  पल फिर भी मेरा संवर जाता है।

जो हो होशमंद उसे वक्त का ख्याल हो
मुझे क्या वक्त कब आकर गुजर जाता है ।

हिले जो चिलमन-ए-दरिचाँ-ए-महबूब
रू –ए –आशिक देखिये निखर जाता है ।

खुले दर-ए-खुल्द दस्त से जो दस्त मिले
दौरे  गम खुशियों   में  बदल  जाता  है ।
-------------- नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer

Tuesday, 12 May 2015

फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में

अपनी शादी की सालगिरह पर प्रस्तुत :::::
-----------------------------
फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥

धन्यता हमारी थी जो तुमने हमे स्वीकार किया
मेरे गुण दोषों के संग मुझको अंगीकार किया
दुर्लंघ्य पर्वत विपदा के आए जीवन राह में
यह सम्बल तुम्हारा था हंसकर हमने पार किया
रंग बिरंगी  खिली रौशनी वन प्रांतर निर्जन में ॥

फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥

पूंज ज्योति की तुम बनी जब तम ने जीवन को घेरा
हाथ पकड़  बाहर लायी जब दुखों ने मुझको हेरा
मात पिता निज गृह को तज मम गृह को आधार किया
बाँहें तुम्हारी सर्वदा प्रिय रही सुखों का डेरा
मास बारह वर्ष के भींगा प्रीत के सावन में ॥

फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में॥
.............. नीरज कुमार नीर ..........
#neeraj_kumar_neer

Thursday, 7 May 2015

क्या होगा तब ?

जब करूंगा अंतिम प्रयाण
ढहते हुए भवन को छोडकर
निकलूँगा जब बाहर
किस माध्यम से होकर गुज़रूँगा ?
वहाँ हवा होगी या निर्वात होगा?
होगी गहराई या ऊंचाई में उड़ूँगा
मुझे ऊंचाई से डर लगता है
तैरना भी नहीं आता
क्या यह डर तब भी होगा
मेरा हाथ थामे कोई ले चलेगा
या मैं अकेले ही जाऊंगा
चारो ओर होगा प्रकाश
या अंधेरे ने मुझे घेरा होगा
मुझे अकेलेपन और अंधकार से भी डर लगता है
क्या यह डर तब भी होगा?
भय तो विचारों से होते हैं उत्पन्न
क्या विचार तब भी मेरा पीछा करेंगे ?
लक्ष्य सुज्ञात होगा
या भटकूंगा लक्ष्यहीन
क्या होगा तब ?
,,,,,,,,,, नीरज कुमार नीर ........  #neeraj_kumar_neer

Tuesday, 5 May 2015

राजपथ तक पहुंचाते हाथ

तुम सरपट दौड़ना चाहते हो
राजपथ पर
रास्ते जो पहुचाएंगे राजपथ तक
कांटो से भरे, गीले, दलदली हैं
तुम्हारे फूल से पैरों को अपनी हथेलियों पर उठाने
कई हाथ उभर कर आते हैं अज्ञात से
अनायास, अकस्मात
कुछ हाथों की ओर तुम पाँव बढ़ाते हो स्वयं ही
राजपथ तक पहुँचना चाहते हो
बिना छिले , बिना लस्त पस्त हुए
जिन हाथों पर पाँव रख कर
तुम आगे बढ़ना चाहते हो
उनमे कई बढ़ते हैं
केवल फूलों को छूने की कामना से
कहीं गिरा न दें तुम्हें काँटों पर
मुझे भय नहीं है
पंखुड़ियों के टूट कर बिखर जाने का
मुझे भय इस बात का है कि कहीं
टूट न जाये तुम्हारा
राजपथ तक पहुचने का
हौसला
मैं देखना चाहता हूँ तुम्हें
स्वर्ण सिंहासन पर
रत्न जड़ित मुकुट पहने हुए
........... नीरज कुमार नीर ............ #neeraj_kumar_neer

Sunday, 3 May 2015

Fear

My heart keeps sinking,
I am afraid of
death and losing everything.
One day,
I may lose all and
 may have nothing.
But I’ll have
My conscience,
 my courage
But  no bondage.
Out of every bond
and no more
in any cage.
I’ll be free of
the bond of desire,
the reason of sorrow
But for,
I did always perspire.
..... neeraj kumar neer

Saturday, 2 May 2015

You and me are one

In the eternity of peace,

In the serenity of silence,

In the boundless light

Sparkling and bright.

