Tuesday, 12 May 2015

फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में

अपनी शादी की सालगिरह पर प्रस्तुत :::::
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फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥

धन्यता हमारी थी जो तुमने हमे स्वीकार किया
मेरे गुण दोषों के संग मुझको अंगीकार किया
दुर्लंघ्य पर्वत विपदा के आए जीवन राह में
यह सम्बल तुम्हारा था हंसकर हमने पार किया
रंग बिरंगी  खिली रौशनी वन प्रांतर निर्जन में ॥

फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥

पूंज ज्योति की तुम बनी जब तम ने जीवन को घेरा
हाथ पकड़  बाहर लायी जब दुखों ने मुझको हेरा
मात पिता निज गृह को तज मम गृह को आधार किया
बाँहें तुम्हारी सर्वदा प्रिय रही सुखों का डेरा
मास बारह वर्ष के भींगा प्रीत के सावन में ॥

फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में॥
.............. नीरज कुमार नीर ..........
#neeraj_kumar_neer

Thursday, 7 May 2015

क्या होगा तब ?

जब करूंगा अंतिम प्रयाण
ढहते हुए भवन को छोडकर
निकलूँगा जब बाहर
किस माध्यम से होकर गुज़रूँगा ?
वहाँ हवा होगी या निर्वात होगा?
होगी गहराई या ऊंचाई में उड़ूँगा
मुझे ऊंचाई से डर लगता है
तैरना भी नहीं आता
क्या यह डर तब भी होगा
मेरा हाथ थामे कोई ले चलेगा
या मैं अकेले ही जाऊंगा
चारो ओर होगा प्रकाश
या अंधेरे ने मुझे घेरा होगा
मुझे अकेलेपन और अंधकार से भी डर लगता है
क्या यह डर तब भी होगा?
भय तो विचारों से होते हैं उत्पन्न
क्या विचार तब भी मेरा पीछा करेंगे ?
लक्ष्य सुज्ञात होगा
या भटकूंगा लक्ष्यहीन
क्या होगा तब ?
,,,,,,,,,, नीरज कुमार नीर ........  #neeraj_kumar_neer

Tuesday, 5 May 2015

राजपथ तक पहुंचाते हाथ

तुम सरपट दौड़ना चाहते हो
राजपथ पर
रास्ते जो पहुचाएंगे राजपथ तक
कांटो से भरे, गीले, दलदली हैं
तुम्हारे फूल से पैरों को अपनी हथेलियों पर उठाने
कई हाथ उभर कर आते हैं अज्ञात से
अनायास, अकस्मात
कुछ हाथों की ओर तुम पाँव बढ़ाते हो स्वयं ही
राजपथ तक पहुँचना चाहते हो
बिना छिले , बिना लस्त पस्त हुए
जिन हाथों पर पाँव रख कर
तुम आगे बढ़ना चाहते हो
उनमे कई बढ़ते हैं
केवल फूलों को छूने की कामना से
कहीं गिरा न दें तुम्हें काँटों पर
मुझे भय नहीं है
पंखुड़ियों के टूट कर बिखर जाने का
मुझे भय इस बात का है कि कहीं
टूट न जाये तुम्हारा
राजपथ तक पहुचने का
हौसला
मैं देखना चाहता हूँ तुम्हें
स्वर्ण सिंहासन पर
रत्न जड़ित मुकुट पहने हुए
........... नीरज कुमार नीर ............ #neeraj_kumar_neer

Sunday, 3 May 2015

Fear

My heart keeps sinking,
I am afraid of
death and losing everything.
One day,
I may lose all and
 may have nothing.
But I’ll have
My conscience,
 my courage
But  no bondage.
Out of every bond
and no more
in any cage.
I’ll be free of
the bond of desire,
the reason of sorrow
But for,
I did always perspire.
..... neeraj kumar neer

Saturday, 2 May 2015

You and me are one

In the eternity of peace,

In the serenity of silence,

In the boundless light

Sparkling and bright.

In the fragrance of love,

In the freedom of dove,

where ends transiency,

where ends mortality,

There lies reality.

