Saturday, 23 August 2014

न जाने कब चाँद निकलेगा


जब सूरज चला जाता है 
अस्ताचल की ओट में 
और चाँद नहीं निकलता है.
दिखती है उफक पर 
पश्चिम दिशा की ओर 
लाल लकीरें.
पूरब में काली आँखों वाला राक्षस 
खोलता है मुंह 
लेता है जोर की साँसे 
चलती है तेज हवाएं. 
लाल लकीरें डूब जाती हैं,
फिर सब हो जाता है प्रशांत.
मैं पाता हूँ स्वयं को 
एक अंध विवर में 
हो जाता हूँ विलीन
तम से एकाकार .
खो जाता है मेरा वजूद.
न जाने कब चाँद निकलेगा.

 (C) ..  नीरज कुमार नीर  .
Neeraj Kumar Neer 
चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, 5 August 2014

दो हाथ की दुनियां :वागर्थ में प्रकाशित


लकीरें  गहरी हो गयी है ,
बुधुआ मांझी के माथे की .
स्याह तल पर उभर आये कई खारे झील .
सिमट गया  है आकाश का सारा विस्तार
उसके आस पास.
दुनियां हो गयी है दो हाथ की.

मिट्टी का घर, छोटे बच्चे, बैल, बकरियां और
खेत का छोटा सा टुकड़ा
इससे आगे है एक मोटी दीवार
बिना खेत और घर के कैसे जियेगा?
इससे जुदा क्या दुनियां हो सकती है ?

उनकी जमीन के नीचे ही क्यों निकलता है कोयला ?
पर  वह  किस पर करे क्रोध
अपने भाग्य पर , पूर्वजों पर , सिंग बोंगा पर ?
उसके आगे है घुप्प अँधेरा
वह धंसता जा रहा है जमीन के अन्दर
उसकी देह परिवर्तित हो रही काले पत्थर में

इस  कोयले में शामिल है उसके पूर्वजों की अस्थियाँ.
उनके पूर्वज भी उन्हीं की तरह काले थे.
क्या यूँ ही उजाड़े जाते लोग
अगर कोयला सफ़ेद होता?
उसकी आँखे दहक उठी है अंगारे की तरह
आग लग गयी है कोयले की खदान में..

..    #नीरज कुमार नीर ..    #neeraj kumar neer

 सिंग बोंगा : आदिवासियों के देवता
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