In the fragrance of love,

In the freedom of dove,

where ends transiency,

where ends mortality,

There lies reality.

You and me become

none but only one

"Neeraj Kumar Neer "


Tuesday, 28 April 2015

गाजे बाजे बाराती


मौसा, मौसी, ताऊ, फूफा
दुल्हे के सब साथी
बज रहे हैं गाजे बाजे
नाच रहे बाराती.

मेट्रो सी चमक रही
दिल्ली वाली भाभी
चक्करघिन्नी सी घूमे अम्मा
टांग कमर में  चाभी
घुटनों का दर्द छुपाये
देख सभी को  मुस्काती

नई सूट पहन कर भैया,
नाश्ते का पैकेट बाँट रहा
अपने लिए भी कोई
कटरीना, करीना छांट रहा
लहंगा चोली पहन के छोटी
घूमती है  इतराती

जनक जीवन की मुश्किल बेला
विदा हो रही सीता
भीतर में कुछ टूट रहा
भर गयी है रिक्तता
पत्थर सी आँखों में
जल बूंदे  बहती आती ..
............. #नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#navgeet #mousa #mousi #dard #barat #metro katrina #kareena  

Tuesday, 21 April 2015

वागर्थ के अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित तीन कवितायें

मित्रों आपसे साझा कर रहा हूँ वागर्थ के अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित मेरी तीन कवितायें .... तीनों कवितायें वर्ष 2014 के दौरान आदिवासी समुदाय की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को केंद्र बिन्दु बनाकर लिखी हुई हैं ... 


#wagarth #neeraj_kumar_neer  #hindi_poems 

Tuesday, 7 April 2015

ले गए चैन करार


मन सरिता में उठी तरंगे
देखा  बैठ  किनारे 
ले गए  चैन  करार 
प्रिय नीरज नैन तुम्हारे।  

अहसासों के अंबर में 
खग बनकर तुम उड़ती हो 
प्रेम सरोवर के तल पर 
मीन मचलती फिरती हो 
तुम पूनम की चाँद सखी री 
नभ में कई सितारे । 

तुम पाटल की पांखुरी
इस जीवन में भरो सुवास 
कभी तो  मिलने आ जाओ
बंधी   हुई  है  आस 
मन का मेरा पपीहरा 
पल पल तुम्हें पुकारे। 

स्वर्ण कलश की अमृत तुम
बूंद एक तो छलकाओ
अमर प्रेम हो जाएगा
अधरों से अगर पिलाओ
तृषा लिए पनघट पर है
प्यासा पथिक  खड़ा रे ।

प्रेम रस सदा एक सा
चाहे आदि, मध्य या अंत 
प्रेम साचा गंगा का पानी
बहता  रहे अनंत 
प्रेम पथ का कुशल बटोही 
लक्ष्य को कहाँ निहारे। 

ले गए चैन करार 
प्रिय नीरज नैन तुम्हारे। 

मन सरिता में उठी तरंगे
देखा बैठ किनारे 
ले गए चैन करार 
प्रिय नीरज नैन तुम्हारे। 
............. नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer

Saturday, 14 March 2015

पार उतारो जहां प्रकाश है: एक प्रार्थना


मेरे मन के गगन पटल पर
रहो सदा ध्रुव तारा बनकर

लक्ष्य तुम्ही, तुम्ही दिग्दर्शक
अंध पथिक के पथ प्रदर्शक 
पार उतारो जहां प्रकाश है 
तम सागर के नाविक बनकर।

बुला रहा हूँ तुझको कबसे 
प्यास बुझाओ मेरे मन के 
द्वार खुला है हृदय के आओ 
मृदु हवा का झोंका बनकर .. 

