Sunday, 12 May 2013

माँ वही गीत सुना दो



आज मेरे जी में आया
नन्हा बच्चा मै बन जाऊं.
तेरे आंचल में छुपकर माँ
फिर से मैं सो जाऊं.

तुम सुनाओ लोरी
धीमे धीमे देकर थपकी
आँखे बंद करूँ, मै ले लूँ
मीठी सी एक झपकी.

मैं करूँ शैतानी, माँ ,
मुझको, फिर तुम डांटो.
कान पकड़ कर फिर से झिडको,
फिर से वही सजा दो.

वही काठ की घोड़ी,
वही चंदा मामा,
हांथो में ले दूध कटोरी
गीत वही सुना दो.

..........नीरज कुमार ‘नीर’
#नीरज_कुमार_नीर
#neeraj_kumar_neer 

Thursday, 9 May 2013

जब जब करो श्रृंगार प्रिये

जब जब करो श्रृंगार प्रिये
मैं एक  दर्पण बन जाऊं ।

मैं बनूँ प्रतिबिंब तुम्हारा
ओढ़ कर माधुर्य सारा
लालिमा तेरे अधरों  की
नैन का अंजन बन जाऊं..
जब जब करो श्रृंगार .......

वेणी में बन सजूं बहार
बन जाऊं सोलह श्रृंगार
अनुपम रूप तुम्हारा  प्राण
हार इक चन्दन  बन जाऊं।
जब जब करो श्रृंगार.........

तुम्हारे पायल की रुनझुन
मोहिनी गीतों की गुनगुन
बनकर दमकूं मैं कुमकुम
कुंडल कुन्दन बन जाऊं.
जब जब करो श्रृंगार........

टहक लाली सूर्ख महावर
टूट सके ना जीवन भर
मांग मध्य  अमर  सिंदूर
अमिट इक बंधन बन जाऊं .
जब जब करो श्रृंगार..........

तुम्हारे गजरे में महकूँ
हंसी में तुम्हारी चहकूँ
तुम्हारे  अंतस बसूं सदा
दिल की धड़कन  बन जाऊं

जब जब करो श्रृंगार प्रिये
मैं एक  दर्पण बन जाऊं
..................
नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer 

Sunday, 5 May 2013

ठूंठ का जंगल


ठूंठ के जंगल में

फूटता है जब कोई कपोल,

परितप्त ह्रदय में,

जगती है उम्मीद,

एक कोना छांव की .

.... नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer

तुम ना होते तो


तुम ना होते तो कुछ भी ना होता.

तुम ना होते तो साँसे ना होती,
 तुम ना होते तो हवा भी ना होती ,
तुम्हारे बिन तो कुछ भी ना होता,
सावन ना आता घटा भी ना छाती,
ना पलके झुकाती ना किसी से लजाती ,
दिल की उमंगों को ना आकाश मिलता ,
ना उड़ती हवा में ना परवाज पाती .
ना मस्ती में  फिरती  दुपट्टे उड़ाती .
दिल की धडकनों को फिर किसको सुनाती.
ना होठों पे लाली, ना काजल लगाना
ना घर से निकलती ना बातें बनाती
तुम ना होते तो कुछ भी ना होता .
ना साँसे महकती,  ना जुल्फ लहराती
ना कोई सपने दिखाता, ना नींदे चुराता,
ना किसी से घबराती, ना  छुपती छुपाती.
तुम ना होते तो कुछ भी ना होता .
..................  नीरज कुमार ‘नीर’ 

Tuesday, 23 April 2013

संग राह भी चलती रही

मैं चलता रहा, संग राह भी चलती रही.
यूँ मंजिल ना मिली तमाम उम्र भर.

तीरगी और रौशनी में यूँ तो जंग मुसलसल है.
जलाता रहा चराग मैं तमाम उम्र भर .

नेकी की  जहां भी,  सिला ही मिला ,
होता रहा यूँ ही मैं बदनाम उम्र भर.

तस्वीरे जिंदगी कभी रंगीन ना हुई,
भरता रहा रंग इनमे नाकाम उम्र भर.