You and me become

none but only one

"Neeraj Kumar Neer "


Tuesday, 28 April 2015

गाजे बाजे बाराती


मौसा, मौसी, ताऊ, फूफा
दुल्हे के सब साथी
बज रहे हैं गाजे बाजे
नाच रहे बाराती.

मेट्रो सी चमक रही
दिल्ली वाली भाभी
चक्करघिन्नी सी घूमे अम्मा
टांग कमर में  चाभी
घुटनों का दर्द छुपाये
देख सभी को  मुस्काती

नई सूट पहन कर भैया,
नाश्ते का पैकेट बाँट रहा
अपने लिए भी कोई
कटरीना, करीना छांट रहा
लहंगा चोली पहन के छोटी
घूमती है  इतराती

जनक जीवन की मुश्किल बेला
विदा हो रही सीता
भीतर में कुछ टूट रहा
भर गयी है रिक्तता
पत्थर सी आँखों में
जल बूंदे  बहती आती ..
............. #नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#navgeet #mousa #mousi #dard #barat #metro katrina #kareena  

Tuesday, 21 April 2015

वागर्थ के अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित तीन कवितायें

मित्रों आपसे साझा कर रहा हूँ वागर्थ के अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित मेरी तीन कवितायें .... तीनों कवितायें वर्ष 2014 के दौरान आदिवासी समुदाय की आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को केंद्र बिन्दु बनाकर लिखी हुई हैं ... 


#wagarth #neeraj_kumar_neer  #hindi_poems 

Tuesday, 7 April 2015

ले गए चैन करार


मन सरिता में उठी तरंगे
देखा  बैठ  किनारे 
ले गए  चैन  करार 
प्रिय नीरज नैन तुम्हारे।  

अहसासों के अंबर में 
खग बनकर तुम उड़ती हो 
प्रेम सरोवर के तल पर 
मीन मचलती फिरती हो 
तुम पूनम की चाँद सखी री 
नभ में कई सितारे । 

तुम पाटल की पांखुरी
इस जीवन में भरो सुवास 
कभी तो  मिलने आ जाओ
बंधी   हुई  है  आस 
मन का मेरा पपीहरा 
पल पल तुम्हें पुकारे। 

स्वर्ण कलश की अमृत तुम
बूंद एक तो छलकाओ
अमर प्रेम हो जाएगा
अधरों से अगर पिलाओ
तृषा लिए पनघट पर है
प्यासा पथिक  खड़ा रे ।

प्रेम रस सदा एक सा
चाहे आदि, मध्य या अंत 
प्रेम साचा गंगा का पानी
बहता  रहे अनंत 
प्रेम पथ का कुशल बटोही 
लक्ष्य को कहाँ निहारे। 

ले गए चैन करार 
प्रिय नीरज नैन तुम्हारे। 

मन सरिता में उठी तरंगे
देखा बैठ किनारे 
ले गए चैन करार 
प्रिय नीरज नैन तुम्हारे। 
............. नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer

Saturday, 14 March 2015

पार उतारो जहां प्रकाश है: एक प्रार्थना


मेरे मन के गगन पटल पर
रहो सदा ध्रुव तारा बनकर

लक्ष्य तुम्ही, तुम्ही दिग्दर्शक
अंध पथिक के पथ प्रदर्शक 
पार उतारो जहां प्रकाश है 
तम सागर के नाविक बनकर।

बुला रहा हूँ तुझको कबसे 
प्यास बुझाओ मेरे मन के 
द्वार खुला है हृदय के आओ 
मृदु हवा का झोंका बनकर .. 