मेरे मन के गगन पटल पर
रहो सदा ध्रुव तारा बनकर

नीरज कुमार नीर 

Wednesday, 4 March 2015

होली के कुछ दोहे : प्रवासियों के रंग


वर्तमान समय में होली का एक पक्ष यह भी है कि होली के अवसर पर दिल्ली सहित अन्य जगहों पर काम करने वाले  विभिन्न प्रदेशों खास कर पूर्वी यू पी , बिहार , झारखंड आदि से आए लोग होली के अवसर पर अपने मूल पैतृक निवास की ओर रूख करते हैं। ट्रेनों में भारी भीड़ भाड़ देखनों को मिलती है, लेकिन सभी विघ्न बाधाओं को पार कर ये लोग अपने परिवार जनों से मिलने की अतिशय आकांक्षा लिए निकल पड़ते हैं एवं उन्हें देखकर उनके परिवार के लोगों की भी होली की खुशियाँ  दूनी हो जाती है । प्रस्तुत है इसी विषय पर कुछ दोहे :

पंछी उड़े स्वदेश को, छोड़ परायी नीड़ ।
आई होली बढ़ गयी, अब ट्रेनन में भीड़ ॥

तन भूखे जिनके रहे, देश छोड़ के  जाय।
जगे प्रेम की भूख तो, आपन देश बुलाय ॥

मात पिता बंधु भगिनी, पत्नी प्यारा  पूत।
सबके लिए खुशियाँ ले, घर को चला सपूत ॥

पहुचोगे जब गाँव को, फाग में होगा रंग ।
पीपल बरगद पोखरा, आँगन गली उमंग॥

चैत बेदर्दा आय जब, घर सूना कर जाय ।
अपने घर का पूत अब, आन देश को जाय॥

..................... नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#HOLI #dohe 

Monday, 2 March 2015

नदी नीचे जाकर लवण बन गयी

#कथाक्रम के जुलाई-सितंबर 2015 अंक मे प्रकाशित 

एक सत्यान्वेषी ,
मुक्ति का अभिलाषी
था उर्ध्वारोही।
कर रहा था आरोहण
पर्वत की दुर्लंघ्य ऊचाईयां का।
पर्वत से उतरती नदी ने कहा :
मैदानों में तो जीवन कितना सरल , सुगम है,
यहाँ जीवन है कितना दुष्कर।
अविचलित रहकर इसपर
दिया उसने उत्तर
मैंने भीतर जाकर देखा है,
वाह्य सौंदर्य तो धोखा है।
 मैदानों में जीवन सरल है,
पर राह लक्ष्य की वक्र  है।
जीवन रथ मे लगे
 कर्म फल के दुष्चक्र हैं।
मैं राह सीधी लेना चाहता हूँ।
इसलिए नीचे से ऊपर जाना चाहता हूँ ।
दोनों महार्णव मिलन को आतुर
चल दिये,
अपने अपने यौक्तिक मार्ग पर ।
ऊर्ध्वारोही पा गया अपनी इच्छित ऊँचाई
नदी नीचे जाकर लवण बन गयी।
........
#नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer

