Sunday, 22 February 2015

चूनर धानी ओढ़कर, आया फाल्गुन मास: फाल्गुन के कुछ दोहे : विरह के रंग



चूनर धानी ओढ़कर, आया फाल्गुन मास
बीता शीत शरद शिशिर, मौसम में मधुमास ॥

पी ली जल की गागरी, मिटी न तन की प्यास 
इहै फाल्गुन आओगे,  लगी हुई है आस॥  

मन है मेरा बावरा, देह सूखती जाय 
फाल्गुन में विदेश पिया, मुँह से निकले हाय 

दिन छोटन थे बड़ हुए, छोट हो गयी रात
मैं बिरहन बिरहन रही, बिरह न माने मात ॥ 
  
फूल फूले और झरे,  गिरे धरा पर पात 
तुझ तक तो पहुँची नहीं, प्रीतम दिल की बात॥

आओगे जब तुम सजन, लेकर आना रंग 
बाँहों में भरकर मुझे, पिया लगाना अंग॥  

हो मन में उमंग अगर,  सब कुछ लगता खास 
फाल्गुन आता मिट जाता दुखों का एहसास
...........  #नीरज कुमार नीर 
#Neeraj_kumar_neer
#होली #holi #dohe #falgun #prem #love 

Wednesday, 18 February 2015

कहाँ गए वो लोग

मित्रों आजकल देखने में आता है कि भारत के गाँव अपनी जिन खूबियों के लिए जाने जाते थे, वहाँ वे खूबियाँ धीरे धीरे गुम होती जा रही है। वहाँ का गंवईपन , आपसी समरसता, प्रेम , भाईचारा, मेल मिलाप, गीत , संगीत, निश्छलता  आदि न जाने कहाँ गायब होते चले गए। गांवों में अब एक अजीब सी निष्ठुरता तारी होती जा रही है, भौतिकतावादी विचारों ने शहर से अपने पाँव गांवों तक पसार लिए हैं । प्रस्तुत है इसी परिदृश्य  को अभिव्यंजित करती यह कविता "कहाँ गए वो लोग" । पढ़िये और बताइये क्या आपके गाँव में भी ऐसा हो रह है ..... 
औरों के गम में रोने वाले 
संग दालान में सोने वाले। 
साँझ ढले मानस का पाठ 
सुनने और सुनाने वाले । 

होती थी जब बेटी विदा 
पड़ोस की चाची रोती थी
बेटी हो किसी के घर की 
अपनी बेटी होती थी 
फूल खिले औरों के आँगन 
मिलकर सोहर गाने वाले ॥ 

पाँव में भले दरारें थी 
पर हँसी  निश्छल निर्दोष
हर दिन उत्सव उत्सव था 
एकादशी हो या प्रदोष  
कच्चे मन के गाछ पर 
खुशियों के फूल खिलाने वाले । 

पूजा हो या कार्य प्रयोजन 
पूरा गाँव उमड़ता था
किसी के घर विपत्ति हो 
सामूहिक रूप से लड़ता था 
किसी के भी संबंधी को 
अपना कुटुंब बताने वाले । 

 गाँव की पंचायतों  में 
स्वयं परमेश्वर बसता था। 
सहकारी परंपरा से 
सारा कार्य निबटता था।   
किसी के घर के चूने पर 
मिलकर छप्पर छाने वाले । 

कहाँ गए वो लोग। 
कहाँ गए वो लोग। 
.............. नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer
#geet #हिन्दी_कविता #hindi_poem 

Sunday, 15 February 2015

परिंदे पत्रिक के दिसंबर - जनवरी ' 2015 अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें " उड़ो तुम " एवं "सपने और रोटियाँ "

परिंदे पत्रिक के दिसंबर - जनवरी ' 2015 अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें  " उड़ो तुम " एवं "सपने और रोटियाँ "

उडो तुम............. 
उडो तुम
उडो व्योम के वितान में.
पसारो पंख निर्भय .
अश्रु धार से
                   नहीं हटेगी चट्टान                   
जो है जीवन की राह में ,
मार्ग अवरुद्ध किये,
खुशियों की .
गगन की ऊंचाई से
सब कुछ छोटा लगता है.
और तुम बड़े हो जाते हो.
गुनगुनाओ कि
गुनगुनाने से जन्मता है राग
मिटता है राग .
सप्तक के गहन सागर में
जब सब शून्य हो जाता है
अस्तित्व का आधार भी और
होता है, सिर्फ आनंद. 
बिस्तर की नमकीन चादर को
धुप दिखा कर 
फिर टांग दो परदे की तरह
अपने और दुखों के बीच ..
...... नीरज कुमार ‘नीर’
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….. सपने और रोटियां 
सपने  अक्सर झूठे होते हैं.
मैने झूठ बेचकर सच ख़रीदा है. 
सच अपने बूढ़े माँ बाप के लिए, 
सच अपने बीवी बच्चों के लिए, 
मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां. 
सपने सहेजे नहीं जा सकते,
मैं सहेज कर रखता हूँ रोटियाँ,
पेट भरा हो तो नींद गहरी आती है.
गहरी नींद में सपने नहीं आते 
मैं नींद में गहरे सोता हूँ.
क्योंकि मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां.
.............  नीरज कुमार ‘नीर’ 