मेरे मन के गगन पटल पर
रहो सदा ध्रुव तारा बनकर

नीरज कुमार नीर 

Wednesday, 4 March 2015

होली के कुछ दोहे : प्रवासियों के रंग


वर्तमान समय में होली का एक पक्ष यह भी है कि होली के अवसर पर दिल्ली सहित अन्य जगहों पर काम करने वाले  विभिन्न प्रदेशों खास कर पूर्वी यू पी , बिहार , झारखंड आदि से आए लोग होली के अवसर पर अपने मूल पैतृक निवास की ओर रूख करते हैं। ट्रेनों में भारी भीड़ भाड़ देखनों को मिलती है, लेकिन सभी विघ्न बाधाओं को पार कर ये लोग अपने परिवार जनों से मिलने की अतिशय आकांक्षा लिए निकल पड़ते हैं एवं उन्हें देखकर उनके परिवार के लोगों की भी होली की खुशियाँ  दूनी हो जाती है । प्रस्तुत है इसी विषय पर कुछ दोहे :

पंछी उड़े स्वदेश को, छोड़ परायी नीड़ ।
आई होली बढ़ गयी, अब ट्रेनन में भीड़ ॥

तन भूखे जिनके रहे, देश छोड़ के  जाय।
जगे प्रेम की भूख तो, आपन देश बुलाय ॥

मात पिता बंधु भगिनी, पत्नी प्यारा  पूत।
खुशियाँ ले सबके लिए, घर को चला सपूत ॥

पहुचोगे जब गाँव को, फाग में होगा रँग ।
पीपल बरगद पोखरा, आँगन गली उमंग॥

चैत मास  बड़ा निर्दय , घर सूना कर जाय ।
अपने घर का लाड़ला, आन देश को जाय॥

..................... नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#HOLI #dohe 

Monday, 2 March 2015

नदी नीचे जाकर लवण बन गयी

#कथाक्रम के जुलाई-सितंबर 2015 अंक मे प्रकाशित 

एक सत्यान्वेषी ,
मुक्ति का अभिलाषी
था उर्ध्वारोही।
कर रहा था आरोहण
पर्वत की दुर्लंघ्य ऊचाईयां का।
पर्वत से उतरती नदी ने कहा :
मैदानों में तो जीवन कितना सरल , सुगम है,
यहाँ जीवन है कितना दुष्कर।
अविचलित रहकर इसपर
दिया उसने उत्तर
मैंने भीतर जाकर देखा है,
वाह्य सौंदर्य तो धोखा है।
 मैदानों में जीवन सरल है,
पर राह लक्ष्य की वक्र  है।
जीवन रथ मे लगे
 कर्म फल के दुष्चक्र हैं।
मैं राह सीधी लेना चाहता हूँ।
इसलिए नीचे से ऊपर जाना चाहता हूँ ।
दोनों महार्णव मिलन को आतुर
चल दिये,
अपने अपने यौक्तिक मार्ग पर ।
ऊर्ध्वारोही पा गया अपनी इच्छित ऊँचाई
नदी नीचे जाकर लवण बन गयी।
........
#नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer

#jeewan #नदी #hindi_poem
#kathakram #

Sunday, 22 February 2015

चूनर धानी ओढ़कर, आया फाल्गुन मास: फाल्गुन के कुछ दोहे : विरह के रंग



चूनर धानी ओढ़कर, आया फाल्गुन मास
बीता शीत शरद शिशिर, मौसम में मधुमास ॥

पी ली जल की गागरी, मिटी न तन की प्यास 
इहै फाल्गुन आओगे,  लगी हुई है आस॥  

मन है मेरा बावरा, देह सूखती जाय 
फाल्गुन में विदेश पिया, मुँह से निकले हाय 

दिवस लघु से दीर्घ हुए, क्षुद्र हो गयी रात  
मैं बिरहन बिरहन रही, बिरह न माने मात ॥ 
  
फूल फूले और झरे,  गिरे धरा पर पात 
तुझ तक तो पहुँची नहीं, प्रीतम दिल की बात॥

आओगे जब साजना, लेकर आना रंग 
बाँहों में भरकर मुझे, पिया लगाना अंग॥  

मन में अगर उमंग हो ,  सब कुछ लगता खास 
फाल्गुन आता मिट जाता दुखों का एहसास
...........  #नीरज कुमार नीर 
#Neeraj_kumar_neer
#होली #holi #dohe #falgun #prem #love 

