Thursday, 29 January 2015

आगे हम बढ़ें


लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम  की 
आगे हम बढ़ें 

खेतों में खुशहाली का 
लहराये पैदावार
पेट भरे हर भूखे का 
फैले सदाचार 
अंत भ्रष्ट तंत्र का 
मिटे दुराचार 
युवा भारत में विकास की  
नई परिभाषा हम गढ़ें ।

भुजाओं में बल 
हृदय में साहस भरा 
जाति  धर्म और उंच-नीच से 
मुक्त करें यह धरा  
मन में कोई मैल नहीं 
रहे सोने सा खरा 
स्वस्थ देह हो और 
खूब हम पढ़ें

लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम  की 
आगे हम बढ़ें
....... नीरज कुमार नीर 

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Sunday, 25 January 2015

लोक तंत्र का नया विहान

प्यारे मित्रों आप सभी को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। आज हमारा देश लोकतन्त्र की एक अप्रतिम मिसाल है । देश में एक नवीन ऊर्जा की अनुभूति की जा रही है । देश का युवा परिवर्तन चाहता है एवं वह पीछे की बातों को छोड़ कर आगे की ओर देखना चाहता है।  गणतन्त्र दिवस के पावन अवसर पर इन्हीं विचारों को आत्मसात करती हुई प्रस्तुत  है यह कविता ।  आशा करता हूँ आपको अच्छी लगेगी। 
अपनी टिप्पणी देना नहीं भूलिएगा ........ यह कविता आज 26/01/2015 के दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हुई है : 



लोक तंत्र के विस्तीर्ण क्षितिज पर
नया विहान आया है ।

तम का आवरण हटा
छाई है नवीन अरुणाई
जन जन ने देश प्रेम की
ली नई अंगड़ाई

बढ़ा भारत युवा
राष्ट्र प्रेम से सना
हर  कंठ फूंटे स्वर
नव गान गाया है।

स्वाभिमान से संपृक्त
विश्व की सबल शक्ति हम
आरूढ़ मंगल यान पर
अब नहीं किसी से कम

लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम की
आगे हम बढ़ें
विश्व शक्ति बनने  का
अवसर महान आया है।

लोक तंत्र के विस्तीर्ण क्षितिज पर
नया विहान आया है।
.......  नीरज कुमार नीर / 24/01/2015
neeraj kumaar neer 

Tuesday, 20 January 2015

प्यार में पड़कर किसी का होना अच्छा लगता है


प्यार में पड़कर किसी का होना अच्छा लगता है 
पाना सब कुछ और फिर से खोना अच्छा लगता है । 

अब भी जब माँ मिलती है ममता ही बरसाती है 
गोद में सर माँ के रख कर सोना अच्छा लगता है।  

बच्चों से मिलता हूँ जब भी बच्चा मै बन जाता हूँ 
नन्हें बच्चों संग बच्चा होना अच्छा लगता है । 

बेबसी  जब बढ़ जाती है हद से ज्यादा जीस्त  में 
हाथ से मुंह अपने ढक कर रोना अच्छा लगता है ॥ 

दुनियाँ भर की धनौ दौलत  से मुझको क्या लेना  
अपने घर का एक छोटा कोना अच्छा लगता है  ।।  
#नीरज कुमार नीर
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Saturday, 17 January 2015

बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना


एक पिता के लिए बेटी प्रकृति की सबसे खूबसूरत देन है । बेटी के घर में आते ही घर सुंदर फूलों से भरे उपवन की तरह सज उठता है। जैसे चिड़ियों का कलरव बाग को उसकी पहचान एवं उसका सौंदर्य प्रदान करता है वैसे ही बेटी के घर में होने से घर अपनी संपूर्णता प्राप्त करता है। जीवन में व्याप्त शुष्कता मधुर आनंद में परिणत हो जाती है। गद्य मानो छंदों में आबद्ध होकर किसी सुरीली गायिका  के कंठों से निकल कर प्राणमय हो जाती है ।  इसके बावजूद एक मध्यम आय वर्गीय समाज में एक बेटी के  बाप को अनेक  चिंताओं से गुजरना होता है ।  अपनी बेटी को बेहतरीन शिक्षा दीक्षा देने के बावजूद  बेटी के जन्म के साथ ही उसकी शादी और उसमें आने वाले खर्च की चिंता से एक पिता सतत ग्रस्त रहता है। पता नहीं सभी समाज में ऐसा होता है या नहीं पर जिस समाज से मैं आता हूँ , वहाँ ऐसा होता है। मेरी भी एक बेटी है और जिसके आगमन ने मेरे घर एवं जीवन को अलौकिक आनंद से भर दिया है । मैंने अपनी भावनाओं को प्रस्तुत कविता में शब्द देने की कोशिश की है। आशा है, आप मेरे मन के भावों को समझेंगे । 
इसे अपनी खूबसूरत आवाज में गाया है सुश्री कुमारी गिरिजा ने , जिसे आप नीचे दिये लिंक पर क्लिक कर सुन सकते हैं। बात दिल तक पहुंचे तो अपनी टिप्पणी जरूर दीजिएगा :)


बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 
रे बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

घर में पैसे चार नहीं 
चल रहा व्यापार नहीं  
सोने के बढ़ते दामो ने 
मुश्किल किया है सोना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

अच्छा तुझको घर मिले 
पढ़ा लिखा एक वर मिले 
ससुराल की रहो लाड़ली 
ना मिले दहेज का ताना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 


अम्मा के मन बोझ भारी   
जोड़ रही इक  इक साड़ी 
पैसा पैसा करके जमा  
मुझको है दहेज जुटाना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 


गाड़ी घोड़ी मंडप फूल 
फांक रहा हूँ कब से धूल 
बैंड बाजा लाइट चमचम 
और बारात का खाना
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 
रे बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना ॥ 
.........नीरज कुमार नीर
neeraj kumar neer 

Friday, 9 January 2015

सुख दुख और उच्छृंखल मन

उच्छृंखल मन 
करता है खेती 
विचारों की 
और उपजाता है 
फसल
सुख और दुःख  के 
.... 
नीरज कुमार नीर 
neeraj kumar neer 

Sunday, 4 January 2015

गिफ्ट


पॉकेट में तारों को भरकर 
चाँद  को रैपर में लपेट
मैं ले आऊँगा 
तुम्हारे वास्ते 
मेरी जान ! 
तुम उसे सजा लेना 
अपने दामन में 
और मैं देखूंगा 
तुम्हारे चेहरे पर 
उमड़ आई 
बड़ी सी मुस्कान ...
जिससे चाँद फिर 
निकल आएगा 
आसमान में . ...
एक मद्धिम दूधिया रौशनी 
ले लेगी समूचे हयात को 
अपने आगोश में ....
तुम्हारी आँखों की चमक से  
अम्बर  में  उग आएंगे 
फिर से चाँद सितारे। 
................
नीरज कुमार नीर 
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Saturday, 3 January 2015

दृष्टिपात के नवंबर 2014 अंक में प्रकाशित मेरी चार कवितायें


दृष्टिपात के नवंबर 2014 अंक में प्रकाशित मेरी चार कवितायें । 








































मोबाइल न. गलत टाइप हुआ है । 
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