Monday, 12 January 2015

मियां मिसिर : एक कहानी

वैसे  मैं अपने इस ब्लॉग पर कवितायें ही पोस्ट करता रहा हूँ । आज पहली बार अपनी एक कहानी यहाँ पोस्ट करने जा रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आएगी। कहानी पर अपनी टिप्पणी जरूर दीजिएगा .... .............  तो प्रस्तुत है कहानी जिसका शीर्षक है      "मियां मिसिर "
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मेरे दादा जी का नाम महादेव मिश्र था, कहते हुए उस बुजुर्ग की आँखें छलछला गयी और मैं आश्चर्य के गहरे सागर मे डूब गया।
 पर आप तो...........कुछ देर ठहर कर मैंने लड़खड़ाते हुए कहा ।
 हाँ ! उस बुजुर्ग ने ठंडी आह भरी और कहा ,  "मेरा नाम मुहम्मद अदीब है"  ऐसा लगा मानो उनकी आवाज दूर कहीं तारों के बीच से होकर आ रही हो।

उनकी आँखें आकाश की ओर स्थिर थी, जैसे आकाश मे कुछ ढूंढ रही हो । थोड़ी देर तक हम दोनों के बीच खामोशी कायम रही, मानो हम दोनों का वहाँ अस्तित्व ही नहीं था। फिर मैंने ही खामोशी तोड़ी और अपने मन के सागर मे उठ रहे जिज्ञासा की अशांत लहरों को शांत करने का अनुरोध किया।  

दरअसल पिछले कई दिनों से हमारी रोज ही मुलाकात हो रही थी। हम दोनों एक ही जगह से दूध लाने जाया करते थे, जब तक दूध वाला दूध दूहता, तब तक हमें वहीं इंतजार करना पड़ता था। उनके चेहरे पर सौम्यता और स्नेह की जैसी झलक मैंने देखी, वैसी बहुत कम देखने को मिलती है। पता नहीं क्या जादू था, मैं उनकी ओर खींचता चला गया था।  मेरे मन में उनके प्रति बरबस ही आदर उमड़ आता था। अक्सर कुर्सियाँ कम होने के कारण देर से आने वाले लोग वहाँ खड़े रहा करते थे।  मैं जब भी उन्हे खड़ा देखता और अगर मैं कुर्सी पर बैठा होता तो अपनी कुर्सी पर उन्हे आग्रहपूर्वक बैठने को कहता। यह अवर्णित, अवाचित संबंध दिनो दिन प्रगाढ़ होता गया। यद्यपि उनकी ओर से इस संबंध की स्वीकारोक्ति बहुत मुखर अभिव्यक्ति के रूप मे कभी नहीं हुई थी तथापि उनकी आँखों में मुझे इस बात की स्वीकारोक्ति दिखती थी।

उस दिन हमलोग दोनों अंतिम मे पहुंचे थे एवं वहाँ अन्य कोई भी नहीं था। मेरे मन मे उनके बारे में जानने की उनसे बात करने की बलवती इच्छा को पता नहीं कैसे उन्होने समझ लिया था और हमारे बीच बात चीत का सेतू जुड़ गया था।
    भोजपुर जिले में एक गाँव है मकरौंदा, मेरे पूर्वज वहीं के निवासी थे, उन्होने आगे कहना शुरू किया। अच्छा खाता पीता परिवार, दो सौ बीघे की किसानी थी । माँ  सरस्वती की भी कृपा थी। कुल मिलाकर कोई कमी नहीं थी । इलाके में परिवार की प्रतिष्ठा थी। गाँव भी अपने आप मे बहुत सुखी सम्पन्न था। गंगा किनारे का मैदानी इलाका। खूब फसल होती, पर्व त्योहार पूरे उत्साह से मनाए जाते थे। शाम मे चैपाल लगती। बड़े, बुजुर्ग, युवा सभी जमा होते, चर्चा परिचर्चा होती, गीत, संगीत का दौर चलता । बूढ़े, बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ाते थे। इसी हुक्के से सारी कहानी जुड़ी है।