Friday, 13 February 2015

चली हवा कोई ताजा : वैलंटाइन्स डे पर एक गीत सौंदर्य के नाम

आप सभी को वैलंटाइन्स डे की हार्दिक शुभकामनायें :::: प्रस्तुत है एक गीत सौंदर्य के नाम 


चली हवा कोई ताजा  
सुगंध फिजाँ में छायी 
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  

रूप बदल कर नित नवीन 
औ कर के विविध शृंगार 
अधरों पर मुस्कान लिए 
अति सुंदर यौवन हार

हो मन मृत नृत्य तरंगित 
सम्मुख जब जब तुम आई 
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  

गीत प्रगीत अनुगुंजित स्वर 
खुले जब जब नलिन अधर
भंजित पौरुष मान उधर 
हर गाँव और नगर डगर  

सब  तुम्हारे दीवाने
जादू क्या तुम दिखलाई  
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  ....
..........नीरज कुमार नीर 
(c)…….  #Neeraj_kumar_Neer
#valentines day #love

Wednesday, 11 February 2015

अच्छे दिन में यही होगा क्या

जो  कहा  है  वही  होगा  क्या 
भूख का हल अभी  होगा क्या?

था  कहा  आएंगे  दिन  अच्छे 
अच्छे दिन में यही होगा क्या ?

देश आएगा क्या  धन काला 
घर में दूधौ  दही  होगा  क्या?

मर्जी मन की  चलेगी या फिर 
कोई खाता बही होगा क्या?

क्या हुआ आसमानी वादों का 
प्रश्न का हल  कभी होगा क्या?

कुर्सी  पर  आके  भूले  वादे
जो हुआ फिर वही होगा क्या ?

कोयले  की  दलाली कर के  
हाथ काला नहीं होगा क्या ?
................. नीरज कुमार नीर .... 
neeraj kumaar neer 

Tuesday, 10 February 2015

"जंगल में पागल हाथी और ढ़ोल " तथा "नदी स्त्री है " : परिकथा में प्रकाशित दो अन्य कवितायें

परिकथा के जनवरी-फरवरी 2015 के अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें ::::: 
जंगल मे पागल हाथी और ढ़ोल 
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पेट भर रोटी के नाम पर 
छिन ली गयी हमसे 
हमारे पुरखों की जमीन 
कहा जमीन बंजर है. 

शिक्षा के नाम पर 
छिन लिया गया हमसे 
हमारा धर्म 
कहा धर्म खराब है . 

आधुनिकता के नाम पर 
छिन ली गयी हमसे 
हमारी हजारों साल की सभ्यता 
कहा हमारी सभ्यता पिछड़ी है 

अपने जमीन, धर्म और सभ्यता से हीन,  
जड़ से उखड़े, 
हम ताकते हैं आकाश की ओर 
गड्ढे मे फंसे सूंढ उठाए हाथी की तरह ।
  
जंगल से पागल हथियों को 
भगाने के लिए 
बजाए जा रहे हैं ढ़ोल ।
.......... 
नीरज कुमार नीर 
14/09/2014 
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नदी स्त्री है
..........
नदी होती है
पावन , स्वच्छ , निर्मल .
हम उड़ेलते उसमे अपना कलुष.
नदी समाहित कर लेती है
सब कुछ
अपने अन्दर
और कर देती है उसे
स्वच्छ, निर्मल, पावन. 
नदी स्त्री है.
.. नीरज कुमार नीर
#NEERAJ_KUMAR_NEER 

Sunday, 8 February 2015

अभद्र सपना : "परिकथा" जनवरी- फरवरी 2015 में प्रकाशित

"परिकथा" जनवरी - फरवरी 2015  में मेरी यह कविता प्रकाशित हुई : ::::

हाथ बढ़ाकर चाँद को छूना,
फूलों की वादियों में घूमना,
या लाल ग्रह की जानकारियाँ जुटाना।
मेरे सपनों मे यह सब कुछ नहीं है ।
मेरे सपनों में है :
नए चावल के भात की महक ,
गेहूं की गदराई बालियाँ,
आग में पकाए गए
ताजे आलू का सोन्हा स्वाद ,
पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ।
किसी महानगर के 
दस बाय दस के कमरे में
बारह लोगों से 
देह रगड़ते हुए
मेरे सपनों मे 
कोई राजकुमारी 
नहीं आती।
नहीं बनता 
कोई स्वर्ण महल।
मेरे सपनों में आता है 
बरसात में एक पक्की छत,
जो टपकती नहीं है।
उसके नीचे अभिसार पश्चात
नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी ।
आप कहेंगे यह भद्रता नहीं है
लेकिन मेरा  सपना यही है ।
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नीरज कुमार नीर

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