Wednesday, 24 August 2016

भेड़िये और हिरण के छौने

सहिष्णुता के सबसे बड़े पैरोकार डाल देते हैं नमक अपने विरोधियों की लाशों पर ....... चमक उठती हैं उनकी आँखे जब जंगल के भीतर रेत दी जाती है गर्दनें लेवी की खातिर .... और जो असहिष्णु हैं अपने काम को देते हैं सरंजाम बीच चौराहे पर ताकि सनद रहे..... छल प्रपंच और सुविधा के अनुसार रचे गए इन छद्म विचारों के खुरदरे पाटों के बीच पीसती है मानवता माँगती है भीख मंदिर, मस्जिद, गिरिजा के चौखटों पर और लहूलुहान नजर आती है लाल झंडे के नीचे..... भेड़ियों के झगड़े में हमेशा नुकसान में रहते हैं हिरण के छौने ही। ------ #नीरज कुमार नीर / 23.05.2015
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Wednesday, 10 August 2016

शहर मे आदिवासी

(ककसाड के जुलाई अंक में प्रकाशित) 
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देख कर साँप,
आदमी बोला,
बाप रे बाप !
अब तो शहर में भी
आ गए साँप।

साँप सकपकाया,
फिर अड़ा
और तन कर हो गया खड़ा।

फन फैलाकर
ली आदमी की माप।
आदमी अंदर तक
गया काँप ।

आँखेँ मिलाकर बोला साँप :
मैं शहर में नहीं आया
जंगल मे आ गयें हैं आप ।
आप जहां खड़े हैं
वहाँ था
मोटा बरगद का पेड़ ।
उसके कोटर मे रहता था
मेरा बाप ।

आपका शहर जंगल को खा गया ।
आपको लगता है
साँप शहर में आ गया ।
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