मैं खोया रहा गुमनामियों में अकेले ही.
वो सुर्ख़ियों में रहे पढ़कर मेरा कलाम उम्र भर.
................... नीरज कुमार ‘नीर’ 

तीरगी : अँधेरा
मुसलसल: लगातार 

Sunday, 14 April 2013

‘बाल कविता’


प्रस्तुत कविता मैने अपनी बेटी के लिए लिखी है, जो क्लास २ में पढ़ती है, उसे स्कूल में हिंदी कविता पाठ के लिए कविता चाहिए थी, उसने मुझसे कहा कि कविता पाठ के लिए मैं उसे कोई अच्छी सी कविता ढूंढ कर दूँ . मैने उससे कहा कि क्या मैं लिख दूँ , उसने कहा नहीं मुझे तो ढूंढ कर ही दीजिए. मैने पूछा क्यों मैं लिख दूँ तो क्या हर्ज है? उसने कहा आप तो सीरिअस टाइप की कविता लिखते है, मुझे तो फन्नी कविता चाहिए. मैने उसे समझाया कि मैं फन्नी भी लिख सकता हूँ , जिसपर वह राजी हो गयी. मैने उसके लिए यह कविता लिखी जो उसे बहुत बहुत पसंद आयी, उम्मीद है आपको भी पसंद आएगी .


सुबह सुबह हाथी भाई ,
मेरे घर पर आये ,
सूढ़ उठाकर, पूँछ हिलाकर,
दो-दो दांत दिखाए.

क्या चाहिए हाथी भाई,
खुलकर मुझे बताओ,
क्या हैं आपके हाल चाल,
मुझे भी जरा सुनाओ.

भूखा हूँ आज सुबह से,
हाथी ने फ़रमाया,
ब्रश तो कर लिया है,
कुछ नहीं पर खाया .

जाओ जल्दी से जाकर
खाने को कुछ लाओ,
हाथी भाई आये हैं,
मम्मी को बतलाओ.

मम्मी ने पूछा हाथी से
खाने में क्या लोगे,
यहीं खड़े  खाओगे या
कुर्सी पर बैठोगे.

खाने में मैं लेता हूँ
नब्बे दर्जन केले
चार टब दूध पीता हूँ
खड़े खड़े अकेले .

सुनकर हाथी की बातें
मम्मी का सर चकराया
सुबह सुबह हाथी का बच्चा
मेरे घर क्यों आया .

देखकर मम्मी की हैरानी
हाथी ने हल सुझाया ,
लेकर आओ नोट दस के
बोला और मुस्काया .

लेकर नोट दस का फिर
हाथी ने सूढ़ उठाया
खुश रहने का आशीष दिया
फिर आगे कदम बढ़ाया .
.......... नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer

Tuesday, 9 April 2013

मैं सोया रहा खुली आँखों से रात भर


मैं सोया रहा खुली आँखों से रात भर
तुम मुझमे ही जागते रहे भोर तलक .

कब से थी ख्वाहिश तेरे पहलु में बैठूं ,
मैं तुम्हे देखूं, देखते मेरी ओर अपलक.

कुछ नहीं है तेरे मेरे दरम्याँ फिर भी
मुठ्ठी  भर ख़ामोशी  है और  फलक.

तुम जितनी दूर रहती हो मुझसे
मिलन की बढती  है और ललक.

गालों  पर जो लुढका  पानी खारा
 स्वाद फैल गया दिल के छोर तलक .

…………….. नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer 

Friday, 5 April 2013

सपने और रोटियां


सपने  अक्सर झूठे होते हैं.
मैने झूठ बेचकर सच ख़रीदा है.
सच अपने बूढ़े माँ बाप के लिए,
सच अपने बीवी बच्चों के लिए,
मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां.
सपने सहेजे नहीं जा सकते,
मैं सहेज कर रखता हूँ रोटियाँ,
पेट भरा हो तो नींद गहरी आती है.
गहरी नींद में सपने नहीं आते
मैं नींद में गहरे सोता हूँ.
क्योंकि मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां.
.............  नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer



Tuesday, 26 March 2013

होली

मैं पुनः उपस्थित हूँ होली के अवसर पर अपनी एक रचना के साथ, पढ़िए, सुनिए और डूब जाइये होली की मस्ती में, आप सबको होली की बहुत सारी शुभकामनायें. सुनने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें.



