Wednesday, 23 April 2014

हम फिर से गुलाम हो जायेंगें


हमारे जीवन मूल्य
सरेआम नीलाम हो जायेंगें 
हम फिर से गुलाम हो जायेंगें ..

स्वतंत्रता का काल स्वर्णिम 
तेजी से है बीत रहा 
हासिल हुआ जो मुश्किल से 
तेजी से है रीत रहा. 
धरी रह जाएगी नैतिकता, 
आदर्श सभी बेकाम हो जाएँगे .
हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..

कहों ना !  जो सत्य है. 
सत्य कहने से घबराते हो 
सत्य अकाट्य है , अक्षत 
छूपता नहीं छद्मावरण से 
जो प्राचीन है , धुंधला, 
गर्व उसी पर करके बार बार दुहराते हो. 
टूटे हुए कलश, भंजित प्रतिमा 
ध्वस्त अभिमान, लूटी स्त्रियाँ 
नत  सर .
ये इतिहास हैं.
ये  सत्य हैं, अकाट्य , अक्षत, 
गर्व करो या स्वीकारो 
या उठा कर फ़ेंक आओ इन पन्नो को 
अरब सागर की अतल गहराइयों में.
पर सत्य नहीं बदलेगा 
सत्य नग्न होता है. 
सत्य पे झूठ के आवरण 
नाकाम हो जायेंगें. 
हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..

नैतिकता और कायरता में 
पुरुषार्थ भर का अंतर है 
कायरों की नैतिकता  
चलती नहीं अनंतर है. 
सूरज को हाथों से ढकने के यत्न 
नाकाम हो जायेंगे 
हम फिर से गुलाम हो जायेंगे ..
नीरज कुमार नीर 
………  #Neeraj_kumar_neer
#freedom #secularism #motivational #poem 

Thursday, 17 April 2014

मरे हुए आदमी की नैतिकता


एक रात 
मेरी मुलाकात 
हुई, एक मरे हुए आदमी से. 
आँखों पर चश्मा,
सड़क के बायीं ओर 
चल रहा था.
शक्ल , सूरत से पढ़ा लिखा 
बुद्धिजीवि  लग रहा था.
मैने उससे पूछा सवाल,
पिछली बार, 
तुम्हें कर दिया गया था बेघर, 
लूट कर घर बार, 
छोड़ना पड़ा था अपना देश 
फिरे थे मारे मारे 
छीन ली गयी थी बीवियां.
बेटियों का हुआ था बलात्कार. 
बिना किसी प्रतिरोध के तुमने 
किया था सब कुछ स्वीकार. 
परिस्थितियां ले रही 
पुनः इस बार 
वैसा ही आकार. 
इस बार क्या प्रतिरोध करोगे 
या झुकी आँखों से 
मान इसे नियती
सब चुपचाप ही सहोगे ? 
उसने कहा
बगैर नजर उठाये उन्मन से.   
मेरे जीवन के मूल्य 
महत्वपूर्ण है मेरे जीवन से. 
जिन्होंने मुझ पर किया था अत्याचार, 
दरअसल वे तो थे महज बेरोजगार.   
सारी  समस्या की जड़ बस अर्थ है.
मैने सोचा, यह आदमी है मरा हुआ,
इससे बात करना व्यर्थ है.
घरों की खिड़कियाँ जब 
बड़ी हो जाएँ घर से 
खिड़कियाँ खा जाती है ऐसे घर को. 
नैतिकता जब हावी हो व्यक्ति पर 
लड़ने के डर से,
नैतिकता खा जाती है 
व्यक्तित्व को.
जब तक जीवन है तभी तक 
जीवन मूल्य का अर्थ है 
मरे हुए आदमी की नैतिकता बे अर्थ है .
...........नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 
#neeraj_kumar_neer
#motivational #politics #बेरोजगार #hindi_poem #हिन्दी_कविता 

Saturday, 12 April 2014

मेरे जीवन के मधुबन में


सुगंध बनकर आ जाओ तुम 
मेरे जीवन के मधुबन में 

पुष्प मनोरम बन खिल जाओ
पल  पल में जीवन महकाओ 
परितप्त ह्रदय के मरुतल पर 
 बन कर मेघा दल  छा जाओ 
बस जाओ न प्रतिबिम्ब बनकर 
मेरे जीवन के दर्पण में.
सुगंध बनकर आ जाओ तुम 
मेरे जीवन के मधुबन में  ..

तुझ से ही है मेरा  होना 
तुझ से  मिलकर  हँसना रोना 
तुम चन्दा,  मैं टिम टिम तारा
अर्पण तुझ पर जीवन सारा 
तुझ से दूर रहूँ मैं कैसे 
आसक्त बंधा  हूँ बंधन में
सुगंध बनकर आ जाओ तुम 
मेरे जीवन के मधुबन में   ...

प्रेम भाव की अविरल धारा 
तुम दिल जीती या मैं हारा 
बात बराबर दोनों ही है 
तुम मेरी या मैं तुम्हारा 
एक ख्वाब बन कर बसी रहो 
तुम मेरे दोनों नयनन में 
सुगंध बनकर आ जाओ तुम 
मेरे जीवन के मधुबन में ..

