Wednesday, 10 August 2016

शहर मे आदिवासी

(ककसाड के जुलाई अंक में प्रकाशित) 
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देख कर साँप,
आदमी बोला,
बाप रे बाप !
अब तो शहर में भी
आ गए साँप।

साँप सकपकाया,
फिर अड़ा
और तन कर हो गया खड़ा।

फन फैलाकर
ली आदमी की माप।
आदमी अंदर तक
गया काँप ।

आँखेँ मिलाकर बोला साँप :
मैं शहर में नहीं आया
जंगल मे आ गयें हैं आप ।
आप जहां खड़े हैं
वहाँ था
मोटा बरगद का पेड़ ।
उसके कोटर मे रहता था
मेरा बाप ।

आपका शहर जंगल को खा गया ।
आपको लगता है
साँप शहर में आ गया ।
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#नीरज
#neeraj #adiwasi @tribal #saanp #admni #shahar #बाप

5 comments:

  1. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति डेंगू निरोधक दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  2. अच्छी प्रस्तुति....

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  3. सच खेती-बाड़ी और जंगल को शहर लील रहा है ..
    बहुत सटीक रचना

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  4. सच है आपकी रचना ... और न जाने कहाँ तक और जायगा इंसान .. अपनी भूख बढाता ही जा रहा है आदमी ...

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  5. खूबसूरत शब्द ! यही सच है , हम जंगल में हैं और उनके घरों पर कब्जा कर रहे हैं !! बहुत ही शानदार और सार्थक प्रस्तुति नीर साब

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