#jeewan #नदी #hindi_poem
#kathakram #

Sunday, 22 February 2015

चूनर धानी ओढ़कर, आया फाल्गुन मास: फाल्गुन के कुछ दोहे : विरह के रंग



चूनर धानी ओढ़कर, आया फाल्गुन मास
बीता शीत शरद शिशिर, मौसम में मधुमास ॥

पी ली जल की गागरी, मिटी न तन की प्यास 
इहै फाल्गुन आओगे,  लगी हुई है आस॥  

मन है मेरा बावरा, देह सूखती जाय 
फाल्गुन में विदेश पिया, मुँह से निकले हाय 

दिन छोटन थे बड़ हुए, छोट हो गयी रात
मैं बिरहन बिरहन रही, बिरह न माने मात ॥ 
  
फूल फूले और झरे,  गिरे धरा पर पात 
तुझ तक तो पहुँची नहीं, प्रीतम दिल की बात॥

आओगे जब तुम सजन, लेकर आना रंग 
बाँहों में भरकर मुझे, पिया लगाना अंग॥  

हो मन में उमंग अगर,  सब कुछ लगता खास 
फाल्गुन आता मिट जाता दुखों का एहसास
...........  #नीरज कुमार नीर 
#Neeraj_kumar_neer
#होली #holi #dohe #falgun #prem #love 

Wednesday, 18 February 2015

कहाँ गए वो लोग

मित्रों आजकल देखने में आता है कि भारत के गाँव अपनी जिन खूबियों के लिए जाने जाते थे, वहाँ वे खूबियाँ धीरे धीरे गुम होती जा रही है। वहाँ का गंवईपन , आपसी समरसता, प्रेम , भाईचारा, मेल मिलाप, गीत , संगीत, निश्छलता  आदि न जाने कहाँ गायब होते चले गए। गांवों में अब एक अजीब सी निष्ठुरता तारी होती जा रही है, भौतिकतावादी विचारों ने शहर से अपने पाँव गांवों तक पसार लिए हैं । प्रस्तुत है इसी परिदृश्य  को अभिव्यंजित करती यह कविता "कहाँ गए वो लोग" । पढ़िये और बताइये क्या आपके गाँव में भी ऐसा हो रह है ..... 
औरों के गम में रोने वाले 
संग दालान में सोने वाले। 
साँझ ढले मानस का पाठ 
सुनने और सुनाने वाले । 

होती थी जब बेटी विदा 
पड़ोस की चाची रोती थी
बेटी हो किसी के घर की 
अपनी बेटी होती थी 
फूल खिले औरों के आँगन 
मिलकर सोहर गाने वाले ॥ 

पाँव में भले दरारें थी 
पर हँसी  निश्छल निर्दोष
हर दिन उत्सव उत्सव था 
एकादशी हो या प्रदोष  
कच्चे मन के गाछ पर 
खुशियों के फूल खिलाने वाले । 

पूजा हो या कार्य प्रयोजन 
पूरा गाँव उमड़ता था
किसी के घर विपत्ति हो 
सामूहिक रूप से लड़ता था 
किसी के भी संबंधी को 
अपना कुटुंब बताने वाले । 

 गाँव की पंचायतों  में 
स्वयं परमेश्वर बसता था। 
सहकारी परंपरा से 
सारा कार्य निबटता था।   
किसी के घर के चूने पर 
मिलकर छप्पर छाने वाले । 

कहाँ गए वो लोग। 
कहाँ गए वो लोग। 
.............. नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer
#geet #हिन्दी_कविता #hindi_poem 

Sunday, 15 February 2015

परिंदे पत्रिक के दिसंबर - जनवरी ' 2015 अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें " उड़ो तुम " एवं "सपने और रोटियाँ "

परिंदे पत्रिक के दिसंबर - जनवरी ' 2015 अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें  " उड़ो तुम " एवं "सपने और रोटियाँ "