#NEERAJ_KUMAR_NEER 
#नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 
#geet #love #prem #hindi_geet 

Wednesday, 9 April 2014

कौआ , मोबाइल और काँव काँव

'परिकथा' के सितंबर - अक्तूबर 2014 अंक में प्रकाशित 
................................. 

मोबाइल टावर के आने के बाद से कौओं की संख्या में चिंताजनक गिरावट आई है, उसी  ओर  इंगित करती मेरी नई कविता पढ़ें और अपने विचार जरूर लिखें ....
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अब नहीं आते कौए
चले गए.
कौए की काँव काँव से
अतिथि के आगमन का अनुमान
अब नहीं लगाता कोई.
आँगन भी तो नहीं रहे,
जहाँ बैठ कर बऊआ
कटोरी में दूध रोटी खाता था.
कौआ भी वहीँ मंडराता था,
अम्मा जी खिसिया कर फटकारती.
दादी कहती ये काग भुसुंडी हैं,
कौए के घर कौन सी खेती होती है,
और एक टुकड़ा रोटी कौए की ओर उछाल देती,
कौआ भी नृत्य की मुद्रा दिखाता हुआ
काँव काँव करता रोटी का टुकड़ा उठाता
और  उड़ जाता.
अब नहीं आते कौए चले गए.
हाँ,  कोयल आती है अभी भी
कभी कभी.
सुनाई पड़ती है उसकी कूक
वसंत में .
कोयल तो आप्रवासी है
इधर के बदलते परिवेश से
अभी नहीं हुई है परिचित
लेकिन कब तक आएगी कोयल?
आखिर कौन सेयेगा उसेक अंडे?
कहाँ छोड़ कर जायेगी वह अपने अंडे?
मोबाइल के टावर पर?
अब नहीं आते  कौए चले गए
अतिथि भी तो अब नहीं आते
बिना बताये.
सभी के पास अब मोबाइल है.
कौआ मशीन बनकर
समा गया हमारी जेबों में.
कभी भी बज उठता ,
मानो कौए की आत्मा चीत्कार कर रही हो
काँव काँव ..

नीरज कुमार नीर .
 #NEERAJ_KUMAR_NEER 
चित्र गूगल से साभार 

Monday, 7 April 2014

कहमुकरियां


लगे अंग तो तन महकाए 
जी  भर देखूं  जी में आये 
कभी कभी पर  चुभाये शूल 
का सखी साजन ? ना सखी फूल
************

गोदी में सर रख कर सोऊँ 
मीठे मीठे ख्वाब में खोऊँ
अंक में लूँ, लगाऊं छतिया.
का सखी साजन? ना सखी तकिया .
*************
उससे डर, हर कोई भागे,
वो मेरे पीछे,  मैं आगे 
कहे देकर फिर करो रिलैक्स..  
का सखी साजन? ना सखी टैक्स
***************
गाँठ खुले तो इत उत डोले 
जिधर हवा हो उधर ही होले 
कोई नियत ना कोई ठांव 
का सखी साजन ? ना सखी नाँव.
*************
गोद बिठा कर जगत  घुमाये  
तरह तरह के दृश्य दिखाए  
बिना शक्ति  के रहे बेकार 
का सखी साजन ? ना सखी कार.
**************
......  #नीरज कुमार नीर 
#NEERAJ_KUMAR_NEER
#kahmukariyan #कहमुकरियाँ 
चित्र गूगल  से साभार 

Friday, 4 April 2014

दोरंगी नीति


उसने मारा,
उसने लूटा,
हम चुप थे.
उसने तोड़ा ,
छीना जब जो चाहा .
धर्म , अस्मिता, मान 
और वो सब कुछ 
जो उसे भाया ,
जी में आया,
हम चुप थे.
हमारी चुप्पी,
उनका अधिकार . 
हमारी नियति 
सहना अत्याचार. 
एक दिन लगा दी ठोकर 
हल्की सी .
यद्यपि चुंका नहीं था  धीरज
भरा था, अभी भी ,
लबालब, सागर सहिष्णुता का..
वे लगे चिल्लाने 
कहने लगे
उनके साथ हुआ है जुल्म,
उनकी चिल्लाहट में,
बार बार के झूठ में,
गुम हो गए 
उनके सारे गुनाह,
हमारे भाई, पडोसी सब चिल्लाने लगे, 
मिलाकर उनके साथ सुर
हाँ, हाँ उनके साथ जुल्म हुआ है.
बाँधने लगे अपने ही पैरों में बेड़ियाँ 
ताकि फिर ना लग सके उन्हें
हल्की सी भी ठोकर .
मैं हतप्रभ हूँ,
कैसी अजीब है यह दोरंगी नीति

