Saturday, 18 February 2012

झरना


कल कल करता झरना बहता 
कानों में रस घोल रहा है.     

पत्थर पर झुककर वृक्ष देखो 
धीमे से कुछ बोल रहा है.
कल कल करता झरना बहता
कानों में रस घोल रहा है.

गुनगुनी धूप, रेत की चादर
माता के आंचल में छुपकर 
जैसे बच्चा सो रहा है
कल कल करता झरना बहता
कानों में रस घोल रहा है.

कलरव करते पंछी गाते, 
तोता मैना गीत सुनाते   
मेरा भी  मन डोल रहा है
कल कल करता झरना बहता
कानों में रस घोल रहा है.

नीला अम्बर , मीठा पानी , 
प्रकृति कहे सुनो कहानी
जग अपने पट खोल रहा है.

कल कल करता झरना बहता
कानों में रस घोल रहा है.
                                                                .... #नीरज कुमार 'नीर'
#neeraj #jharna #hindi_poem  

3 comments:

  1. यह भाव कुछ कुछ वैसे ही है, जैसे मैंने अपनी कविता "ऐसे में कविता क्यों न हो" में लिखा था. पर आपका गीत, सच में बहुत ही सुन्दर है

    विनोद पासी हंस्कमल

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  2. गुनगुनी धूप और रेत की चादर
    माँ के आंचल में छुपकर
    जैसे बच्चा सो रहा है
    कल कल करता झरना बहता
    कानों में रस घोल रहा है.
    सुन्दर शब्द !

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  3. yeha poem bahuth accha hai par mujhe iska bhav samaj mey nahi aa raha mujhe iska bhav chahiye yeh kavitha tho bahuth madhur aur sunder hai plz

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