उडो तुम............. 
उडो तुम
उडो व्योम के वितान में.
पसारो पंख निर्भय .
अश्रु धार से
                   नहीं हटेगी चट्टान                   
जो है जीवन की राह में ,
मार्ग अवरुद्ध किये,
खुशियों की .
गगन की ऊंचाई से
सब कुछ छोटा लगता है.
और तुम बड़े हो जाते हो.
गुनगुनाओ कि
गुनगुनाने से जन्मता है राग
मिटता है राग .
सप्तक के गहन सागर में
जब सब शून्य हो जाता है
अस्तित्व का आधार भी और
होता है, सिर्फ आनंद. 
बिस्तर की नमकीन चादर को
धुप दिखा कर 
फिर टांग दो परदे की तरह
अपने और दुखों के बीच ..
...... नीरज कुमार ‘नीर’
------------------------------------
….. सपने और रोटियां 
सपने  अक्सर झूठे होते हैं.
मैने झूठ बेचकर सच ख़रीदा है. 
सच अपने बूढ़े माँ बाप के लिए, 
सच अपने बीवी बच्चों के लिए, 
मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां. 
सपने सहेजे नहीं जा सकते,
मैं सहेज कर रखता हूँ रोटियाँ,
पेट भरा हो तो नींद गहरी आती है.
गहरी नींद में सपने नहीं आते 
मैं नींद में गहरे सोता हूँ.
क्योंकि मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां.
.............  नीरज कुमार ‘नीर’ 

Friday, 13 February 2015

चली हवा कोई ताजा : वैलंटाइन्स डे पर एक गीत सौंदर्य के नाम

आप सभी को वैलंटाइन्स डे की हार्दिक शुभकामनायें :::: प्रस्तुत है एक गीत सौंदर्य के नाम 


चली हवा कोई ताजा  
सुगंध फिजाँ में छायी 
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  

रूप बदल कर नित नवीन 
औ कर के विविध शृंगार 
अधरों पर मुस्कान लिए 
अति सुंदर यौवन हार

हो मन मृत नृत्य तरंगित 
सम्मुख जब जब तुम आई 
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  

गीत प्रगीत अनुगुंजित स्वर 
खुले जब जब नलिन अधर
भंजित पौरुष मान उधर 
हर गाँव और नगर डगर  

सब  तुम्हारे दीवाने
जादू क्या तुम दिखलाई  
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  ....
..........नीरज कुमार नीर 
(c)…….  #Neeraj_kumar_Neer
#valentines day #love

Wednesday, 11 February 2015

अच्छे दिन में यही होगा क्या

जो  कहा  है  वही  होगा  क्या 
भूख का हल अभी  होगा क्या?

था  कहा  आएंगे  दिन  अच्छे 
अच्छे दिन में यही होगा क्या ?

देश आएगा क्या  धन काला 
घर में दूधौ  दही  होगा  क्या?

मर्जी मन की  चलेगी या फिर 
कोई खाता बही होगा क्या?

क्या हुआ आसमानी वादों का 
प्रश्न का हल  कभी होगा क्या?

कुर्सी  पर  आके  भूले  वादे
जो हुआ फिर वही होगा क्या ?

कोयले  की  दलाली कर के  
हाथ काला नहीं होगा क्या ?
................. नीरज कुमार नीर .... 
neeraj kumaar neer 

Tuesday, 10 February 2015

"जंगल में पागल हाथी और ढ़ोल " तथा "नदी स्त्री है " : परिकथा में प्रकाशित दो अन्य कवितायें

परिकथा के जनवरी-फरवरी 2015 के अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें ::::: 
जंगल मे पागल हाथी और ढ़ोल 
-----------------
पेट भर रोटी के नाम पर 
छिन ली गयी हमसे 
हमारे पुरखों की जमीन 
कहा जमीन बंजर है. 

शिक्षा के नाम पर 
छिन लिया गया हमसे 
हमारा धर्म 
कहा धर्म खराब है . 

आधुनिकता के नाम पर 
छिन ली गयी हमसे 
हमारी हजारों साल की सभ्यता 
कहा हमारी सभ्यता पिछड़ी है 

अपने जमीन, धर्म और सभ्यता से हीन,  
जड़ से उखड़े, 
हम ताकते हैं आकाश की ओर 
गड्ढे मे फंसे सूंढ उठाए हाथी की तरह ।
  