    अंग्रेजों का दौर था। उन दिनो कुछ पठान सूखे मेवा बेचने एवं सूद पर पैसा लगाने का काम करने के लिए गाँव मे आते थे। एक शाम मिश्र जी देर से चैपाल मे पहुंचे । उन्हें हुक्के की बड़ी जोर से तलब हो रही थी। जाते जाते उन्होने आव देखा न ताव और हुक्के को मुंह से लगा कर गुड़गुड़ाना शुरू कर दिया। अभी एक ही कश लिया था कि चारो तरफ से जोर का शोर हुआ।  अरे रुको! ठहरो ! ठहरो ! ये क्या कर दिया। मिश्र जी भौचक, एकदम किंकर्तव्यविमूढ़ । धीरे धीरे उन्हे जब बात स्पष्ट हुई तो पता चला कि उनके आने से ठीक पहले एक पठान आया था और उसने हुक्के को मुंह लगाया था, पठान को रोकने की हिम्मत तो किसी की पड़ी नहीं। या तो सभी पठान के कर्ज तले दबे थे या उसकी कद काठी से डरते थे ।

 मिश्र जी को तो काठ मार गया। लोगों ने एक स्वर मे कहना शुरू कर दिया कि अब तो आपका धर्म भ्रष्ट हो गया । मिश्र जी जड़ हो गए। उन्हें आसमान फटता हुआ सा लग रहा था। काटो तो खून नहीं। उन्होने छोटे बड़े सभी के पैर पकड़ लिए।

कहा, कोई तो उपाय बताओ, जिससे इसका प्रायश्चित हो सके।
 उसमे से किसी ने कहा कि गाय का गोबर खाना होगा, किसी ने कहा गोमूत्र से स्नान करना होगा, किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ।

मिश्र जी के ऊपर धर्म खोने का भय कुछ इस तरह व्याप्त हो रहा था कि बदहवाशी के आलम में बारी बारी से वह सभी कुछ किया जो अलग अलग लोग उन्हें कहते गए।

लेकिन एक बड़ा तबका फिर भी यही कहता रहा कि नहीं यह सब करने से कुछ नहीं होगा और इन्हें इनके पूरे परिवार के साथ जाति, समाज और धर्म से बहिष्कृत किया जाये।

इसी बात को लेकर पंचायत बैठी । मिश्र जी कटे बकरे की तरह छटपटा रहे थे। उनके मन के आकाश में भय एवं अनिश्चितता के काले बादलों ने घेरा डाल लिया था। सबके हाथ जोड़े, पैर पकड़े। कुछ बुजुर्गों ने कहा कि अगर महादेव मिश्र सपरिवार तीन महीने तक सूर्योदय के पूर्व गंगा स्नान करें तो उपाय हो सकता है । मिश्र जी इसके लिए भी तैयार हो गए। यद्यपि एक बड़ा तबका फिर भी इस बात पर अड़ा रहा कि नहीं इसका कुछ निराकरण नहीं हो सकता एवं मिश्र जी तो धर्मच्युत हो ही गए। अब इनकी धर्म में वापसी संभव नहीं है । इस प्रकार पंचायत अनिर्णीत समाप्त हुई।

पर महादेव मिश्र को घुप्प अंधेरे मे रौशनी की एक किरण दिख गयी थी। गंगा तीन कोस ही दूर थी । उन्होने सपरिवार, औरत, मर्द, बूढ़ेे, बच्चे सहित अंधेरे मुंह गंगा स्नान के लिए जाना शुरू कर दिया । उन्हें पूरी उम्मीद थी कि इसके बाद तो गंगा मैया कुछ न कुछ राह निकाल ही देगी । समाज एवं धर्म के लोगों का दिल भी शायद पसीज जाय।

    कार्तिक का महीना शुरू हो चुका था।  सुबह सुबह काफी ठंढ होती थी। लेकिन नियमपूर्वक बिना नागा किए, मिश्र जी सपरिवार जिसमें उनके छोटे पोते, पोतियाँ को भी शामिल होना पड़ता था, गंगा स्नान के लिए जाते रहे । किसी तरह दो महीने गुजर गए ।

पूस की कड़ाके की ठंढ प्रारम्भ हो चुकी थी। इसी बीच उनका छह महीने का पोता ठंढ लगने की वजह से गुजर गया। मिश्र जी इस आघात से टूट से गए।