....................नीरज कुमार नीर
चित्र गूगल से साभार 

Friday, 28 March 2014

धुंए का गुबार


मेरी आँखों के सामने 
रूका हुआ है 
धुएं का एक गुबार  
जिस पर उगी है एक इबारत , 
जिसकी जड़ें 
गहरी धंसी हैं 
जमीन के अन्दर.
इसमें लिखा है 
मेरे देश का भविष्य, 
प्रतिफल , इतिहास से कुछ नहीं सीखने का .
उसमे उभर आयें हैं ,
कुछ चित्र, 
जिसमे कंप्यूटर के की बोर्ड 
चलाने वाले , मोटे चश्मे वाले 
युवाओं को 
खा जाता है,
एक पोसा हुआ भेड़िया,
लोकतंत्र को कर लेता है , 
अपनी मुठ्ठी में कैद 
और फिर फूंक मारकर 
उड़ा देता है उसे 
राख की तरह 
मानो यह कभी था ही नहीं. 
बन जाता हैं स्वयं शहंशाह 
टेलीविजन पर बहस करने वाले 
बड़े-बड़े बुद्धिजीवि 
भिड़ा रहे हैं जुगत ,
अपनी सुन्दर बीवियों और 
बेटियों को छुपाने की
धुआं धीरे धीरे नीचे उतर कर 
आ जाता है जमीन पर, 
पत्थर के पटल पर 
मोटे मोटे अक्षरों में दर्ज
हो जाता है इतिहास. 
मैं अपनी आँखों के सामने 
इतिहास बदलते देख रहा हूँ ..

(बात अगर दिल तक पहुचे एवं विचार से सहमत हों तो अपने कमेन्ट अवश्य दें )

नीरज कुमार नीर
#NEERAJ_KUMAR_NEER
चित्र गूगल से साभार 

Monday, 24 March 2014

अब हरियल नहीं देगी अंडे ..

'परिकथा' के सितंबर-अक्तूबर 2014 के अंक में प्रकाशित
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इस कविता के पूर्व थोड़ी सी प्रस्तावना मैं आवश्यक समझता हूँ. झारखंड के चाईबासा में सारंडा का जंगल एशिया का सबसे बड़ा साल (सखुआ)  का जंगल है , बहुत घना . यहाँ पलाश के वृक्ष से जब पुष्प धरती पर गिरते हैं तो पूरी धरती सुन्दर लाल कालीन सी लगती है . इस सारंडा में लौह अयस्क का बहुत बड़ा भण्डार है , जिसका दोहन येन केन प्राकारेण करने की चेष्टा की जा रही है .. इसी सन्दर्भ में है मेरी यह कविता :

सारंडा के घने जंगलों में
जहाँ सूरज भी आता है
शरमाते हुए,
सखुआ वृक्ष के  घने पत्रों ,
लताओं में छुपता छुपाता. 
जहाँ प्रकृति बिछाती है टेसू, मानो
धरती पर बिछा हो  लाल कालीन
विशिष्ट आगत के स्वागत में.
वहीँ, बरगद के कटोर  में
हरियल ने दिए है
उम्मीद के अंडे .
कटोर  के अन्दर है हलचल
चूजे सीख रहे हैं पंख फडफडाना.
वे भी उड़ेंगे
नापेंगे गगन का विस्तार .
स्वतंत्रता की गुनगुनी धुप में
बेलौस उड़ने का
अपना ही आनंद है ..
लेकिन पड़ती है खलल,
एक दैत्याकार सूअर को
खानी है बरगद की जड़.
वह बनना चाहता है
और मोटा , और बड़ा
वह खोद डालता है बरगद की जड़ को
उलट देता है दरख्त.
जंगल के क़ानून में हरियल
हासिये पर है .
वह करता है प्रतिरोध,
अपने चूजों को
बचाने का असफल प्रयास.
लेकिन रहता है विफल.
उजड़े हुए दरख़्त के साथ ही
समाप्त हो जाती है
हरियल और उसके चूजों की
जीवन गाथा.
अंत होता है एक सभ्यता का.
पलाश के फूलों का रंग
पड़ गया है काला .
रक्त सुख कर
काला हो जाता है .
अब कोई हरियल
सारंडा में नहीं देगी अंडे ..

... नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
चित्र गूगल से साभार 

Wednesday, 19 March 2014

मध्य मार्ग

परिकथा के सितंबर - अक्तूबर 2014 अंक में प्रकाशित 

आज सुबह से ही ठहरा हुआ है,
कुहरा भरा वक्त. 
न जाने क्यों,
बीते पल को 
याद करता.
डायरी के पलटते पन्ने सा,
कुछ अपूर्ण पंक्तियाँ,
कुछ अधूरे ख्वाब,
गवाक्ष से झांकता पीपल, 
कुछ ज्यादा ही सघन लग रहा है.
नहीं उड़े है विहग कुल
भोजन की तलाश में.
कर रहे वहीँ कलरव, 
मानो देखना चाहते हैं, 
सिद्धार्थ को बुद्ध बनते हुए. 
बुने हुए स्वेटर से 
पकड़कर ऊन का एक छोर
खींच रहा हूँ,
बना रहा हूँ स्वेटर को 
वापस ऊन का गोला. 
बादल उतर आया है, 
घर के दरवाजे पर
मुझे बिठा कर परों पर अपने
ले जाना चाहता है.
एक ऐसी दुनिया में 
जहाँ
प्रकाश ही प्रकाश है 
जहाँ बादल छांव देता है 
अंधियारा नहीं करता.
बगल की दरगाह से 
लोबान की महक का
तेज भभका 
नाक में घुसकर 
वापस ला पटकता है 
कमरे की चाहरदीवारी के भीतर ..
दीवार पर टंगी है 
तुम्हारी एक पुरानी तस्वीर 
जो आज भी लरजती है ख़ुशी से 
हाथों में पकड़े मेरा हाथ .
नहीं यशोधरा, मैं नहीं करूँगा 
निष्क्रमण.
मैं बढूँगा अंतर्यात्रा पर 
पकड़े हुए तुम्हारा हाथ.
मैंने चुना है अरण्य एवं लावण्य के बीच 
एक मध्य मार्ग .

.. नीरज कुमार नीर
Neeraj Kumar Neer
#neeraj_kumar_neer 
चित्र गूगल से साभार 

Monday, 17 March 2014

कान्हा खेलें होरी


आ रे कारे बादर 
रँग बरसाने आ रे 
कान्हा  खेलें होरी 
तू बरसाने आ रे

रँग अलग अलग भर ला 
लाल, बैंगनी, पीला
कोई बच ना जाए 
सबको कर दे गीला 
खुशियों की बारिश में 
तू भिंगाने आ रे

इन्द्रधनुष से रँग ला 
त्याग उदासी काली 
उल्लसित जीवन, डाल 
मुख पे उमंग लाली ..
जो उदास है जग में 
उन्हें हँसाने आ रे.

हाथों में पिचकारी
गाल पे रंग गुलाल 
सब मिल खेलें होरी 
अंचल धरा का लाल
जीवन में खुशियाँ भर 
हर्ष जगाने आ रे.

श्याम भींगे सर्वांग 
गोपियाँ राधा संग 
अंग उल्लास निखरे 
रँग, रँग, हर एक अंग .
रँग ना छूटे पाए 
ऐसो रंग लगा रे.

...  #नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer 
(बरसाने का दो अर्थ में प्रयोग समझें)
चित्र गूगल से साभार 
#holi #होली  #rang #रंग #pichkari #shyam #gopi 

Sunday, 16 March 2014

छन्न पकैया :होली


छन्न पकैया छन्न पकैया , फागुन है सतरंगी 
आजा तुझको रंग लगा दूँ , कर दूँ रंग बिरंगी.

छन्न पकैया छन्न पकैया, मन में फूटे लड्डू, 
फागुन में है  चढ़ी जवानी , क्या छोरा क्या दद्दू.
  
छन्न पकैया छन्न पकैया,  हाथों में पिचकारी.
होली में कितनी  भली लगे , गोरी तेरी गारी  

छन्न पकैया छन्न पकैया, थाली में है पूआ 
तन मन में गोरी आग लगी,  गाल जब तेरा छुआ

छन्न पकैया छन्न पकैया, सबके दुःख मिट जाए,
भूलकर गम विषाद पुराने, मिलकर होली गाये.

छन्न पकैया छन्न पकैया, सुंदर सुन्दर दोहे  
होली के मौसम में गोरी, रूप तेरा मन मोहे  
………….. Neeraj kumar neer
चित्र गूगल से साभार 
#neeraj_kumar_neer

#holi #होली #छन्न_पकैया #फागुन #रंग #jawani 

Saturday, 15 March 2014

नजरिया के तीर : होली गीत

सुनिए पढिये और फाल्गुन का आनंद लीजिये :

नजरिया के तीर सनम धीरे चलाओ
कर कर के इशारे ना हमको बुलाओ.
नजरिया के तीर सनम धीरे चलाओ.

चुनरी के छोर में लपेट के अंगुरी
अधरों  के कोरों को यूँ ना चबाओ.
नजरिया के तीर सनम धीरे चलाओ.

पहनी है पायल तो हौले से चलना
कर के छमाछम मेरा जी ना जराओ.
नजरिया के तीर सनम धीरे चलाओ.

होली के मौसम में गर्म भई  हावा
अब गिरा के दुपट्टा  ना आग लगाओ.
नजरिया के तीर सनम धीरे चलाओ ..
(#होली की शुभकामनाएं)
.. #नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer 

#holi #होली #payal #love #holi_geet 

Thursday, 6 March 2014

मोहक वसंत


बीता कटु शीत शिशिर  
मोहक  वसंत आया 

पुष्प खिले वृन्तो पर 
मुस्काये हर डाली. 
मादक महक चहुँ दिशा 
भरमाये मन आली. 
तरुण हुई धूप खिली 
शीत का अंत आया .
बीता कटु शीत शिशिर  
मोहक  वसंत आया .

प्रिया की सांसों सी
मद भरा ऊषा अनिल.   
अंग अंग उमंग रस 
जग लगे मधुर स्वप्निल. 
कुहूक  बोले कोयल
कवि नवल छंद गाया.
बीता कटु शीत शिशिर  
मोहक  वसंत आया .. 