लेकर हाथों में पिचकारी
कर दूँ रंगों की बौछार
तेरे अधरों पर लिखूँ
गोरी अपना प्यार .....

इस होलियाना मौसम में
मन हुआ है शराबी ,
तेरे मुख पर मल दूँ गोरी
प्यार का रंग गुलाबी ..

तेरे दिल पे लिख दूँ,
सजनी अपना नाम
तू राधा बन जाए मेरी
मैं तेरा घनश्याम....

मैं तुझको अपलक देखूं
तू मुझको अविराम
तेरे माथे पे भर दूँ
एक सिन्दूरी शाम...

मैं बजाऊं बासुरी,
तेरी पायल छम छम गाये,
खो जाएँ एक दूजे में
हम ऐसा रंग लगाएं..

होली के बहाने ही
बन जाये आपना काम .
मैं मस्त हो जाऊं पीकर
तेरे नयनों का जाम ..
... नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer 


Monday, 25 March 2013

होली नयनन की पिचकारी से


(पति पत्नी में मंहगाई को लेकर होली पर नोकझोक)
बलम ना करो बलजोरी
अबके फागुन खेलूंगी ना
तोरे संग मैं होरी .
बलम ना करो बलजोरी .
                        
मेरी बात माने नाहीं 
मैं ना मानूंगी तोरी.
बलम ना करो बलजोरी.
बलम ना करो बलजोरी.

चांदी की पिचकारी लाओ,
लाओ रंग गुलाबी लाल,
जयपूर से लंहगा लाओ
तब जाकर छुओ गाल.
***********
मंहगाई की मार ने गोरी
जीना किया मुहाल.
पिचकारी मंहगी हुई
मंहगा हुआ गुलाल.

आओ हम रंग चुरा लें
प्रीत की फुलवारी से
आओ खेले हम होली
नयनन की पिचकारी से.

नयनन की पिचकारी से
एक दूजे को रंग लगाएंगे
हाथों में ले अबीर नेह का
गालों को लाल कर जायेंगे.
............ #नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer
#होली #holi #rang #मंहगाई #manhgai #pichkari #gulal 

Friday, 22 March 2013

मैं बाहर थी


जब तुम बुझा रहे थे अपनी आग,
मै जल रही थी.
मैं जल रही थी  पेट की भूख से
मैं जल रही थी माँ की बीमारी के भय से
मैं जल रही थी बच्चों की स्कूल फीस की चिंता से .
जब तुम बुझा रहे थे अपनी आग,
मै जल रही थी.
*******
मैं बाहर  थी
जब तुम अंदर थे। 
मैं बाहर  थी
हलवाई की दुकान पर
पेट की जलन मिटाने के  लिए
रोटियां खरीदती हुई.
मैं बाहर  थी ,
दवा की दुकान पर
अपनी अम्मा के लिए
जिंदगी खरीदती हुई .
मैं बाहर थी
बच्चों के स्कूल में
फीस जमा करती हुई .
मैं बाहर थी
जब तुम अंदर थे
अभिसार की उत्तेजना से मुक्त.
अपनी नग्नता से बेखबर
मैं बाहर थी !!!!
................. नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer


Friday, 15 March 2013

अँधेरी रात का चाँद


बड़ी अजीब  मेरे  मुहब्बत  की  कहानी  है
दिल है जिसका, वो किसी और की दीवानी है.

हर ख्वाहिश किसी  की पूरी  नहीं होती
ये मुकद्दर की बात है, तहरीरे पेशानी है.

किसी दरख़्त पर  मुझे  पनाह नहीं  मिली
मैं ऐसा परिंदा हूँ, सफर जिसकी जिंदगानी है.

मैं  चाँद  हूँ  खोया  हुआ अँधेरी  रात का
चांदनी  मेरे  लिए,  गोया  बेमानी  है.

..................नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer
#chand #taqdeer

Tuesday, 12 March 2013

अषाढ़ का कर्ज


कुछ लिखा है, कुछ लिखना बाकी है,
मेरे इमान का अभी बिकना बाकी है.

फूल तो खिल के मुरझा चुके
अब कांटो का खिलना बाकी है.