Wednesday, 18 February 2015

कहाँ गए वो लोग

मित्रों आजकल देखने में आता है कि भारत के गाँव अपनी जिन खूबियों के लिए जाने जाते थे, वहाँ वे खूबियाँ धीरे धीरे गुम होती जा रही है। वहाँ का गंवईपन , आपसी समरसता, प्रेम , भाईचारा, मेल मिलाप, गीत , संगीत, निश्छलता  आदि न जाने कहाँ गायब होते चले गए। गांवों में अब एक अजीब सी निष्ठुरता तारी होती जा रही है, भौतिकतावादी विचारों ने शहर से अपने पाँव गांवों तक पसार लिए हैं । प्रस्तुत है इसी परिदृश्य  को अभिव्यंजित करती यह कविता "कहाँ गए वो लोग" । पढ़िये और बताइये क्या आपके गाँव में भी ऐसा हो रह है ..... 
औरों के गम में रोने वाले 
संग दालान में सोने वाले। 
साँझ ढले मानस का पाठ 
सुनने और सुनाने वाले । 

होती थी जब बेटी विदा 
पड़ोस की चाची रोती थी
बेटी हो किसी के घर की 
अपनी बेटी होती थी 
फूल खिले औरों के आँगन 
मिलकर सोहर गाने वाले ॥ 

पाँव में भले दरारें थी 
पर हँसी  निश्छल निर्दोष
हर दिन उत्सव उत्सव था 
एकादशी हो या प्रदोष  
कच्चे मन के गाछ पर 
खुशियों के फूल खिलाने वाले । 

पूजा हो या कार्य प्रयोजन 
पूरा गाँव उमड़ता था
किसी के घर विपत्ति हो 
सामूहिक रूप से लड़ता था 
किसी के भी संबंधी को 
अपना कुटुंब बताने वाले । 

 गाँव की पंचायतों  में 
स्वयं परमेश्वर बसता था। 
सहकारी परंपरा से 
सारा कार्य निबटता था।   
किसी के घर के चूने पर 
मिलकर छप्पर छाने वाले । 

कहाँ गए वो लोग। 
कहाँ गए वो लोग। 
.............. नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer
#geet #हिन्दी_कविता #hindi_poem 

Sunday, 15 February 2015

परिंदे पत्रिक के दिसंबर - जनवरी ' 2015 अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें " उड़ो तुम " एवं "सपने और रोटियाँ "

परिंदे पत्रिक के दिसंबर - जनवरी ' 2015 अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें  " उड़ो तुम " एवं "सपने और रोटियाँ "

उडो तुम............. 
उडो तुम
उडो व्योम के वितान में.
पसारो पंख निर्भय .
अश्रु धार से
                   नहीं हटेगी चट्टान                   
जो है जीवन की राह में ,
मार्ग अवरुद्ध किये,
खुशियों की .
गगन की ऊंचाई से
सब कुछ छोटा लगता है.
और तुम बड़े हो जाते हो.
गुनगुनाओ कि
गुनगुनाने से जन्मता है राग
मिटता है राग .
सप्तक के गहन सागर में
जब सब शून्य हो जाता है
अस्तित्व का आधार भी और
होता है, सिर्फ आनंद. 
बिस्तर की नमकीन चादर को
धुप दिखा कर 
फिर टांग दो परदे की तरह
अपने और दुखों के बीच ..
...... नीरज कुमार ‘नीर’
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….. सपने और रोटियां 
सपने  अक्सर झूठे होते हैं.
मैने झूठ बेचकर सच ख़रीदा है. 
सच अपने बूढ़े माँ बाप के लिए, 
सच अपने बीवी बच्चों के लिए, 
मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां. 
सपने सहेजे नहीं जा सकते,
मैं सहेज कर रखता हूँ रोटियाँ,
पेट भरा हो तो नींद गहरी आती है.
गहरी नींद में सपने नहीं आते 
मैं नींद में गहरे सोता हूँ.
क्योंकि मैने सपने बेचकर खरीदी हैं रोटियां.
.............  नीरज कुमार ‘नीर’ 

Friday, 13 February 2015

चली हवा कोई ताजा : वैलंटाइन्स डे पर एक गीत सौंदर्य के नाम

आप सभी को वैलंटाइन्स डे की हार्दिक शुभकामनायें :::: प्रस्तुत है एक गीत सौंदर्य के नाम 