आम्र वृक्ष स्वर्ण मौर 
महुआ  रस टपकाया. 
देखूं दृश्य अनिमेष 
किसने चित्र बनाया. 
अभिसार पूरित  ह्रदय 
जग प्रेम दिगंत छाया.
बीता कटु शीत शिशिर  
मोहक  वसंत आया .

त्याग शर्म अवगुंठन 
दे रही प्रणय  निमंत्रण. 
वृक्ष लता लिपटाया  
नगर नगर हर उपवन.
हर कोने   में वसुधा 
के हर्ष अनंत छाया. 
बीता कटु शीत शिशिर  
मोहक  वसंत आया .

..... नीरज कुमार नीर  
चित्र गूगल से साभार 
#basant #बसंत 
#neeraj_kumar_neer 

Friday, 28 February 2014

जिंदगी ने रोज गम इतने दिए


2122       2122       212 
फाइलातुन   फाइलातुन   फाइलुन
(बहरे रमल मुसद्दस महजूफ)
..............................
फूल सी जब हर  कली होने लगी
बागबाँ को तब खुशी  होने लगी

जाम साकी ने पिलाया हुस्न का
हर किसी को तिश्नगी होने लगी

जब मिले तुम जिंदगी की राह  में
जिंदगी अब जिंदगी होने लगी

देख मीठापन नदी के आब का ,
सागरों में खलबली होने लगी .

आसमां में उगता सूरज देखकर
चाँदनी भी अनमनी होने लगी .

चुभ रहे थे शूल बन कर आँख में ,
अब उसी की बंदगी  होने लगी.

जिंदगी ने रोज गम इतने दिए
गम से ही अब दिल्लगी होने लगी .

... #Neeraj_ Kumar_ Neer

#नीरज कुमार नीर 

Sunday, 23 February 2014

वसंत नहीं आता


शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी भी वसंत नहीं आता. 

नलों  की लंबी लाइनों  में 
बजबजाती  सड़ी नालियों में, 
सर टकराते छप्परों में 
औरतों की नित गालियों में, 
रोज रोज की हुज्जतों का 
कभी भी अंत नहीं आता. 

झूठ पाखण्ड अंधविश्वास 
की खूब महफ़िल सजती है. 
पंडितों और मौलाना की 
मन मर्जी खूब चलती है. 
असमय होती मौतों का पर
कभी भी अंत नहीं आता .
शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी भी  वसंत नहीं आता.

कुत्तिया के पिल्लों के संग 
सुगिया की बच्ची पलती है. 
भूख की आग में न जाने 
कितनी उम्मीदें जलती है. 
अपूर्ण रहे उम्मीदों का 
कभी भी अंत नहीं आता.
शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी  वसंत नहीं आता.

शिशुओं के नाजुक कन्धों  पर 
बस्ते की जगह में भार है. 
उसकी कमाई से चलता 
उसका बीमार  परिवार है. 
दुःख है उनकी जीवन नियति 
दुःख का अंत नहीं आता.
शहर की गंदी बस्तियों में 
कभी  भी वसंत नहीं आता.
…………. नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer 

Sunday, 16 February 2014

मैं भारत का प्रहरी बनूँगा : बाल कविता



पापा मुझे बन्दूक दिला  दो 
मैं सैनिक एक बन जाऊँगा.    
जाकर मैं देश की सरहद पर 
दुश्मन के छक्के छुड़ाऊँगा ..

मैं भारत  का प्रहरी बनूँगा 
तुम सब मिल  फिर चैन से रहना.
मेरा बेटा एक सैनिक  है 
गर्व से तुम भी  सबको  कहना. 

युद्ध  क्षेत्र में खूब लडूंगा 
पीठ नहीं मैं   दिखलाऊंगा. 
सीने पर गोली खाउंगा,
मरकर शहीद कहलाऊंगा. 

स्वयं  मरने से पहले लेकिन 
सौ सौ को पहले मारूंगा. 
जब तक कि अंतिम सांस चलेगी, 
हार नहीं कदापि  मानूंगा.

..... नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer 

Monday, 10 February 2014

क्या तुम्हें उपहार दूँ

वसंत का आगमन हो चुका एवं valentine's day  आने वाला है तो इस अवसर के लिए विशेष प्रस्तुति :


क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

तुम वसंत हो, अनुगामी
जिसका पर्णपात नहीं.
सुमन सुगंध सी संगिनी, 
राग द्वेष की बात नहीं. 

शब्द अपूर्ण वर्णन को
ईश्वर के वरदान का.

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

विकट ताप में अम्बुद री,
प्रशांत शीतल छांव सी, 
तप्त मरू में दिख जाए, 
हरियाली इक गाँव की.

कहो कैसे बखान करूँ 
पूर्ण हुए अरमान का.

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.


मैं पतंग तुम डोर प्रिय,
तुम बिन गगन अछूता है.
तुमसे बंधकर  जीवन 
व्योम उत्कर्ष छूता है.