लेकिन वे फिर भी दृढ़ निश्चय के साथ इस कार्य मे लगे रहे।  मन ही मन अपने पूजनीय ग्रंथ गीता के श्लोक
‘श्रेयान्स्वधर्मों विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥ को दुहराते रहते जिससे उन्हें संबल मिलता ।

इस बीच उन्होने अपने परिवार वालों से भी बात चीत करना बंद कर दिया । वे भीतर ही भीतर इस ग्लानि मे जलते रहते थे कि उनके दोष की सजा उनके बाल बच्चों को भुगतनी पड़ रही है।

    इस दौरान गाँव वालों द्वारा उनका बहिष्कार निरंतर जारी रहा। खेती बाड़ी सब बंद हो गयी । कोई उसने लेन देन भी नहीं करता था। विनिमय प्रणाली के जमाने मे गाँव मे जहां सभी लोग एक दूसरे पर निर्भर करते थे बिना आपसी सहयोग के जीना दूभर हो गया । नाते रिशतेदारों ने भी संबंध तोड़ लिए। फिर भी सभी कुछ सहते हुए मिश्र जी एवं पूरा परिवार गंगा स्नान के लिए जाता रहा।

    तीसरे महीने का आखिरी सप्ताह था। पूस का महीना चल रहा था। प्रचंड ठंढ पड़ रही थी। मिश्र जी सपरिवार प्रातः काल गंगा स्नान कर लौट रहे थे । ठंढ के कारण, बच्चे माँ की छाती से चिपके हुए थे। गाँव के सीमाने मे प्रवेश किया था। सब लोग तेजी से घर की ओर कदम बढ़ा रहे थे ।

वहीं एक दोराहे पर कुछ औरतें एवं मर्द जमा थे, मिश्र जी एवं उनके परिवार को देखकर सब हँसते हुए कहने लगे ‘कुछ भी कर लीजिये मिसिर जी, हमलोग अपने में मिलाने वाले नहीं हैं। जिंदगी भर गंगा नहाइएगा तब भी मुसलमान ही रहिएगा।

इतना सुनते ही मिश्र जी बौखला गए । उनका सम्पूर्ण शरीर आग सा तपने लगा। मिश्र जी की सारी सहन शक्ति जवाब दे रही थी। उन्हें गाँव, गंगा, पेड़, पशु, पक्षी सब उनपर हँसते हुए प्रतीत हुए।

उद्विग्नता मे वे जोेर जोर से कूदने लगे और फिर सबने देखा कि मिश्र जी ने अपना जनेऊ उतार कर फेंक दिया और परिवार सहित दूसरी दिशा मे चल दिये । परिवार वाले  भी आश्चर्यचकित कि ये जा कहाँ रहे हैं।
करीब एक घंटा पैदल चलकर वे निकट के कस्बे की मस्जिद मे थे ।

    इस घटना के बाद यद्यपि मिश्र जी ज्यादा जी नहीं पाये । जड़ से उखड़ा वृक्ष भला कितने दिनों तक जीवित रह सकता है। जब तक जिये लोग उन्हें मियां मिसिर  कहते थे।
.............. नीरज कुमार नीर
neeraj kumar neer ..............

13 comments:

  1. सच पहले के लोग धर्म के प्रति इस कदर कट्टर होते थे कि उन्हें कुछ और सूझता ही नहीं था ....लोग भी तरह की बातें कर उनकी परेशानी बढाने में पीछे नहीं रहते ..मिश्रा जी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ देखा कहानी ...
    बढ़िया लगी कहानी ....लिखते रहिये ....

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  2. आपकी लिखी रचना बुधवार 14 जनवरी 2015 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  3. बहुत अच्छी कहानी।

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  4. एक नयी शुरुआत की है आपने कहानी लिख के ... बधाई ...
    अच्छी लगी कहानी ...

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  5. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-01-2015) को अधजल गगरी छलकत जाये प्राणप्रिये..; चर्चा मंच 1857 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    उल्लास और उमंग के पर्व
    लोहड़ी और मकरसंक्रान्ति की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. Kahani acchi lagi iss nayi shuruaat ki badhayi

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  6. sundar kahani jismen ek message bhi hai

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  7. बहुत सुन्दर ।

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  8. मार्मिक।..कहानी। मन में समां गयी।

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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