Monday, 13 October 2014

तुम हँसती होगी बजते होंगे जलतरंग


तुम अब भी हँसती होगी बजते होंगे जलतरंग
अब  भी तेरे  आने  से गुल बदलते होंगे रंग। 

एक हम नहीं तो क्या साहेब पूरी महफिल तो है
अब भी तेरी  मुस्कान  पे सब  होते होंगे दंग । 

नदी वही, सब पर्वत, सागर, शजर,  आवो हवा वही
वही  संदल  की खुश्बू  तुम्हें  लगाते  होंगे अंग । 

चातक के मिट जाने से चाँद कहाँ मिट जाता  है
चाँद  चाँदनी  पूनम  रातें  रहते  होंगे  संग । 

अब भी तुम गाती होगी  अब भी झरते होंगे फूल
बेरंग ख़िज़ाँ के मौसम मे भर जाते होंगे रंग । 
-------
 (c) नीरज नीर 
#neeraj neer 

21 comments:

  1. अभी गलती नहीं हुई है

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    Replies
    1. हा हा हा हा ............. :)

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  2. सुन्दर रचना !

    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है !

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  3. प्रेम भरी रचना ... कोमल सादगी भरे झरने सी ..

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  4. Bahut sunder tareef ke shabd ...gazab prastuti !!

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  5. वाह बहुत सुंदर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर-----

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  6. बहुत खूब नीरज विरह के भावो को बड़ी खूबसूरती से गजल में पिरोया है आपने .. सुन्दर जलतरंग सी हँसी :-) विशेष सुन्दर लगी

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  7. बहुत सुन्दर भावों से सजी रचना
    आभार

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  8. कोमल भावनाओं का आलोड़न है आपकी यह रचना प्रतीकतत्व के अलावा भी इसमें कोमल संवेदनाएं हैं प्रेम के शरणागत होना है।

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  9. कोमल भावनाओं को सुन्दर शब्दों में झंकृत कर दिया --बहुत सुन्दर !
    खुदा है कहाँ ?
    कार्ला की गुफाएं और अशोक स्तम्भ

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  10. बहुत ही लाजवाब बात लिखी है आपने ........ उम्दा शेर है ......

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  11. वाह…हर शब्द में कुछ खास है... सुन्दर रचना

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  12. बहुत खूब ... संदल की खुशबू जैसी रचना
    उदासी है मगर रोमानियत के साथ ... वाह

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  13. बहुत सुन्दर.....

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  14. सुंदर गजल!

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आपकी टिप्पणी मेरे लिए बहुत मूल्यवान है. आपकी टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार.

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