तुम ही कथाकार हो, इस 
जीवन के आख्यान का. 

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

दिवस लगे त्यौहार सा  
हर यामिनी मधुमास सी
प्रीति तुम्हारी,   उर में  
नित नित भरती आस सी

तुल्य नहीं जग में कोई 
अनुराग  के परिमाण का  

क्या तुम्हें उपहार दूँ,
प्रिय प्रेम के प्रतिदान का.

……. नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer

शब्दार्थ :
प्रतिदान : किसी चीज के बदले कुछ देना 
अनुगामी : जो पीछे आता है 
पर्णपात : पतझड़ 
अम्बुद : बादल
आख्यान : कथा , कहानी 
यामिनी : रात 
परिमाण : मात्रा ,  magnitude 

चित्र गूगल से साभार 





Thursday, 6 February 2014

नदी माँ है ..

OBO पर  महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना से पुरस्कृत 


पर्वत की तुंग 
शिराओं से 
बहती है टकराती, 
शूलों से शिलाओं से, 
तीव्र वेग से अवतरित होती,
मनुज मिलन की 
उत्कंठा से, 
ज्यों चला वाण 
धनुर्धर की 
तनी हुई प्रत्यंचा से.
आकर मैदानों में
शील करती धारण 
ज्यों व्याहता करती हो 
मर्यादा का पालन.
जीवन देने की चाह
अथाह.
प्यास बुझाती
बढती राह. 
शीतल, स्वच्छ , 
निर्मल जल
बढ़ती जाती 
करती कल कल
उतरती नदी 
भूतल समतल 
लेकर ध्येय जीवनदायी 
अमिय भरे
अपने ह्रदय में 
लगती कितनी सुखदायी. 
यहीं होता नदी का 
सामना,
मनुजों की 
कुत्सित अभिलाषा से 
चिर अतृप्त 
निज स्वार्थ पूरित 
अंतहीन, आसुरी पिपासा से 
नदी का अस्तित्व होता 
तार तार 
हर गांव, हर नगर 
हर बार, बार बार.
करके अमृत का हरण,
करते गरल वमन,
भर देते इसमें, असुर 
समुद्र मंथन से मिले 
सारे जहर 
कोई नीलकंठ नहीं,
कोई तारण हार नहीं,
रोती , तड़पती , 
कभी गुस्साती , फुफकारती 
नदी, 
अपने मृत्यु शैय्या पर लेटे लेटे 
मिलती अपने चिर प्रतीक्षित प्रेमी से, 
उसका करता स्वागत, सागर 
अपनी बाहें फैलाकर.
सागर एक सच्चा प्रेमी है,
शामिल कर लेता है उसका अस्तित्व 
स्वीकारता है उसे 
अपने भीतर, 
सम्पूर्णता में 
उसकी सभी सड़ांध के बाबजूद.
प्रेम में अभीष्ट है समपर्ण 
अपनी पूर्णता के साथ.
तिरोहित हो जाती नदी की सारी व्यथा.
सागर की विशालता में हो जाती गौण,
विस्मृत कर देती अपनी दु: कथा.
नदी के ह्रदय में पुनः उठती हुक 
जीवन देने की,
पुत्र मिलन की इच्छा 
हो जाती बलवती 
वह पुनः उठती 
बनकर मेघ
पर्वतों में बरसती 
पुनः बनती नदी 
नदी माँ है.
माता कुमाता नहीं होती.
... नीरज कुमार नीर
#neeraj_kumar_neer
#nadee #maa #jeevan #prem #नदी #बादल #मेघ 

Monday, 3 February 2014

मैं भारत हूँ :


विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

संस्कार की पूंजी, संस्कृति अक्षय धन है 
शिव का वरदान है, कृष्ण का उपासक हूँ.
सांसो पर अधिकार है, मन का शासक हूँ.
दुःख हो या उल्लास, बराबर से जीता हूँ .

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

चाह नहीं विजय की, भय नहीं कुछ खोने का
शिराओं में प्रस्फुटित काल निनाद होता है,
सबल भुजाओं में, दीर्घ इतिहास सोता है.
उन्मुग्ध रहा विश्व, ज्ञान का अधिष्ठाता हूँ.

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

सभ्यता सिखाता रहा सदा आदि काल से,
डरा नहीं रक्तरंजित, देख दन्त कराल के.
विश्व विजय की, नहीं की कभी भी अभिलाषा,
नत हो कोई की नहीं, कभी ऐसी आशा .
निर्विकल्प रहा सदा, रागों से रीता हूँ,

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

पराजित हुआ रहा, पराधीन भी सदियों 
ठगा गया कई बार, छल के हाथों हारा.
उठा हर बार, स्वयं ही स्वयं को संवारा .
मैं अपने भाग्य का स्वयं ही निर्माता हूँ.

विषाद के क्षण को भी जी भरकर जीता हूँ,
विष अगर मिल जाये हंसकर मै पीता हूँ.