चली हवा कोई ताजा  
सुगंध फिजाँ में छायी 
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  

रूप बदल कर नित नवीन 
औ कर के विविध शृंगार 
अधरों पर मुस्कान लिए 
अति सुंदर यौवन हार

हो मन मृत नृत्य तरंगित 
सम्मुख जब जब तुम आई 
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  

गीत प्रगीत अनुगुंजित स्वर 
खुले जब जब नलिन अधर
भंजित पौरुष मान उधर 
हर गाँव और नगर डगर  

सब  तुम्हारे दीवाने
जादू क्या तुम दिखलाई  
खिली बसंती धूप नई
प्रिय तुम जब जब मुस्कायी  ....
..........नीरज कुमार नीर 
(c)…….  #Neeraj_kumar_Neer
#valentines day #love

Wednesday, 11 February 2015

अच्छे दिन में यही होगा क्या

जो  कहा  है  वही  होगा  क्या 
भूख का हल अभी  होगा क्या?

था  कहा  आएंगे  दिन  अच्छे 
अच्छे दिन में यही होगा क्या ?

देश आएगा क्या  धन काला 
घर में दूधौ  दही  होगा  क्या?

मर्जी मन की  चलेगी या फिर 
कोई खाता बही होगा क्या?

क्या हुआ आसमानी वादों का 
प्रश्न का हल  कभी होगा क्या?

कुर्सी  पर  आके  भूले  वादे
जो हुआ फिर वही होगा क्या ?

कोयले  की  दलाली कर के  
हाथ काला नहीं होगा क्या ?
................. नीरज कुमार नीर .... 
neeraj kumaar neer 

Tuesday, 10 February 2015

"जंगल में पागल हाथी और ढ़ोल " तथा "नदी स्त्री है " : परिकथा में प्रकाशित दो अन्य कवितायें

परिकथा के जनवरी-फरवरी 2015 के अंक में प्रकाशित मेरी दो कवितायें ::::: 
जंगल मे पागल हाथी और ढ़ोल 
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पेट भर रोटी के नाम पर 
छिन ली गयी हमसे 
हमारे पुरखों की जमीन 
कहा जमीन बंजर है. 

शिक्षा के नाम पर 
छिन लिया गया हमसे 
हमारा धर्म 
कहा धर्म खराब है . 

आधुनिकता के नाम पर 
छिन ली गयी हमसे 
हमारी हजारों साल की सभ्यता 
कहा हमारी सभ्यता पिछड़ी है 

अपने जमीन, धर्म और सभ्यता से हीन,  
जड़ से उखड़े, 
हम ताकते हैं आकाश की ओर 
गड्ढे मे फंसे सूंढ उठाए हाथी की तरह ।
  
जंगल से पागल हथियों को 
भगाने के लिए 
बजाए जा रहे हैं ढ़ोल ।
.......... 
नीरज कुमार नीर 
14/09/2014 
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नदी स्त्री है
..........
नदी होती है
पावन , स्वच्छ , निर्मल .
हम उड़ेलते उसमे अपना कलुष.
नदी समाहित कर लेती है
सब कुछ
अपने अन्दर
और कर देती है उसे
स्वच्छ, निर्मल, पावन. 
नदी स्त्री है.
.. नीरज कुमार नीर
#NEERAJ_KUMAR_NEER 

Sunday, 8 February 2015

अभद्र सपना : "परिकथा" जनवरी- फरवरी 2015 में प्रकाशित

"परिकथा" जनवरी - फरवरी 2015  में मेरी यह कविता प्रकाशित हुई : ::::

हाथ बढ़ाकर चाँद को छूना,
फूलों की वादियों में घूमना,
या लाल ग्रह की जानकारियाँ जुटाना।
मेरे सपनों मे यह सब कुछ नहीं है ।
मेरे सपनों में है :
नए चावल के भात की महक ,
गेहूं की गदराई बालियाँ,
आग में पकाए गए
ताजे आलू का सोन्हा स्वाद ,
पेट भरने के उपरांत उँघाती बूढ़ी माँ।
किसी महानगर के 
दस बाय दस के कमरे में
बारह लोगों से 
देह रगड़ते हुए
मेरे सपनों मे 
कोई राजकुमारी 
नहीं आती।
नहीं बनता 
कोई स्वर्ण महल।
मेरे सपनों में आता है 
बरसात में एक पक्की छत,
जो टपकती नहीं है।
उसके नीचे अभिसार पश्चात
नथुने फूलाकर सोती हुई मेरी पत्नी ।
आप कहेंगे यह भद्रता नहीं है
लेकिन मेरा  सपना यही है ।
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नीरज कुमार नीर

