Wednesday, 6 January 2016

मैं खुश हूँ कि मैं जो हूँ

मैं एक काफिर हूँ
हां! तुम्हारे लिए मैं एक काफिर हूँ,
यद्यपि कि मैं मानता नहीं किसी को
सिवा एक ईश्वर के
मैने कभी सर नहीं झुकाया
किसी बुत के सामने
मैं नहीं मानता बराबर किसी को
उस ईश्वर के
मैंने कभी झूठ नहीं बोला
हिंसा नहीं की
चौबीसों घंटे ईश्वर की अराधना करता हूँ
मानव तो मानव
करता हूँ जीव मात्र का सम्मान ।
फिर भी मैं काफिर हूँ
हाँ तुम्हारे लिए
फिर भी मैं काफिर हूँ
तुम्हें अधिकार है
मेरा सर कलम करने  की
मेरी संपत्ति  लूट लेने की
और न जाने क्या क्या
क्योंकि मैं काफिर हूँ
मैं जानता हूँ
मैं सत्य की राह पर हूँ
मैं भटक नहीं सकता
पर तुम नहीं मानते
तुम्हें नहीं मानने के लिए कहा गया है
तुम नहीं मानोगे जब तक
मैं तुम्हारी बोली न बोलने लगूँ
तुम नहीं मानोगे जब तक
मैं तुम्हारा रूप न धर लूँ
जो मेरा पुण्य है
जो मेरा धर्म है
वह अर्थहीन है तुम्हारी दृष्टि में
क्योंकि मैं काफिर हूँ
हालांकि मैं खुश हूँ कि मैं जो  हूँ
..............  #नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#kafir #काफ़िर #Hindi_poem #qafir 

8 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 07 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन और कमलेश्वर में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (08.01.2016) को " क्या हो जीने का लक्ष्य" (चर्चा -2215) पर लिंक की गयी है कृपया पधारे। वहाँ आपका स्वागत है, सादर।

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  4. नीरज कुमार जी,आपकी रचना ज़बरदस्त है, परन्तु गज़ल या कविता मे अक्सर पूरा सच नहीं होता।जैसे आप २४ घंटे ईश्वर की आराधना करते हैं, यह अतिश्योक्ति है।आप एक ईश्वर मे वास्तव मे विश्वास करते हैं, तो फिर आपको किसी के प्रमाण.पत्र की आवश्यकता नहीं।"एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ते,नाह नास्ते किन्चन।"ईश्वर एक है,दूसरा कदापि नहीं, तनिक भी नहीं।जिस धर्म मे इन्सान को मारने का आदेश हो,वह ईश्वर का धर्म नहीं होता।मुझे लगता है,अभी आप सदा से चले आ रहे अर्थात सनातन धर्म,शाश्वत धर्म यानी सच्चे धर्म, यानी सबसे प्राचीन धर्म यानी ईश्वर के प्रथम सन्सकरण यानी श्री वेद से अभी दूर हैं।ईश्वर से जो सबका ब्रह्मां है,( ब र ह मा न) ब यानी वह,वह रहमान ,अल्लाह का पर्याय वाची नाम है,से आपके हक मे दुआ।

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  5. नीरज कुमार जी,आपकी रचना ज़बरदस्त है, परन्तु गज़ल या कविता मे अक्सर पूरा सच नहीं होता।जैसे आप २४ घंटे ईश्वर की आराधना करते हैं, यह अतिश्योक्ति है।आप एक ईश्वर मे वास्तव मे विश्वास करते हैं, तो फिर आपको किसी के प्रमाण.पत्र की आवश्यकता नहीं।"एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ते,नाह नास्ते किन्चन।"ईश्वर एक है,दूसरा कदापि नहीं, तनिक भी नहीं।जिस धर्म मे इन्सान को मारने का आदेश हो,वह ईश्वर का धर्म नहीं होता।मुझे लगता है,अभी आप सदा से चले आ रहे अर्थात सनातन धर्म,शाश्वत धर्म यानी सच्चे धर्म, यानी सबसे प्राचीन धर्म यानी ईश्वर के प्रथम सन्सकरण यानी श्री वेद से अभी दूर हैं।ईश्वर से जो सबका ब्रह्मां है,( ब र ह मा न) ब यानी वह,वह रहमान ,अल्लाह का पर्याय वाची नाम है,से आपके हक मे दुआ।

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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