.... नीरज कुमार नीर ...
#neeraj_kumar_neer 

Tuesday, 28 January 2014

भूख और भविष्य


लाल पीली बत्तियों में सत्य दिखाई नहीं देता.
बैठ कर दिल्ली से साहब भारत दिखाई नहीं देता. 

सीढियां चढ़ गये ऊपर बहोत अब नीचे देखने से, 
आदमी अच्छा ख़ासा, आदमी दिखाई नहीं देता. 

कोई मर जाए पड़ोस में पड़ोसी को खबर ही नहीं,
राब्ता पड़ोसी का पडोसी से दिखाई नहीं देता.

भूख,  पेट की आती है देश और धर्म से पहले,  
आदमी भूखा हो तो भविष्य दिखाई नहीं देता. 

लाभ अपना, सुख अपना, अपनी अपनी खोल में बंद, 
जिन्दा आदमी भी अब जिन्दा दिखाई नहीं देता.. 
... Neeraj Kumar Neer  #neeraj_kumar_neer 

चित्र गूगल से साभार 

Friday, 24 January 2014

मंदरा मुंडा


(प्रस्तुत कविता झारखण्ड, छत्तीसगढ़ आदि क्षेत्रों में फैली सामाजिक, आर्थिक समस्या के ऊपर केन्द्रित है, कैसे कोई समस्या एक दुष्चक्र में परिणत हो जाती है एवं उसका नुकसान आम भोले भाले लोगों को भुगतना पड़ता है . मंदरा  मुंडा एक प्रतिनिधि है उसी भोले भाले आम आदमी का. थोड़ी संवेदनशीलता जरूरी है , आराम से पढ़िए और फिर बात दिल तक पहुचे तो अपना समर्थन अवश्य दें )
(जनकृति में प्रकाशित)
मंदरा मुंडा के घर में है फाका,
गाँव में नहीं हुई है बारिश, 
पड़ा है अकाल. 
जंगल जाने पर 
सरकार ने लगा दी है रोक ,
जंगल, जहाँ मंदरा पैदा हुआ, 
जहाँ बसती है, 
उसके पूर्वजों की आत्मा.
भूख विवेक हर लेता है. 
उसके बेटों में है छटपटाहट. 
एक बेटा बन जाता है नक्सली. 
रहता है जंगलों में. 
वसूलता है लेवी. 
दुसरे को कराता है भरती 
पुलिस में.
बड़े साहब को ठोक कर आया है सलामी 
चांदी के बूट से .
चुनाव आने पर,
नक्सली बेटा वोट करता है मैनेज 
चुनाव के बाद नेता 
बन जाता है मंत्री. 
गाँव में बुलाता है पुलिस 
होते हैं दोनों भाई 
आमने सामने.
अपनी अपनी बन्दूको के साथ
गिरती है लाश 
मरता है लोक तंत्र 
इस लाश को मत ओढाओ तिरंगा. 
ढको इसे सफ़ेद चादर से, 
रंग तो प्रतीक होता है, 
ख़ुशी और हर्ष का.
मदरा मुंडा के घर में पड़ा है शोक. 
फिर पड़ा है फाका, 
जंगल जाने पर 
अभी भी है रोक.

.. नीरज कुमार नीर ..  
#neeraj_kumar_neer 

चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, 21 January 2014

एकलव्य का अंगूठा


संस्कृति का क्रम अटूट
पांच हज़ार वर्षों से 
अनवरत घूमता
सभ्यता का 
क्रूर पहिया.
दामन में छद्म ऐतिहासिक
सौन्दर्य बोध के बहाने
छुपाये दमन का खूनी दाग,
आत्माभिमान से अंधी
पांडित्य पूर्ण सांस्कृतिक गौरव का
दंभ भरती 
सभ्यता.
मोहनजोदड़ो की कत्लगाह से भागे लोगों से
छिनती रही 
अनवरत, 
उनके अधिकार,  
किया जाता रहा वंचित, 
जीने के मूलभूत अधिकार से, 
कुचल कर  सम्मान 
मिटा दी गयी
आदमी और पशु के बीच की
मोटी सीमा.
छीन लिया उनका भगवान भी 
कर दिया स्थापित 
अपने मंदिर में 
बनाकर महादेव.
अपना कटा अंगूठा लिए एकलव्य 
फिरता रहा जंगल जंगल
रिसता  रहा उसका खून 
सदियों से वह भोग रहा है असह्य पीड़ा. 
बिजलियों सी कौंध रही है 
धनुष चलाने की 
उसकी इच्छा है दमित . 
द्रोणाचार्य की आरक्षित विद्या 
देश, समाज को सदा नहीं रख सकी सुरक्षित.
यवनों ने अपनी रूक्षता के आगे 
कर दिया घुटने टेकने को मजबूर.
सदियों सिजदे में झुका रहा सर.
झुके हुए सर से भी  नहीं देखा 
नीचे एकलव्य के अंगूठे से रिसता खून 
बंद कर लिया स्वयं को 
शंख शल्क में.
खंडित शौर्य एवं अभिमान के बाद भी 
एकलव्य की पीड़ा अनदेखी रही 
मोहनजोदड़ो की कत्लगाह की 
सीमा अब फ़ैल रही है 
जंगलों , घाटियों और कंदराओं तक , 
अब पर्ण कुटियों के नीचे खोजा जा रहा है  
कीमती धातु , कोयला, लोहा, यूरेनियम , सोना.
अपनी जमीन और जंगल से किये जा रहे हैं विस्थापित
कभी भय से कभी लालच देकर , 
एकलव्य के कटे अंगूठे में अभी भी है प्राण,
अभी भी है छटपटाहट 
पुनर्जीवित होने की और 
खीचने की प्रत्यंचा.
एक दिन एकलव्य का अंगूठा 
जुड़ जाएगा और
वह वाण पर रखकर तीर 
उसी अंगूठे से खीचेगा प्रत्यंचा 
और भेदेगा 
द्रोणाचार्य के आत्माभिमान को 
लग जाएगी आग सोने के खानों में. 

