Thursday, 17 April 2014

मरे हुए आदमी की नैतिकता


एक रात 
मेरी मुलाकात 
हुई, एक मरे हुए आदमी से. 
आँखों पर चश्मा,
सड़क के बायीं ओर 
चल रहा था.
शक्ल , सूरत से पढ़ा लिखा 
बुद्धिजीवि  लग रहा था.
मैने उससे पूछा सवाल,
पिछली बार, 
तुम्हें कर दिया गया था बेघर, 
लूट कर घर बार, 
छोड़ना पड़ा था अपना देश 
फिरे थे मारे मारे 
छीन ली गयी थी बीवियां.
बेटियों का हुआ था बलात्कार. 
बिना किसी प्रतिरोध के तुमने 
किया था सब कुछ स्वीकार. 
परिस्थितियां ले रही 
पुनः इस बार 
वैसा ही आकार. 
इस बार क्या प्रतिरोध करोगे 
या झुकी आँखों से 
मान इसे नियती
सब चुपचाप ही सहोगे ? 
उसने कहा
बगैर नजर उठाये उन्मन से.   
मेरे जीवन के मूल्य 
महत्वपूर्ण है मेरे जीवन से. 
जिन्होंने मुझ पर किया था अत्याचार, 
दरअसल वे तो थे महज बेरोजगार.   
सारी  समस्या की जड़ बस अर्थ है.
मैने सोचा, यह आदमी है मरा हुआ,
इससे बात करना व्यर्थ है.
घरों की खिड़कियाँ जब 
बड़ी हो जाएँ घर से 
खिड़कियाँ खा जाती है ऐसे घर को. 
नैतिकता जब हावी हो व्यक्ति पर 
लड़ने के डर से,
नैतिकता खा जाती है 
व्यक्तित्व को.
जब तक जीवन है तभी तक 
जीवन मूल्य का अर्थ है 
मरे हुए आदमी की नैतिकता बे अर्थ है .
...........नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 
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24 comments:

  1. जीवन मूल्य का अर्थ है
    मरे हुए आदमी की नैतिकता बे अर्थ है .

    बहुत खूब ...!

    RECENT POST - आज चली कुछ ऐसी बातें.

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  2. आप ठीके लिखकर आए थे हमरे ब्लॉग पर कि आप हमरे जइसा नहीं लिखते हैं... असल में आप हमसे भी बढियाँ लिखते हैं... कमाल है आपका अभिव्यक्ति अऊर हर बात कहने के लिये उपजुक्त सब्द.. बात का असर जहाँ होना चाहिये, ओहीं होता है बिना कोनो भटकाव के..
    हमरे तरफ से सुभकामना!!
    आपका ब्लॉगवा अपना लिस्ट में जोड़ लिये हैं.. अब आना जाना लगले रहेगा!!

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  3. मरे हुए आदमी की नैतिकता बे अर्थ है ...सत्‍य कहा

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  4. आदमी का स्वाभिमान जब समाप्त हो जाता है नैतिकता उस पर हावी हो जाती है और अपने ऊपर अत्याचार को चुपचाप सहता है तो वहा मरे हुए के सामान ही है| अपने या अपने लोगों पर हो रहे अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए प्रोत्साहित करने वाली कविता |

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  5. गहन चिंतन लिये सार्थक रचना ! बहुत सुंदर !

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  6. आपकी इस अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (20-04-2014) को ''शब्दों के बहाव में'' (चर्चा मंच-1588) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर

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  7. बहुत जुदा सी , गहरी कविता.

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  8. हर हाल में जीवित रहने और संघर्ष करने का प्रयास होना चाहिए ...
    अच्छी रचना है ...

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  9. घरों की खिड़कियाँ जब
    बड़ी हो जाएँ घर से
    खिड़कियाँ खा जाती है ऐसे घर को.
    ...बहुत सटीक और लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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  10. मरे हुए आदमी की नैतिकता बे अर्थ है .

    बहुत खूब ...!

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  11. अनूठापन है इस रचना में , बधाई !

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  12. बड़ी हो जाएँ घर से
    खिड़कियाँ खा जाती है ऐसे घर को.
    .......बहुत सटीक और लाज़वाब अभिव्यक्ति

    Recent Post वक्त के साथ चलने की कोशिश

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  13. neeraj ji--behtar kaha aapne--jine ki jaddo jahad me uljhe huye se uljhane ka kya arth hai, berojgaar admi hakikat me mara huwa hai, usse bat karna hi byarth hai....sadhuvad

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  14. ज्यादातर हिन्दुस्तानियों की यही नियति और यही विडम्बना है !सार्थक शब्द

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  15. मज़बूरी का नाम...

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