जंगल से पागल हथियों को 
भगाने के लिए 
बजाए जा रहे हैं ढ़ोल ।
.......... 
नीरज कुमार नीर 
14/09/2014 
------------------------------------------------------------------------
नदी स्त्री है
..........
नदी होती है
पावन , स्वच्छ , निर्मल .
हम उड़ेलते उसमे अपना कलुष.
नदी समाहित कर लेती है
सब कुछ
अपने अन्दर
और कर देती है उसे
स्वच्छ, निर्मल, पावन. 
नदी स्त्री है.
.. नीरज कुमार नीर
#NEERAJ_KUMAR_NEER 

Sunday, 8 February 2015

अभद्र सपना : "परिकथा" जनवरी- फरवरी 2015 में प्रकाशित

"परिकथा" जनवरी - फरवरी 2015  में मेरी यह कविता प्रकाशित हुई : ::::

हाथ बढ़ाकर चाँद को छूना,
फूलों की वादियों में घूमना,
या लाल ग्रह की जानकारियाँ जुटाना।
मेरे सपनों मे यह सब कुछ नहीं है ।
मेरे सपनों में है :
नए चावल के भात की महक ,
गेहूं की गदराई बालियाँ,
आग में पकाए गए
ताजे आलू का सोन्हा स्वाद ,
पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ।
किसी महानगर के 
दस बाय दस के कमरे में
बारह लोगों से 
देह रगड़ते हुए
मेरे सपनों मे 
कोई राजकुमारी 
नहीं आती।
नहीं बनता 
कोई स्वर्ण महल।
मेरे सपनों में आता है 
बरसात में एक पक्की छत,
जो टपकती नहीं है।
उसके नीचे अभिसार पश्चात
नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी ।
आप कहेंगे यह भद्रता नहीं है
लेकिन मेरा  सपना यही है ।
-----------------------------
नीरज कुमार नीर

Thursday, 29 January 2015

आगे हम बढ़ें


लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम  की 
आगे हम बढ़ें 

खेतों में खुशहाली का 
लहराये पैदावार
पेट भरे हर भूखे का 
फैले सदाचार 
अंत भ्रष्ट तंत्र का 
मिटे दुराचार 
युवा भारत में विकास की  
नई परिभाषा हम गढ़ें ।

भुजाओं में बल 
हृदय में साहस भरा 
जाति  धर्म और उंच-नीच से 
मुक्त करें यह धरा  
मन में कोई मैल नहीं 
रहे सोने सा खरा 
स्वस्थ देह हो और 
खूब हम पढ़ें

लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम  की 
आगे हम बढ़ें
....... नीरज कुमार नीर 

#देशभक्ति #deshbhakti #deshprem #bhrastachar #dharm #neeraj #hindipoem #navgeet 

Sunday, 25 January 2015

लोक तंत्र का नया विहान

प्यारे मित्रों आप सभी को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। आज हमारा देश लोकतन्त्र की एक अप्रतिम मिसाल है । देश में एक नवीन ऊर्जा की अनुभूति की जा रही है । देश का युवा परिवर्तन चाहता है एवं वह पीछे की बातों को छोड़ कर आगे की ओर देखना चाहता है।  गणतन्त्र दिवस के पावन अवसर पर इन्हीं विचारों को आत्मसात करती हुई प्रस्तुत  है यह कविता ।  आशा करता हूँ आपको अच्छी लगेगी। 
अपनी टिप्पणी देना नहीं भूलिएगा ........ यह कविता आज 26/01/2015 के दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हुई है : 



लोक तंत्र के विस्तीर्ण क्षितिज पर
नया विहान आया है ।

तम का आवरण हटा
छाई है नवीन अरुणाई
जन जन ने देश प्रेम की
ली नई अंगड़ाई

बढ़ा भारत युवा
राष्ट्र प्रेम से सना
हर  कंठ फूंटे स्वर
नव गान गाया है।

स्वाभिमान से संपृक्त
विश्व की सबल शक्ति हम
आरूढ़ मंगल यान पर
अब नहीं किसी से कम

लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम की
आगे हम बढ़ें
विश्व शक्ति बनने  का
अवसर महान आया है।