.... नीरज कुमार नीर #neeraj_kumar_neer
(अगर बात दिल तक पहुचे तो अपनी टिप्पणी अवश्य दें )

चित्र गूगल से साभार 


Wednesday, 15 January 2014

आसमान से ऊपर का बाग़

वागर्थ के अप्रैल 2015 अंक में प्रकाशित ....

आसमान से ऊपर 
है एक सुन्दर बाग़ 
जहाँ रहती हैं परियां 
नाजुक मुलायम 
ऊन के गोले सी.
खिलते हैं सुवासित
सुन्दर  फूल.
वहां बहती है एक नदी,
जिसमे परियां करती है कलोल, 
उडाती है एक दुसरे पर छीटे, 
जिससे होती है धरती पर 
हल्की बारिश लेकिन 
धरती रह जाती है प्यासी. 
जब कभी नदी तोड़ती है तटबंध
आ जाती धरती पर बाढ़. 
और सब कुछ हो जाता तबाह. 
उस बाग़ में लग जाएगी आग. 
एकलव्य का कटा हुआ अंगूठा 
जुड़ गया है वापस.
आदिवासी गाँव का एक लड़का 
छोड़ेगा अग्निवाण. 
जल जाएगा आसमान से ऊपर का बाग़. 
अब आदिवासियों के गाँव में 
नाचेगी परियां,
खिलेंगे महकते फूल, 
बहेगी एक सुन्दर नदी.

नीरज कुमार नीर 
#neeraj_kumar_neer 

Sunday, 12 January 2014

औरत और नदी


औरत जब करती है
अपने अस्तित्व की तलाश और 
बनाना चाहती है 
अपनी स्वतंत्र राह -
पर्वत  से बाहर 
उतरकर 
समतल मैदानों में .
उसकी यात्रा शुरू होती है 
पत्थरों के बीच से 
दुराग्रही पत्थरों को काटकर 
वह बनाती है घाटियाँ 
आगे बढ़ने के लिए 
पर्वत उसे रखना चाहता है कैद 
अपनी बलिष्ठ भुजाओं में 
पहना कर अपने अभिमान की बेड़ियाँ,
खड़े करता है,
कदम दर कदम अवरोध .
उफनती , फुफकारती , लहराती 
अवरोधों को जब मिटाती है औरत 
कहलाती है उच्छृन्खल.
औरत जब तोड़ती है तटबंध 
करती है विस्तार 
अपने पाटों का  
अपने आस पास के परिवेश को 
बना देती है उर्वरा
चारो और खिल उठता है नया जीवन 
वह बन जाती है पूजनीया 
कहलाती है गंगा ..
... नीरज कुमार नीर ..
#neeraj_kumar_neer 

चित्र गूगल से साभार 

Tuesday, 7 January 2014

सर्दी और गरीबन

संवेदन में प्रकाशित 
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कंपकपायी धरती ठंढ से
पत्थर से पानी निकला 
सिहर  कर आयी चाँदनी
सूरज कम्बल डाल के निकला ....

कपडे गर्म पहन कर टॉमी,
हीटर की गरमी में सोया.
भूख की चादर ओढ़ गरीबन,
ठिठुरा सारी रात न सोया..

सूखे छाती से चिपका नन्हे
थक गया पर दूध ना निकला..

पेट सटाकर घुटनों से
गठरी बनकर पड़ा रहा
पात हीन वृक्ष सरीखा
हिले डुले बिन अड़ा रहा .

बाहर से कड़े  बर्फ सा
भीतर में पानी सा पिघला

सर्द हवा में गीला चाँद,
मुंह चिढाता टेढ़ा चाँद,
माचिस की तिल्ली, बीड़ी का धुंआ,
भूखी आँखों से धुंधला चाँद,

आँखें हुई सफ़ेद,
छुप गया फिर चाँद न निकला ...
#neeraj_kumar_neer 
.. नीरज कुमार नीर 
(बात अगर दिल तक पहुचे तो टिप्पणी के माध्यम से समर्थन अवश्य दें )
#neeraj_kumar_neer 
चित्र गूगल से साभार 

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