Thursday, 29 January 2015

आगे हम बढ़ें


लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम  की 
आगे हम बढ़ें 

खेतों में खुशहाली का 
लहराये पैदावार
पेट भरे हर भूखे का 
फैले सदाचार 
अंत भ्रष्ट तंत्र का 
मिटे दुराचार 
युवा भारत में विकास की  
नई परिभाषा हम गढ़ें ।

भुजाओं में बल 
हृदय में साहस भरा 
जाति  धर्म और उंच-नीच से 
मुक्त करें यह धरा  
मन में कोई मैल नहीं 
रहे सोने सा खरा 
स्वस्थ देह हो और 
खूब हम पढ़ें

लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम  की 
आगे हम बढ़ें
....... नीरज कुमार नीर 

#देशभक्ति #deshbhakti #deshprem #bhrastachar #dharm #neeraj #hindipoem #navgeet 

Sunday, 25 January 2015

लोक तंत्र का नया विहान

प्यारे मित्रों आप सभी को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। आज हमारा देश लोकतन्त्र की एक अप्रतिम मिसाल है । देश में एक नवीन ऊर्जा की अनुभूति की जा रही है । देश का युवा परिवर्तन चाहता है एवं वह पीछे की बातों को छोड़ कर आगे की ओर देखना चाहता है।  गणतन्त्र दिवस के पावन अवसर पर इन्हीं विचारों को आत्मसात करती हुई प्रस्तुत  है यह कविता ।  आशा करता हूँ आपको अच्छी लगेगी। 
अपनी टिप्पणी देना नहीं भूलिएगा ........ यह कविता आज 26/01/2015 के दैनिक जागरण में भी प्रकाशित हुई है : 



लोक तंत्र के विस्तीर्ण क्षितिज पर
नया विहान आया है ।

तम का आवरण हटा
छाई है नवीन अरुणाई
जन जन ने देश प्रेम की
ली नई अंगड़ाई

बढ़ा भारत युवा
राष्ट्र प्रेम से सना
हर  कंठ फूंटे स्वर
नव गान गाया है।

स्वाभिमान से संपृक्त
विश्व की सबल शक्ति हम
आरूढ़ मंगल यान पर
अब नहीं किसी से कम

लेकर ध्वजा राष्ट्र प्रेम की
आगे हम बढ़ें
विश्व शक्ति बनने  का
अवसर महान आया है।

लोक तंत्र के विस्तीर्ण क्षितिज पर
नया विहान आया है।
.......  नीरज कुमार नीर / 24/01/2015
neeraj kumaar neer 

Tuesday, 20 January 2015

प्यार में पड़कर किसी का होना अच्छा लगता है


प्यार में पड़कर किसी का होना अच्छा लगता है 
पाना सब कुछ और फिर से खोना अच्छा लगता है । 

अब भी जब माँ मिलती है ममता ही बरसाती है 
गोद में सर माँ के रख कर सोना अच्छा लगता है।  

बच्चों से मिलता हूँ जब भी बच्चा मै बन जाता हूँ 
नन्हें बच्चों संग बच्चा होना अच्छा लगता है । 

बेबसी  जब बढ़ जाती है हद से ज्यादा जीस्त  में 
हाथ से मुंह अपने ढक कर रोना अच्छा लगता है ॥ 

दुनियाँ भर की धनौ दौलत  से मुझको क्या लेना  
अपने घर का एक छोटा कोना अच्छा लगता है  ।।  
#नीरज कुमार नीर
#neeraj kumar neer
#गजल #gazal #गज़ल  #pyar #love #माँ #बच्चा #hindi 