कहते हैं आज़ादी परिवर्तन लाती है,
अभी मुल्क में परिवर्तन आना बाकी है.

लिए तो जो कर्ज पिछले अषाढ़ में,
इस बार भी अकाल है, चुकाना बाकी है.

हरिया के बच्चे शहर चले गए,
अभी हरिया का जाना बाकी है,

उसके बाप की भूख से मौत हो गयी
अभी उसकी लाश का जलाना बाकी है.
#neeraj_kumar_neer

.................... नीरज ‘नीर’ 

Wednesday, 6 March 2013

आसमां रंग बदलता है

आसमां रंग बदलता है,
नीला, धूसर कभी फक सफ़ेद.
मानो गुजरता  है
हर्ष, दुःख और भय की
विभिन्न मनस्थितियों से.

कभी आग बरसाता है ,
कभी चाँद तारे सजाता,
कभी जार जार रोता,
धार धार आंसू बहाता.

लेकिन आसमां तनहा नहीं होता,
उसके संग होते है,
समुंदर, नदियाँ, जमीन
सब रंग बदलते है , उसके साथ
जलते हैं, भींगते हैं, झूमते है.
रंग जाते हैं उसके ही रंग में.

मेरे मन का आसमान भी
रंग बदलता है
लेकिन होता है तन्हा, बिलकुल तन्हा.

............ नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
 क्या आपके साथ भी ऐसा कभी होता है?

Tuesday, 5 March 2013

बलमुआ झूठ ना बोलो


फागुन आ गया और फागुन की मस्ती के क्या कहने , ऐसे ही फागुन की मस्ती में एक पत्नी और एक पति के बीच के नोकझोक की दास्ताँ है मेरी प्रस्तुत कविता. पढ़िए और आनंद लीजिए:



बलमुआ झूठ ना बोलो
कि आया फाल्गुन मास सुहाना.
किससे तुमने नैन लड़ाई,
किससे दिल लगाया है.
कौन है बैरी सौतन मेरी
कहाँ से उसको लाया है.
बलमुआ झूठ ना बोलो
कि आया फाल्गुन मास सुहाना.
उड़ा उड़ा सा चेहरा तेरा
माथे पे पसीना
तू बड़ा हरजाई बालम
ना  कहोगे तो
कहूँगी ना.
बलमुआ झूठ ना बोलो
कि आया फाल्गुन मास सुहाना.
सास देवे गारी
ननद मारे ताना.
जेठ आँख दिखावे मोहे
देवरा बड़ा सयाना.
बलमुआ झूठ ना बोलो
कि आया फाल्गुन मास सुहाना..

.......... नीरज कुमार ‘नीर’

Friday, 1 March 2013

धर्म से शिकायत


क्या खाने को चखा
खाने की शिकायत करने से पहले?
क्या परखा उसके गुण दोषों को या
यूँ  हीं चाँद टेढ़ा कर लिया ?
ये आदत है तुम्हारी,
अबाध स्वतंत्रता से उपजी
एक बुरी आदत .
लंबी गुलामी का असर हो गया है
तुम्हारे मस्तिष्क पर.
तुम किनारे पर बैठ
समुन्दर को छिछला बताते हो .
किनारे पर जमा गन्दगी को देख
सागर की प्रकृति बताते हो.
ये गन्दगी सागर का दोष नहीं
यह दोष है तुम्हारा.
जो समझते हैं स्वयं को ज्ञानी
अपने सीमित ज्ञान के साथ.
क्या पन्ने पलटे उपनिषद , गीता के कभी
कभी कोशिश की तत्व जानने की.
चार पन्ने की कोई किताब पढ़ी और
सबको झूठा कह दिया.
तुम क्यों नहीं तलाशते कोई और सागर,
लेकिन नहीं
वहाँ आज़ादी नहीं
बुरा कहने की .
ये तुम्हारे संस्कारों का ही  दोष है .
तुम नंगा  होना चाहते हो,
तुम्हे सत्य और झूठ से मतलब नहीं है.
तुम्हे नंगा होना अच्छा लगता है .
खासकर गैरों के सामने .

... नीरज कुमार ‘नीर’
#neeraj_kumar_neer

क्या आप मेरे विचारों से सहमति रखते हैं.
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