लोक तंत्र के विस्तीर्ण क्षितिज पर
नया विहान आया है।
.......  नीरज कुमार नीर / 24/01/2015
neeraj kumaar neer 

Tuesday, 20 January 2015

प्यार में पड़कर किसी का होना अच्छा लगता है


प्यार में पड़कर किसी का होना अच्छा लगता है 
पाना सब कुछ और फिर से खोना अच्छा लगता है । 

अब भी जब माँ मिलती है ममता ही बरसाती है 
गोद में सर माँ के रख कर सोना अच्छा लगता है।  

बच्चों से मिलता हूँ जब भी बच्चा मै बन जाता हूँ 
नन्हें बच्चों संग बच्चा होना अच्छा लगता है । 

बेबसी  जब बढ़ जाती है हद से ज्यादा जीस्त  में 
हाथ से मुंह अपने ढक कर रोना अच्छा लगता है ॥ 

दुनियाँ भर की धनौ दौलत  से मुझको क्या लेना  
अपने घर का एक छोटा कोना अच्छा लगता है  ।।  
#नीरज कुमार नीर
#neeraj kumar neer
#गजल #gazal #गज़ल  #pyar #love #माँ #बच्चा #hindi 

Saturday, 17 January 2015

बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना


एक पिता के लिए बेटी प्रकृति की सबसे खूबसूरत देन है । बेटी के घर में आते ही घर सुंदर फूलों से भरे उपवन की तरह सज उठता है। जैसे चिड़ियों का कलरव बाग को उसकी पहचान एवं उसका सौंदर्य प्रदान करता है वैसे ही बेटी के घर में होने से घर अपनी संपूर्णता प्राप्त करता है। जीवन में व्याप्त शुष्कता मधुर आनंद में परिणत हो जाती है। गद्य मानो छंदों में आबद्ध होकर किसी सुरीली गायिका  के कंठों से निकल कर प्राणमय हो जाती है ।  इसके बावजूद एक मध्यम आय वर्गीय समाज में एक बेटी के  बाप को अनेक  चिंताओं से गुजरना होता है ।  अपनी बेटी को बेहतरीन शिक्षा दीक्षा देने के बावजूद  बेटी के जन्म के साथ ही उसकी शादी और उसमें आने वाले खर्च की चिंता से एक पिता सतत ग्रस्त रहता है। पता नहीं सभी समाज में ऐसा होता है या नहीं पर जिस समाज से मैं आता हूँ , वहाँ ऐसा होता है। मेरी भी एक बेटी है और जिसके आगमन ने मेरे घर एवं जीवन को अलौकिक आनंद से भर दिया है । मैंने अपनी भावनाओं को प्रस्तुत कविता में शब्द देने की कोशिश की है। आशा है, आप मेरे मन के भावों को समझेंगे । 
इसे अपनी खूबसूरत आवाज में गाया है सुश्री कुमारी गिरिजा ने , जिसे आप नीचे दिये लिंक पर क्लिक कर सुन सकते हैं। बात दिल तक पहुंचे तो अपनी टिप्पणी जरूर दीजिएगा :)


बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 
रे बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

घर में पैसे चार नहीं 
चल रहा व्यापार नहीं  
सोने के बढ़ते दामो ने 
मुश्किल किया है सोना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

अच्छा तुझको घर मिले 
पढ़ा लिखा एक वर मिले 
ससुराल की रहो लाड़ली 
ना मिले दहेज का ताना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 


अम्मा के मन बोझ भारी   
जोड़ रही इक  इक साड़ी 
पैसा पैसा करके जमा  
मुझको है दहेज जुटाना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 


गाड़ी घोड़ी मंडप फूल 
फांक रहा हूँ कब से धूल 
बैंड बाजा लाइट चमचम 
और बारात का खाना
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 
रे बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना ॥ 
.........नीरज कुमार नीर
neeraj kumar neer 
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