Saturday, 17 January 2015

बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना


एक पिता के लिए बेटी प्रकृति की सबसे खूबसूरत देन है । बेटी के घर में आते ही घर सुंदर फूलों से भरे उपवन की तरह सज उठता है। जैसे चिड़ियों का कलरव बाग को उसकी पहचान एवं उसका सौंदर्य प्रदान करता है वैसे ही बेटी के घर में होने से घर अपनी संपूर्णता प्राप्त करता है। जीवन में व्याप्त शुष्कता मधुर आनंद में परिणत हो जाती है। गद्य मानो छंदों में आबद्ध होकर किसी सुरीली गायिका  के कंठों से निकल कर प्राणमय हो जाती है ।  इसके बावजूद एक मध्यम आय वर्गीय समाज में एक बेटी के  बाप को अनेक  चिंताओं से गुजरना होता है ।  अपनी बेटी को बेहतरीन शिक्षा दीक्षा देने के बावजूद  बेटी के जन्म के साथ ही उसकी शादी और उसमें आने वाले खर्च की चिंता से एक पिता सतत ग्रस्त रहता है। पता नहीं सभी समाज में ऐसा होता है या नहीं पर जिस समाज से मैं आता हूँ , वहाँ ऐसा होता है। मेरी भी एक बेटी है और जिसके आगमन ने मेरे घर एवं जीवन को अलौकिक आनंद से भर दिया है । मैंने अपनी भावनाओं को प्रस्तुत कविता में शब्द देने की कोशिश की है। आशा है, आप मेरे मन के भावों को समझेंगे । 
इसे अपनी खूबसूरत आवाज में गाया है सुश्री कुमारी गिरिजा ने , जिसे आप नीचे दिये लिंक पर क्लिक कर सुन सकते हैं। बात दिल तक पहुंचे तो अपनी टिप्पणी जरूर दीजिएगा :)


बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 
रे बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

घर में पैसे चार नहीं 
चल रहा व्यापार नहीं  
सोने के बढ़ते दामो ने 
मुश्किल किया है सोना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

अच्छा तुझको घर मिले 
पढ़ा लिखा एक वर मिले 
ससुराल की रहो लाड़ली 
ना मिले दहेज का ताना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 


अम्मा के मन बोझ भारी   
जोड़ रही इक  इक साड़ी 
पैसा पैसा करके जमा  
मुझको है दहेज जुटाना 
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 


गाड़ी घोड़ी मंडप फूल 
फांक रहा हूँ कब से धूल 
बैंड बाजा लाइट चमचम 
और बारात का खाना
बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 

बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना 
रे बिटिया धीरे धीरे बड़ी होना ॥ 
.........नीरज कुमार नीर
neeraj kumar neer 

Friday, 9 January 2015

सुख दुख और उच्छृंखल मन

उच्छृंखल मन 
करता है खेती 
विचारों की 
और उपजाता है 
फसल
सुख और दुःख  के 
.... 
नीरज कुमार नीर 
neeraj kumar neer 

Sunday, 4 January 2015

गिफ्ट


पॉकेट में तारों को भरकर 
चाँद  को रैपर में लपेट
मैं ले आऊँगा 
तुम्हारे वास्ते 
मेरी जान ! 
तुम उसे सजा लेना 
अपने दामन में 
और मैं देखूंगा 
तुम्हारे चेहरे पर 
उमड़ आई 
बड़ी सी मुस्कान ...
जिससे चाँद फिर 
निकल आएगा 
आसमान में . ...
एक मद्धिम दूधिया रौशनी 
ले लेगी समूचे हयात को 
अपने आगोश में ....
तुम्हारी आँखों की चमक से  
अम्बर  में  उग आएंगे 
फिर से चाँद सितारे। 
................
नीरज कुमार नीर 
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Saturday, 3 January 2015

दृष्टिपात के नवंबर 2014 अंक में प्रकाशित मेरी चार कवितायें


दृष्टिपात के नवंबर 2014 अंक में प्रकाशित मेरी चार कवितायें । 








































मोबाइल न. गलत टाइप हुआ है । 
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