अपनी शादी की सालगिरह पर प्रस्तुत :::::
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फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥
धन्यता हमारी थी जो तुमने हमे स्वीकार किया
मेरे गुण दोषों के संग मुझको अंगीकार किया
दुर्लंघ्य पर्वत विपदा के आए जीवन राह में
यह सम्बल तुम्हारा था हंसकर हमने पार किया
रंग बिरंगी खिली रौशनी वन प्रांतर निर्जन में ॥
फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥
पूंज ज्योति की तुम बनी जब तम ने जीवन को घेरा
हाथ पकड़ बाहर लायी जब दुखों ने मुझको हेरा
मात पिता निज गृह को तज मम गृह को आधार किया
बाँहें तुम्हारी सर्वदा प्रिय रही सुखों का डेरा
मास बारह वर्ष के भींगा प्रीत के सावन में ॥
फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में॥
.............. नीरज कुमार नीर ..........
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फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥
धन्यता हमारी थी जो तुमने हमे स्वीकार किया
मेरे गुण दोषों के संग मुझको अंगीकार किया
दुर्लंघ्य पर्वत विपदा के आए जीवन राह में
यह सम्बल तुम्हारा था हंसकर हमने पार किया
रंग बिरंगी खिली रौशनी वन प्रांतर निर्जन में ॥
फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में ॥
पूंज ज्योति की तुम बनी जब तम ने जीवन को घेरा
हाथ पकड़ बाहर लायी जब दुखों ने मुझको हेरा
मात पिता निज गृह को तज मम गृह को आधार किया
बाँहें तुम्हारी सर्वदा प्रिय रही सुखों का डेरा
मास बारह वर्ष के भींगा प्रीत के सावन में ॥
फूल खिले खुशियों के खेली बहार इस आँगन में
धरा जबसे पाँव प्रिय तुमने जीवन के कानन में॥
.............. नीरज कुमार नीर ..........
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